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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

होते हैं, तब जगत् भासित होता है और जब अहंता का अभाव होता है, तब आत्मपद शेष रहता है। जैसे सुवर्ण में भूषण होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् है, दूसरी वस्तु कोई नहीं बनी। वासना से दृश्य दिखता है। वह वासना मन में उठी है और मन अज्ञान से हुआ है। जब मन संकल्प-विकल्प से रहित होता है, तब सब दृश्य एक ही रूप हो जाता है। जब तक वासना उठती है, तब तक मन में शान्ति नहीं होती। जैसे कोई पुरुष भोंरी घुमाता है, तो बल चढ़ते जाते हैं, और जब ठहरता है, तब वह बल उतर जाता है, वैसे ही जब तक चित्त वासना में भ्रमता है, तब तक जन्मरूपी बल चढ़ते जाते हैं, और जब चित्त ठहरता है, तब जन्म का अभाव हो जाता है। हे राम! जब तक चित्त का दृश्य के साथ सम्बन्ध है, तब तक जीव कर्मबंधन से नहीं छूटता। जब चित्त का दृश्य से सम्बन्ध टूटता है, तब शुद्ध अद्वैतपद को प्राप्त होता है। हे राम! जब शुद्धचिन्मात्र में उत्थान होता है, तब उसका नाम चैत्योन्मुख होता है। वहीं अहंता दृश्य की ओर बढ़ती जाती है, तब प्रमाद हो जाता है और जड़ता होती है। जैसे जल ओला हो जाता है, वैसे ही चित्तशक्ति प्रमाद में जड़ हो जाती है। जब जीव दृढ़ वासना को ग्रहण करता है, तब अपना शरीर अन्तवाहक मे आधिभौतिक देख पड़ता है। फिर पृथ्वी आदिक तत्त्व भासित होने लगते हैं। ज्यों-ज्यों चित्तशक्ति बहिर्मुख होती जाती है, त्यों-त्यों संसार होता जाता है। जब चित्तवृत्ति स्फुरण से रहित होकर अपने स्वरूप की ओर आती है, तब अपना रूप ही भासित होता है द्वैत मिट जाता है और परमानन्द अद्वैतपद दीखता है। जब पूर्णबोध होता है, तब द्वैत और एक की संज्ञा भी जाती रहती है, केवल आत्मतत्त्वमात्र शुद्ध चैतन्य रहता है। तब ईश्वर से एकता होती है और जगत् की प्रतीति जाती रहती है। जब उस पद की प्राप्ति होती है, तब दृश्य का अभाव हो जाता है; क्योंकि जगत् भावनामात्र है। जैसे भविष्य-काल का वृक्ष आकाश में हो, वैसे ही यह जगत् है, क्योंकि इसका अत्यन्त अभाव है-कुछ बना नहीं, भ्रान्ति से भासित होता है।

५१२ ✹ योगवाशिष्ठ ✹

हे राम ! मेरे वचनों का अनुभव तब होगा, जब स्वरूप का ज्ञान होगा और तभी ये वचन हृदय में स्थान पावेंगे । जैसे कथावाले के हृदय में कथा के अर्थ आते हैं, वैसे ही मेरे ये वचन तुम्हारे मन में स्थान पावेंगे । हे राम ! जब तक मन अपना काम करता है, तब तक जगत का अभाव नहीं होता । जब मन का उपशम होता है, तब जगत् का अभाव हो जाता है । जैसे मनुष्य जब स्वप्न को स्वप्न जानता है, तब फिर स्वप्न के पदार्थों की इच्छा नहीं करता, पर जब तक उनको सत्य जानता है, तब तक इच्छा करता है । हे राम ! सब जीव वासना से ढके हुए हैं । वासना के क्षय का ही नाम ज्ञान है । अज्ञानरूपी भूत जीव को लगा है, इसी से उन्मत्त होकर इसे जगत् प्रतीत होता है, और जगत् के प्रतीत होने से नाना प्रकार की वासना दृढ होती हैं । उसमे जीव दुःख पाने है । जब यह चित्त उलटकर अन्तर्मुख हो और आत्मा में दृढ भावना करे, तब ज्ञानरूपी मन्त्र प्राप्त होता है और अज्ञानरूपी भूत जाता रहता है । हे राम ! अनुभवरूपी कल्पवृक्ष में जैसी भावना होती है, वैसा ही भान होता है । हे राम ! प्रथम इस जीव का शरीर अन्तवाहक था और अपना स्वरूप भूला न था, इसमें अपने को आत्मा ही जानता था और इसे जगत् अपना संकल्पमात्र भासित होता था । जब उस संकल्प में दृढ भावना हुई, तब वह शरीर आधिभौतिक भासित होने लगा । जब उसमें दृढभावना हुई, तब देह और इन्द्रियाँ सब अपने में भासित होने लगीं । तब इनके सुख-दुःख को जानने लगा । जब जगत के सुख-दुःख भासित हुए, तब सब आपदा प्राप्त हुई । पर वास्तव में न कोई सुख है, न दुःख न जगत् है । केवल भावना मात्र है । जैसी चित्त की भावना होती है, वैसे ही आगे भासित होता है । हे राम ! जब यह भावना उलटकर अन्तर्मुख आत्मा की ओर होती है, तब एक ही बोध का भान होता है। और जब एक बोध का भान होता है, तब सब द्वैत मिट जाता है ।

