योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
उर्वशी आदिक अप्सरागण प्राप्त हों; चन्द्रमा निकला हो, कामधेनु विद्यमान हो और इन्द्रियों के सब सुख प्राप्त हों, तो भी शान्ति न होगी, एक संतोष से ही शान्ति होगी। सन्तोषवान् को ये विषय डिगा नहीं सकते।
हे राम ! जैसे धवाँ भरकर छोड़ने से तालाव नहीं भर जाता, पर जब वर्षा होती है, तब शीघ्र ही भर जाता है, वैसे ही विषयों के भोग में शान्ति नहीं होती; सन्तोष ही से पूर्ण आनन्द और ओज की प्राप्ति होती है। गम्भीर, निर्मल, शीतल, हृदयगम्य और सबका हितकारी ओज सन्तोषी पुरुषों को प्राप्त होता है। और जो ओज है वे सात्त्विक, राजस और तामस होते हैं, पर यह शुद्ध सात्त्विक है। जिस पुरुष को सन्तोष होता है, वह ऐसे शोभित होता है, जैसे वसन्तऋतु का वृक्ष फूल, फल और पत्तों से शोभा पाता है। और जिसको तृष्णा है, वह चरणों के नीचे आये कीड़े की तरह कुचल जाता है। हे राम ! जिसको तृष्णा है, उसको सन्तोष और शान्ति भी नहीं होती। जैसे जल में डाला गया तृणों का पूला तीव्र पवन में उड़ता-फिरता है, वैसे ही तृष्णावान् पुरुष को क्षोभ होता है। हे राम ! जो पुरुष अर्थ की सदा इच्छा करता है वह अग्नि में प्रवेश करता है, अर्थात् सर्वदा तपती रहती है। जैसे गर्दभ विष्ठा के स्थान में प्रवेश करता है, वैसे ही तृष्णावान् जो विषय-रूपी गंदे स्थान में प्रवेश करता है, वह गर्दभ है। जैसे गर्दभ का स्पर्श करना अनुचित है, वैसे ही तृष्णावान् गर्दभ से स्पर्श करना योग्य नहीं है। हे राम ! यह संसार मिथ्या है। जो इस संसार के पदार्थों को चाहता है, वह मूर्ख है। इस जगत के अधिष्ठान को प्राप्त होने से जीव निर्वासनिक होता है, और जब निर्वासनिक होता है, तब सन्तोष को प्राप्त होता है। तब ऐसा होता है जैसे तारों में चन्द्रमा शोभा पाता है—इससे इच्छा के नाश का उपाय करो। हे राम ! जब इच्छा नष्ट होती है और सन्तोषरूपी गम्भीरता प्राप्त होकर द्वैतकल्पना मिटती है, तब उसी को पण्डितजन परमपद कहते हैं। यह पद कैसे प्राप्त होता है, सो भी श्रवण करो। हे राम ! जब संसार में वैराग्य, सन्तों की संगति और सतशास्त्रों के अर्थों और आत्मा में दृढ़भावना होती है, तब जगत्