योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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# * निर्वाण प्रकरण *
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देकर वह खाता है। तब यदि कोई शरीर माँगे तो वह शरीर भी दे देता
है; क्योंकि उसको देने का अभ्यास हो जाता है। पर और से साग
माँगने की भी इच्छा नहीं रखता। संतोष से यथाप्राप्त चेष्टा और तप,
दान करता है। यज्ञ, व्रत और ध्यान करके पवित्र रहता है और तृष्णा
का त्याग करता है। हे राम! ऐसा दुःख घोर नरक में भी नहीं होता,
जैसा तृष्णा से होता है। जो धनवान् हैं, उनको धन के कमाने और
रखने की चिन्ता है। उन्हें उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते-सोते सदा
धन की ही चिन्ता रहती है। इसी चिन्ता में वे पच-पचकर मर जाते हैं
और फिर जन्म लेते हैं। हे राम! निर्धन को भी चिन्ता रहती है, परन्तु
थोड़ी होती है। जब तक चिन्ता रहती है, तब तक जीव दुखी रहता है,
पर जब चिन्ता नष्ट होती है, तब परम सुखी होता है।
हे राम! यद्यपि धनी हो और उसे संतोष नहीं तो वह परम दरिद्री
है, और जो धन से हीन है, परन्तु संतोषवान् है, वह ईश्वर है। जिसको
संतोष है, उसको विषय बन्धन नहीं कर सकते। हे राम! जब तक धन
की इच्छा नहीं करता, तब तक भोगरूपी विष नहीं व्यापता। पर जब
धन की इच्छा उपजती है, तब परम विष व्यापता है। विपरीत भावना
में दुःख होता है और जो दुःखदायक पदार्थ हैं, वे सुखदायक जान
पड़ते हैं। हे राम! जो कुछ अर्थ है, वही अनर्थ है। जिसको संपदा
जानते हैं, वही आपदा है और जिनको भोग जानते हैं, वही सब
रोगरूप है। इनको संपदा जानकर चाहता है, इससे बड़ा दुखी होता
है। हे राम! रसायन सब दुःखों का नाश करती है, परन्तु वह देव-
ताओं के पास होती है। यदि अमृत चाहिए तो संतोष ही परम रसा-
यन है। जब विषयों में दोषदृष्टि होती है और मनुष्य संतोष धारण
करता है, तब मूर्खता दूर हो जाती है और गोपद की तरह संसारसमुद्र
से शीघ्र ही तर जाता है। जैसे गऊ के पैर के गढ़े को सहज ही लाँघ
जाते हैं, वैसे ही संसारसमुद्र को वह सहज में तर जाता है। हे राम!
जिसको संतोष प्राप्त होता है, उसको परम शान्ति होती है। कभी
बसन्तऋतु भी सुख का स्थान हो, नन्दनवन भी सुख का स्थान हो,