हे राम ! आत्मा में अन्तवाहक भी नहीं है । यह ब्रह्मा भी बोधस्वरूप है । यदि बोध से भिन्न अन्तवाहक कुछ होता, तो भासित होता ।

  • निर्वाण प्रकरण * ५१३

अन्तवाहक भी उसी से है—अन्तवाहक शुद्धचिन्मात्र में चैत्योन्मुख होने और चित्तशक्ति के स्फुरित रहने का नाम है । जब उसको पञ्चतन्मात्रा का सम्बन्ध होता है, तब वही जड़ चेतन ग्रन्थि है । चित्तशक्ति चेतन है और पञ्चतन्मात्रा जड़ । इनके इकट्ठा होने का नाम अन्तवाहक शरीर है । यदि यह भी आत्मा में कुछ हुआ होता तो ये वचन न होते—इसमें चिन्मात्र है, कुछ बना नहीं; क्योंकि आत्मा अद्वैत है। हे राम ! दूसरा कुछ बना नहीं, पर भ्रम से द्वैत भासित होता है । जैसे ही यह जगत् भी भ्रान्ति से भासित होता है, कुछ है नहीं । हे राम ! जब है नहीं तो किसकी इच्छा करता है ? उतना सुख इन्द्रियों के इष्ट-भोग से नहीं होता, जितना इनके त्यागने से होता है । हे राम ! एक यज्ञ है, जिसके करने से पुरुष परमपद को प्राप्त होता है । पर वह यज्ञ तब होता है, जब एक खम्भा गाड़े और उसके नीचे बलिदान करे । जब यज्ञ कर चुके, तब सर्व त्याग करना होता है । तभी फल की प्राप्ति होती है । इस क्रम के किये बिना यज्ञ सफल नहीं होता । वह खम्भा क्या है, बलि क्या है, यज्ञ क्या है, त्याग क्या है और फल क्या है, यह सुनो ।

हे राम ! ध्यानरूपी तो खम्भा गाड़े, जिसमें आत्मपद का सदा अभ्यास हो । उसके आगे तृष्णा की बलि दे और ज्ञानरूपी यज्ञ करे—अर्थात् आत्मा के जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप, अद्वैत, निर्विकल्प, देह, इन्द्रियाँ, प्राण आदिक से रहित इत्यादि विशेषण वेदशास्त्र में कहे हैं, उनके अनुसार आत्मा को जानने का नाम ज्ञान है । यही यज्ञ है । ध्यान-रूपी खम्भे, तृष्णारूपी बलि और मनरूपी दृश्य को जीतकर यह यज्ञ पूर्ण होता है । जब यह यज्ञ समाप्त होता है, तब उसके पीछे दक्षिणा भी चाहिए जिससे यज्ञ सफल हो । सर्वस्व देना ही दक्षिणा है—और अहंकार त्याग करना ही सर्वस्व-त्याग है । जब सर्वस्व-त्याग होता है, तब यह यज्ञ सफल होता है । इसका नाम विश्वजित् यज्ञ है । जब इस प्रकार यज्ञ होता है तब इसका फल भी होता है । फल यह है कि चाहे अङ्गारों की वर्षा हो, प्रलयकाल का पवन चले, और पृथ्वी आदिक तत्त्व नष्ट हों

१४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

ऐसे आंमों में भी मन चलायमान नहीं होता । यह फल प्राप्त होता है कि जीव कभी स्वरूप में नहीं गिरता--यह शत्रुनाश वज्र-ध्यान है । हे राम ! अहं का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ त्याग है । जो कार्य अहं के त्याग से होता है वह और किसी उपाय में नहीं होता । तप, दान, यज्ञ, शम, दम, उपदेश से भी बढ़कर साधन अहन्ता का त्याग करना है । और सब साधन इसके बाहर हैं । हे राम ! जब तुम अहन्ता का त्याग करोगे, तब तुमको भीतर-बाहर ब्रह्मसत्ता ही दिखेगी और सम्पूर्ण द्वैतभ्रम मिट जावेगा ।

हे राम ! मन के सब अर्थरूपी तृणों को ज्ञानरूपी अग्नि लगावे और वैराग्यरूपी वायु से जगावे । जब इन तृणों को भस्म कर डालोगे, तब तुम परम शान्ति को प्राप्त होगे । मन के जलने से परम संपदा प्राप्त होती है-इससे भिन्न सब आपदा है । मन का उपशम करने में ही कल्याण है । ये जो भीतर बाहर नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, वे मन के मोह से उत्पन्न हुए हैं । जब मन उपशम को प्राप्त होता है, तब मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, पृथ्वी आदिक नाना प्रकार के प्राणी सब आकाशरूप हो जाते हैं । हे राम ! यह सब ब्रह्म है । ज्ञानी को एक सत्ता भासित होती है; क्योंकि दूसरा कुछ बना नहीं । भ्रम से जगत् भासित होता है । उसमें जब नाना प्रकार की वासना होती है, तब अपनी-अपनी वासना के अनुसार जीव जगत् को देखते हैं । इससे तुम जागो और वासना के पिंजड़े को तोड़कर आत्मपद को प्राप्त करो । हे राम ! अज्ञान से जो आत्मपद को भूलकर सोये और वासना के पिंजड़े में पड़े हैं, उन अज्ञानियों की तरह तुम न होना । अज्ञान से जीव का नाश होता है । जो कुछ जगत् देखते हो वह भ्रममात्र है । जैसे बाँसुरी में पवन का शब्द होता है, वैसे ही ये प्राणवायु से बोलते दीखते हैं, ऐसा जानो । जगत् भ्रममात्र है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सर्वसत्ताोपदेशो नाम शताधिकनवषष्टितमसर्गः ॥१६६॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सम्पूर्ण जगत् में सप्त प्रकार की सृष्टि है ।

✳ निर्वाण प्रकरण ✳ ५१५

और सात ही भाँति के जीव हैं। उनको भिन्न-भिन्न सुनो। एक स्वप्न-जाग्रत् के हैं। दूसरे संकल्प-जाग्रत् के हैं। तीसरे केवल जाग्रत् के हैं। चौथे फिर जाग्रत् के हैं। पञ्चम दृढ़ जाग्रत् के हैं। छठे जाग्रत्-स्वप्न के हैं। और सप्तम क्षीण-जाग्रत् के हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने जो यह सात प्रकार की सृष्टि कही, सो समझाने के लिए मुझसे खुलासा करके कहिये। यह ऐसे है, जैसे नदियों के जल का समुद्र में अभेद हो और इनको पूछना भी ऐसे ही है, जैसे एक जल मे फेन बुलबुले और तरङ्ग वायु से होते हैं। इसलिए विस्तार से कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! प्रथम सृष्टि तो यह है कि किसी जीव को किसी कल्प में अपनी जाग्रत् में सुषुप्ति हुई और उसमें जो स्वप्न हुआ तो उसको हमारे जाग्रत् का जगत भासित हुआ और वह उसको शब्द-अर्थ-संयुक्त सत् जानकर ग्रहण करने लगा। तो उसके स्वप्न में हम स्वप्न के नर हैं, परन्तु उसके निश्चय में नहीं, क्योंकि वह अपनी जाग्रत् अवस्था मानता है। पर हमारा और उसका कल्प एक हो गया है, इसी से वह भी जाग्रत् जानता है। और पूर्वकल्प में भी उसका शरीर चैतन्य फुरता था, परन्तु अब सोया पड़ा है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब वह पुरुष अपने कल्प में जागे, तब यह उसको क्या भासित होता है। और यदि वह जागे नहीं और वहाँ कल्प का प्रलय हो, तब उसकी क्या अवस्था होगी? एवम् यदि यहाँ ज्ञान की प्राप्ति हो तो उस शरीर की क्या अवस्था होगी? सो क्रम से कहो।

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यदि वह पुरुष अपने कल्प में जागेगा तो यह जाग्रत् उसको स्वप्न भासित होगा, और जो वहाँ न जागेगा और उस कल्प का प्रलय हो जायगा तो वह जीव वहीं चेष्टा करेगा। यदि ज्ञान की प्राप्ति हो तो उस शरीर और इस शरीर की वासना इकट्ठी होकर निर्वाण हो जायगी और जो ज्ञान न प्राप्त हो तो उस शरीर को त्याग कर और जाग्रत्भ्रम भासित होगा। अपने को पूर्ववत् जाने चाहे न जाने, परन्तु बिना ज्ञान के जगत्भ्रम नहीं मिटता। हे राम! यह और वह दोनों तुल्य हैं। ब्रह्मसत्ता सब जगत् ममान प्रकाशित होती है। हे

५१६ ❇ योगवासिष्ठ ❇

राम ! जैसे गूलर में मच्छर होते हैं, वैसे ही ये जीव भी भ्रम में फुरते हैं । यह जाग्रत् सृष्टि कहा । और स्वप्न में जो जाग्रत् है, उसका नाम स्वप्न-जाग्रत् है । पुरुष बैठा हो और चित्त की वृत्ति ठहर जाय, पर निद्रा नहीं आई । उसने मनोराज्य हुआ और उस मनोराज्य में जगत होकर उसी में दृढ वासना हो गई और पूर्व की वासना भूल गई । यह मत भासित हुई और उसमें मनोराज्य का शरीर भासित हुआ । वही आधि-भौतिकता दृढ़ हो गई । उसका नाम संकल्प-जाग्रत् है । आदि-परमा-त्मतत्त्व में जो प्रकट हुआ और आत्मा में जो जगत् भासित हुआ, उसको संकल्पमात्र जाना । उसका नाम केवल जाग्रत् है । आदि परमात्मतत्त्व से क्षोभ हुआ; उसमें सृष्टि हुई और उसको मत जानकर ग्रहण किया । स्वरूप का प्रमाद हुआ और आगे जन्मान्तर को प्राप्त हुआ । उसका नाम चिरजाग्रत् है । जब इसमें दृढ़ घनीभूत वासना हुई और जीव पापकर्म करने लगा, उसके कारण स्थावर योनि पाई, तो उसका नाम घनजाग्रत् और सुषुप्तजाग्रत् है । जब इसमें सन्तों की संगति और मनशास्त्रों के विचार से बोध प्राप्त हुआ, तब यह जाग्रतसृष्टि उसको स्वप्न हो जाती है । उसका नाम स्वप्नजाग्रत् है । जब बोध में दृढ़ स्थिति हुई, तब उसको तुरीयपद कहते हैं—उसका नाम क्षीणजाग्रत् है । जब जीव इस पद को प्राप्त होता है, तब परमानन्द की प्राप्ति होती है ।

हे राम ! ये सात प्रकार के जीव और सृष्टि मैंने तुमसे कही । इनको विचार करके देखो तो तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा । यह भी क्या बताना है कि यह जीव है और यह सृष्टि है ? सब ब्रह्मसत्ता है, दूसरा कुछ हुआ नहीं । मन के स्फुरण में दृश्य भासित होता है । मन को स्थिर करके देखो तो सब शून्य हो जावेगा, और शून्य भी न रहकर शून्य का कहना भी न रहेगा—इस गिनती को भी विस्मरण करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सप्तप्रकारजीवसृष्टिवर्णनं नाम शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७० ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो केवल जाग्रत् की उत्पत्ति अकारण, अकर्म और बोधमात्र में कही, सो असम्भव है—जैसे आकाश

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५१७

में वृक्ष नहीं हो सकता, वैसे ही आत्मा में सृष्टि नहीं हो सकती; क्योंकि आत्मा निराकार और निष्क्रिय है। वह न समवायिकारण है और न निमित्तकारण है। जैसे मृत्तिका घट आदि का कारण होती है, वैसे आत्मा सृष्टि का समवायिकारण भी नहीं; क्योंकि वह अद्वैत है। और जैसे कुम्हार घट आदि का निमित्तकारण होता है, वैसे आत्मा सृष्टि का निमित्तकारण भी नहीं; क्योंकि वह अक्रिय है। उस अकारणक और अकर्मक में सृष्टि कैसे हो सकती है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुम धन्य हो; क्योंकि अब जागे हो। आत्मा में सृष्टि का अत्यन्त अभाव है, क्योंकि वह निर्विकार और निष्क्रिय है। वह न भीतर है, न बाहर; न ऊपर है, न नीचे; केवल बोधमात्र है। उसमें न कोई आरम्भ है, न परिणाम। वह केवल बोधमात्र अपने रूप में स्थित है। जैसे सूर्य की किरणों में जल कल्पित है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है। हे महाबुद्धिमान् ! आत्मा अकारण है, उसमें कार्यरूप जगत् कैसे हो सकता है? उसमें जगत् नहीं उत्पन्न हुआ। उसके अभाव से सबका अभाव है। न कुछ उपजा है; न किसी का आभास होता है। उपदेश और उसका अर्थ आरोपित है, और कुछ है ही नहीं। आरोपित शब्द भी जिज्ञासु को जताने के निमित्त कहा है, है कुछ नहीं। आत्मा सदा अद्वैतरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो आत्मा में सृष्टि है ही नहीं तो पिण्डाकार कैसे भासित होते हैं? उनको किसने रचा है? और मन, बुद्धि, इन्द्रियों का भान क्यों होता है? चैतन्य को स्नेह (और राग) से किसने मोहित किया है और आत्मा में आवरण कैसे होता है? यह समझाकर कहिये।

वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई पिण्ड है, न किसी ने इनको बनाया है। न कोई भूत है, न किसी ने इनको मोहित किया है और न किसी का आवरण किया है; भ्रान्ति से आवरण भासित होता है। जो आत्मा को आवरण होता तो वह किसी प्रकार नष्ट भी होता। परन्तु जब आवरण ही नहीं तो नष्ट कैसे हो? हे राम! जिसको आवरण होता है, उसका स्वरूप एक अवस्था को त्यागकर दूसरी अवस्था को

५१८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

ग्रहण करता है। पर आत्मा तो सदा ज्ञानस्वरूप है। इसमें अन्य अवस्था को कभी नहीं प्राप्त होता, सदा ज्यों का त्यों रहता है। उसमें मन, बुद्धि आदि भी नहीं बने। तब मोह कहाँ और आवरण कहाँ ? सदा एकरस आत्मतत्त्व है। ज्ञानी को ऐसे भासित होता है और अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। वह आत्मा ज्ञानकाल और अज्ञान-काल में एकरस है। पर उसमें दो दृष्टियाँ होती हैं। ज्ञानदृष्टि से तो सब आत्मा है और अज्ञान से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे राम ! जैसे एक समुद्र में अनेक तरङ्गों और बुलबुले उठने और लीन होते हैं, पर उनका उत्पन्न और लीन होना जल में है, जल से भिन्न कुछ नहीं वैसे ही जितने विचार और इच्छाएँ उठती हैं सो सब आत्मा में होते हैं, दूसरी वस्तु नहीं है। विकार और अविकार सब परमात्मतत्त्व है। समुद्र में लहरें और बुलबुले परिणाम में होते हैं; आत्मा सदा ज्यों का त्यों है। नाना प्रकार के जो आकार भासित होते हैं, वे भी वही हैं, जैसे सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण होते हैं, सो सुवर्ण ही हैं, दूसरी वस्तु नहीं, पर भ्रान्ति से उसकी नाना प्रकार की संज्ञा होती है। जैसे कोई पुरुष जाग्रत बैठा हो और नींद आने से स्वप्नसृष्टि भासित हो तो चाहे वह जाग्रत के अज्ञान में स्वप्नसृष्टि भासित हुई हो, पर जब निद्रा निवृत्त होती है, तब जाग्रत ही भासित होती है। वह जाग्रत भी परमात्मतत्त्व के अज्ञान में भासित होती है। जब उस पद में जागोगे, तब जाग्रतभ्रम निवृत्त हो जावेगा।

हे राम ! यह संसार अपने स्फुरण से हुआ है। जब फुरना दृढ़ हुआ, तब जीव दुःख पाने लगा। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वेताल की कल्पना कर आप ही दुःख पाता है, वैसे ही जीव अपने अहं में आप ही दुःख पाता है। जब आत्मबोध होता है, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है। हे राम ! यह संसार जो रम से युक्त लगता है, सो भावनामात्र है। जब यही भावना पलटकर आत्मा की ओर आवे, तब जगत् का भ्रम मिट जायगा। देह, इन्द्रिय आदिक जो आत्मा के अज्ञान में उपजे हैं और उनमें अहंकार हुआ है, वह आत्मभावना से निवृत्त हो जायगा

  • निर्वाण प्रकरण * ५१६

जैसे वर्षाकाल में मेघ घने होते हैं और जब शरत्काल आता है तब अदृश्य हो जाते हैं, वैसे ही जब बोधरूपी शरत्काल आता है, तब अनात्म में आत्म-अभिमानरूपी मेघ नष्ट हो जाता है और परम स्वच्छता प्रकट होती है। हे राम! जितना जगत् पिण्डरूप होकर भासित होता है, जब आत्मा का साक्षात्कार होगा, तब उसमें पिण्ड-बुद्धि जाती रहेगी और सब जगत् आकाशरूप हो जायगा। जैसे शरत्-काल में मेघों की बहुलता जाती रहती है और सब आकाशरूप हो जाता है। हे राम! यह भ्रान्ति तब तक है, जब तक जीव स्वरूप में सुषुप्ति सा है। जब जागेगा तब सब जगत् आकाश सा शून्य हो जायगा, जैसे स्वप्न में जागने पर स्वप्नजगत् आकाशरूप हो जाता है। हे राम! यह विकार, क्षोभ और नानात्व प्रमाद से दिखते हैं। जब आत्मबोध होता है, तब सब क्षोभ और विकार मिट जाते हैं। सब प्रपञ्च एक हो जाने से द्वैतभाव मिट जाता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि में घृत, ईंधन या मिष्ठान्न जो कुछ डालिये, वह एकरूप हो जाता है, वैसे ही जब बोध होता है, तब सब जगत् एकरूप हो जाता है। जैसे नाना प्रकार के भूषण अग्नि में डालिये तो सब सुवर्ण ही हो जाता है और भूषण की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही मन को जब आत्मबोध में डाल दिया, तब जगत्संज्ञा नहीं रहती, केवल परमात्मतत्त्व हो जाता है।

हे राम! इन्द्रियाँ और जगत् तब तक हैं, जब तक जीव स्वरूप में अनजान सोया पड़ा है। जब जागेगा, तब संसार की सत्यता मिट जायगी और इच्छा भी कोई न रहेगी। जैसे किसी पुरुष को स्वप्न आता है, और जब उस स्वप्न से वह जागता है, तब स्वप्न के स्मरण की इच्छा नहीं करता कि वह मुझको याद आवे या उसमें मिले हुए सुख-दुःख या मनुष्य मुझे मिलें; क्योंकि उसको सत्यता नहीं जान पड़ती तो इच्छा कैसे करे, वैसे ही जब तक जीव स्वरूप में अनजान सोया पड़ा है, तब तक संसार के पदार्थों को मिथ्या नहीं जानता, उनकी इच्छा करता है। जब तुम स्वरूप ज्ञान में जागोगे, तब सब पदार्थ नीरस हो जावेंगे और जब ज्ञान से जगत् को मिथ्या स्वप्नवत्

५२० ✵ योगवाशिष्ठ ✵

जानोगे, तब उसकी चाह भी न करोगे। हे राम! जीवन्मुक्त की सब चेष्टाएँ देखी जाती हैं, परन्तु वह जगत् को सत्य नहीं मानता; क्योंकि उसको आत्मानुभव हुआ है। जैसे सूर्य की किरणों में जल देख पड़ता है, पर जिसने सूर्य की किरणों को जान लिया है, उसको जल नहीं प्रतीत होता, किरणें ही दीखती हैं; पर जिसने किरणें नहीं जानीं, उसको जल का भ्रम होता है। दृष्टि दोनों की तुल्य है, परन्तु ज्ञानवान् के निश्चय में जगत् जल के समान नहीं और अज्ञानी को जगत् जल सा दृढ़ जान पड़ता है। हे राम! मनरूपी दीपक प्रज्वलित है; उसमें ज्ञानरूपी जल डालिये तो बुझ जायेगा। जब मन का निर्वाण होगा, तब उस पद को प्राप्त होंगे, जहाँ जगत् और अहंकार का अभाव है। वह न शून्य है, न अशून्य; न केवल है न अकेवल। उसका उदय, अस्त भी नहीं है। हे राम! जो पुरुष ऐसे पद को प्राप्त हुआ है, वह कृतकृत्य होकर रागद्वेष से रहित परम शान्तपद को प्राप्त होता है। उसका अहंकार मिट जाता है। वह केवल निर्वाच्य पद को प्राप्त होता है, जहाँ कोई उत्थान नहीं। हे राम! आत्मा से जगत् के पदार्थ कोई नहीं हैं, मन के संकल्प से भासित होते हैं। जैसे खम्भे में चितेरा कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ इस खम्भे में हैं, सो वे उसके निश्चय में हैं, खम्भे में पुतलियों का अभाव है; वैसे ही मन के निश्चय में जगत् है; आत्मा में कुछ नहीं बना। जिस पुरुष का मन सूक्ष्म हो गया है; उसको जगत् स्वप्न जान पड़ता है। जब उसने इसे स्वप्न जाना, तब वह इच्छा और त्याग किसका करे?

हे राम! जगत् की तब तक प्रतीति है, जब तक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब आत्मानुभव होगा, तब जगत् रस से युक्त कभी न भासित होगा। जैसे धूप छाया इकट्ठी नहीं होतीं, वैसे ही ज्ञान और जगत् इकट्ठे नहीं होते। आत्मज्ञान होने पर जगत् का अभाव हो जाता है। जैसे पूर्वकाल वर्तमानकाल में नहीं होता, वैसे ही आत्मा में जगत् नहीं होता। हे राम! यह जगत् भ्रम से भासित होता है और विचार करने से इसका अभाव हो जाता है। द्रष्टा-दर्शन-दृश्य की जो

⚙️ निर्वाण प्रकरण ५२१

त्रिपुटी भासित होती है, वह भी मिथ्या है। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में ये तीनों भासित होते हैं और जागे मे इनका अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से ये भासित होते हैं और ज्ञान से इस त्रिपुटी का अभाव हो जाता है। हे राम! जैसे मनोराज्य से मन में जगत् स्थित होता है, वैसे ही ये पर्वत, नदियाँ, देश, काल, जगत् भी जानो। इससे इस जगत्-भ्रम को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ। यह जगत् भ्रम से उदय हुआ है, विचार से नष्ट हो जावेगा और तुमको परम शान्ति प्राप्त होगी। हे राम! जिसका मन उपशम को प्राप्त हुआ है, वह पुरुष मौनी है। वह निरोध पद को प्राप्त हुआ है और संसार-समुद्र मे तरकर कर्मों के अन्त को पहुँच गया है। उसको पहाड़, नदियाँ आदि से युक्त सम्पूर्ण जगत् लीन हो जाता है। अज्ञान के नष्ट होने मे विद्यमान जगत् भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि ज्ञानी शान्ति मे तृप्त है। वह ज्ञानवान् निरावरण होकर स्थित होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सर्वशान्त्युपदेशो नाम शताधिकैकसप्ततितमसर्गः ॥ १७१ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस क्रम से बोधस्वरूप आत्मा जगत्-रूप होकर दिखता है, वह क्रमभेद की निवृत्त के लिए फिर मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जितना जगत् देख पड़ता है, उसका चित्त में निश्चय होता है। यह जगत् ज्ञानवान् को और अज्ञानी को भी चित्त से भासित होता है, परन्तु इतना भेद है कि अज्ञानी जगत् को सत् मानता है और ज्ञानवान् शास्त्रयुक्ति से देखकर पूर्वापर अर्थ के विचार से भ्रान्तिमात्र जानता है। यह जगत् जिस अविद्या से है, वह अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जल भासित होता है सो कुछ है नहीं, वैसे ही अविद्या कुछ वस्तु नहीं है। जितना स्थावर जङ्गम जगत् है, सो कल्प के अन्त में नष्ट हो जाता है। जैसे समुद्र मे एक बूँद निकालिये तो वह नष्ट हो जाती है, क्योंकि विभागरूप है, वैसे ही माया, अविद्या, सत्, असत् आदिक सब सम्बन्धों का अभाव हो जाता है; क्योंकि सब शब्द जगत् में हैं। जब जगत् लीन हुआ,

५२२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

मेघ शब्द कहाँ रहे ? और वास्तव में न कुछ उपजा है; न लीन होता है—एक ही चिदाकाश है। जो तुम कहो कि देह उपजती है; तो तुम देह और तत्त्व को स्वप्नवत् जानो। जो तुम कहो कि जगत् प्रलय में लीन होता है, इसमें कुछ है, तो नाश उरमी का होता है, जो असत्य है। जो तुम कहो कि जगत् असत्य है तो फिर क्यों भासता है, तो उपजी वस्तु भी सत् नहीं होती। जो तुम कहो कि महाप्रलय में चिदाकाश ही रहता है और वही जगद्रूप होकर दीखता है तो जगत् कुछ भिन्न वस्तु नहीं हुआ—बोधमात्र ही इस प्रकार होकर भासित होता है। जैसे बीज और वृक्ष में कुछ भेद नहीं, वैसे ही जिसमें जगत् भासित होता है, उसी का वह रूप है; कुछ उपजा नहीं। जब उपजा नहीं तो विकार और भेद कैसे हो? इसमें बोधमात्र ही अपने आपमें स्थित है। आत्मसत्ता कारण-कार्य से रहित परम शान्तरूप अपने आपमें स्थित है। वही जगद्रूप होकर दिखती है। देश, काल, पदार्थ भी सब महाप्रलयरूप हैं। जब महाप्रलय होता है, तब ब्रह्मा पर्यन्त सब पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी का नाम भी नहीं रहता। अर्थ भी नहीं रहता। तब केवल बोधमात्र और बोध से भी रहित शेष रहता है, जो परम शान्तरूप है। उसमें वाणी और मन की गति नहीं—वह केवल अवेत्यचिन्मात्र सत्ता ही है। उसी को तत्त्ववेत्ता अनुभव कहते हैं, और कोई उसे नहीं जान सकता।

हे राम ! जो पुरुष अविद्यारूपी निद्रा से जागा है वह निराभास होता है; अर्थात् चित्त से चैत्य का सम्बन्ध टूट जाता है। उसको परम प्रकाशरूप आत्मपद प्राप्त होता है। उसकी स्वभाव में स्थिति होती है और परमस्वभाव प्रकृति का अभाव हो जाता है। हे राम ! परस्वभाव में भिन्न-भिन्न जो कुछ जगत् भासित होता था, सो सब एकरूप हो जाता है। जैसे स्वप्न में सब पदार्थ भिन्न-भिन्न दीखते हैं और जागे में सब एकरूप हो जाते हैं, अपना रूप ही भासित होता है, वैसे ही जब आत्मा का अनुभव होता है, तब जगत् अपना रूप ही प्रतीत होता है। हे राम ! एकरूप सब भासित होता है, जब और कुछ नहीं बना।

  • निर्वाण प्रकरण * ५२३

जैसे सुवर्ण के भूषण अग्नि में डालिये तो अनेक भूषणों का एक पिंड हो जाता है और एक ही आकार दिखता है, वैसे ही जब बोध का अनुभव होता है, तब सब एकरूप हो जाता है। हे राम! भूषणों के होते भी सुवर्ण ही था, इसी से सब एकरूप हो गया, वैसे ही जब बोध का अनुभव होता है, तब सब एकरूप ही भासित होता है। इससे जगत् के होते भी जगत् आत्मरूप है। जगत् है नहीं और हुए की तरह भिन्न-भिन्न जान पड़ता—जैसे मोमजल में तरङ्ग नहीं है और भासित होते हैं, तो भी जलरूप हैं—असम्यकदृष्टि में भिन्न-भिन्न लगते हैं।

हे राम! ज्ञानी को जीवन्मुक्ति और विदेह मुक्ति दोनों तुल्य हैं। जैसे भूषण के होते भी स्वर्ण है और भूषण के अभाव में भी स्वर्ण है, वैसे ही ज्ञानवान् को देह के होते भी ब्रह्म है और देह के अभाव में भी ब्रह्म है। जो अज्ञानी है, उसको नाना प्रकार का जगत् फुरता है। अज्ञानी वही है जिसको मन का सम्बन्ध है। हे राम! यह जगत् भिन्न-भिन्न फुरता है। जैसे काष्ठ के स्तम्भ में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है, वे और को नहीं दिखतीं, उसी के मन में होती हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न पदार्थरूपी पुतलियाँ अज्ञानी के मन में फुरती हैं और ज्ञानवान् को नहीं भासित होतीं। जब काष्ठरूप आधार होता है, तब चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है, पर आश्चर्य देखो कि मनरूपी ऐसा चितेरा है कि आकाश में पदार्थरूपी पुतलियों की कल्पना करता है और वे बिना खोदी ही भासित होती हैं। हे राम! और दूसरा कुछ नहीं बना। जैसे किसी पुरुष ने कागज पर पुतली लिखी हो तो वह कागजरूप है और कुछ नहीं बनी, वैसे ही यह जगत् भी उसी ब्रह्म का स्वरूप है। हे राम! जब तुमको आत्मपद का अनुभव होगा, तब जितने जगत् के शब्द-अर्थ हैं, वे सब उसी में भासित होंगे। जैसे जिसने स्वर्ण को जाना, उसको भूषण के शब्द-अर्थ स्वर्ण ही भासित होते हैं, वैसे ही जब आत्मपद को जानोगे, तब तुमको जगत् के शब्द-अर्थ आत्मा ही में देख पड़ेंगे। हे राम! ये जीव महासूक्ष्मरूप हैं और इनमें अपनी-अपनी सृष्टि है। जब तक स्फुरण

५२४ ❖ योगवाशिष्ठ ❖

है, तब तक सृष्टि है । जब सृष्टि का फुरना अपनी ओर आना है, तब सब सृष्टि एक आत्मरूप हो जाती है । आकाश, काल, दिशा, पदार्थ सब आत्मा है । आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । वह अपने आपमें स्थित है, जो अद्वैत चिन्मात्रपद है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनं नाम शताधिकद्विसप्ततितमसर्गः ॥ १७२ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! सब तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध कैसे हुआ ? काल में कालत्व, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दन कैसे हुआ है ? जड़ में जड़ता, भूतों में भूतता, संकल्प में स्पन्दन, सृष्टि में सृष्टित्व, मूर्ति में मूर्तित्व, भिन्न में भिन्नता और दृश्य में दृश्यता किससे हुई है, यह मुझसे कहिये, क्योंकि अर्ध-प्रबुद्ध का बोध के निमित्त कहना योग्य है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्म, विष्णु, रुद्र, ईश्वर आदिक सब प्रलयकाल में जिसमें लीन होते हैं, उसका नाम महाप्रलय है । हे राम ! ऐसा जो अनन्त आकाश है वह सम, शुद्ध, आदि-अन्त-मध्य से भी रहित, चैतन्यघन और अद्वैत है; जहाँ एक और दो शब्द भी नहीं है, जिसमें आकाश भी पहाड़ के समान स्थूल है, और ऐसा सूक्ष्म है कि 'है', 'नहीं', दोनों शब्दों से रहित अपने आपमें स्थित है । जैसे पाषाण का शिलाकोष होता है, वैसे ही वह चित्त के स्फुरण में रहित है । ऐसे अकारण परमात्मतत्त्व में सृष्टि का उपजना कैसे कहिये ? जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने आपमें स्थित है । हे राम ! एक निमेष के फुरने में जो वृत्ति अनेक योजन पर्यन्त जाती है, उसके मध्य जो अनुभव करनेवाली सत्ता है, उसमें तुम स्थित होकर देखो कि जगत् और उसकी उत्पत्ति कहाँ है ?

हे राम ! उत्पत्ति समवायकारण और निमित्तकारण से होती है, पर आत्मा निराकार, अद्वैत और सन्मात्र है—न समवायकारण है और न निमित्तकारण । आत्मा अच्युत है अर्थात् स्वरूप से कभी नहीं गिरता । तब वह समवायकारण कैसे हो ? वह निमित्तकारण भी नहीं; क्योंकि

निर्वाण प्रकरण

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निराकार है। इससे आत्मा में जगत् कुछ नहीं है, भ्रान्तिमात्र और अविद्या से भासित है। जो वस्तु हो नहीं और प्रत्यक्ष दिखे उसे अविद्याकृत जानिये। हे राम! ब्रह्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। जल में जो तरङ्ग और आवर्त उठते हैं, वे जलरूप हैं, जल से भिन्न कुछ नहीं जब तुम अपने आपमें स्थित होगे, तब जगत् का शब्द-अर्थ भिन्न न भासित होगा; क्योंकि कुछ दूसरी वस्तु नहीं है। हे राम! ब्रह्म अमूर्त है; उसमें यह मूर्ति कैसे उत्पन्न हो? यह भ्रान्तिमात्र है। जो वस्तु कारण से उपजी हो, वह सत् होती है और जो कारण बिना देख पड़े उसे भ्रममात्र जानिये। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है तो उसका कोई कारण नहीं इससे मिथ्याभ्रम से भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मिथ्या है, विचार किये से नहीं रहता। हे राम! आकाश काल आदि जो पदार्थ हैं वे सब शून्य हैं। आत्मा में न उदय हुए हैं और न अस्त होते हैं—ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है।

इति श्री० नि० निर्वाणवर्णनं नामशताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे आकाश अपनी शून्यत्ता में स्थित है, वैसे ही ब्रह्मरूपी आकाश अपने आपमें स्थित है। फिर वह कैसे किसी का कारण हो? कारण और कार्य तब होता है, जब द्वैत और आरम्भ, परिणाम होता है; पर आत्मा तो अद्वैत, अच्युत और निर्गुण है। उसमें आरम्भ कैसे हो? हे राम! जो कुछ जगत् तुमको भासित होता है, वह सब काठ की तरह मौन है, अर्थात् वहाँ मन का फुरना शून्य है। हे राम! जो कुछ द्वैत भासित होता है, वह भ्रममात्र है, जो कुछ हुआ होता तो ज्ञानी को भी प्रत्यक्ष होता पर ज्ञानकाल में नहीं भासित होता, इससे भ्रममात्र है। हे राम! पृथ्वी, जल आदि जो पदार्थ हैं, उनका फुरना स्वप्न की तरह है। जैसे स्वप्न में जो चेष्टा होती है, वह पास बैठे को नहीं दिखती, क्योंकि है ही नहीं, वैसे ही सृष्टि अकारण संकल्पमात्र है। हे राम! जैसे मिथ्या, खरगोश के सींगों का कारण कोई नहीं वैसे ही जगत् का कारण कोई नहीं। जो कुछ हो तो उसका कारण भी हो; पर जब कुछ है ही नहीं तो किसका

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कारण कौन हो ? राम ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे वट के बीज में वृक्ष का भाव या अस्तित्व होता है, पर काल पाकर बीज से वृक्ष निकल आता है, वैसे ही इस जगत् का कारण परमाणु क्यों न हो ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सूक्ष्म से स्थूल संकल्पमात्र होता है । मैं भी कहता हूँ कि सूक्ष्म में स्थूल होता है परन्तु संकल्पमात्र होता है—कुछ सत्य नहीं होता । जो कहिये कि सत्य होता है तो नहीं हो सकता । जैसे राई के कणके से सुमेरु पर्वत का होना सम्भव नहीं, वैसे ही सूक्ष्म परमाणु से जगत् का उत्पन्न होना असम्भव है ।

हे राम ! सूक्ष्म परमाणु का कार्य भी जगत् तब कहा जाय, जब सूक्ष्म अणु भी आत्मा में पाया जाय । आत्मा तो अद्वैत है और उसमें द्वैत-अद्वैत या एक और दो कहने का अभाव है । आत्मा में जानना भी नहीं—केवल आत्मतत्त्वमात्र है । वह आधार-आधेय से रहित है । बीज भी तब परिणाम को प्राप्त होता है, जब उसको जल देते हैं और रक्षा करने का स्थान होता है । पर आत्मा आधार-आधेय से रहित केवल अपने भाव में स्थित और अद्वैत सत्तामात्र है । जैसे बन्ध्या के पुत्र का कारण कोई नहीं, वैसे ही जगत् का कारण कोई नहीं है । जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो उसका कारण कौन हो ? वैसे ही जगत् जब है ही नहीं तो ब्रह्म इसका कारण कैसे हो ? जिसको तुम दृश्य कहते हो वह द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है । हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होकर स्थित है, वैसे ही ब्रह्म ही जगत् आकार होकर दृष्टि में आता है । दृश्य भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जैसे समुद्र ही तरङ्ग और आवर्त्तरूप होकर भासता है, वैसे ही अनन्तशक्ति होकर परमात्मसत्ता ही स्थित है । हे राम ! मैं और तुम आदि जगत् के पदार्थ सब स्फुरण मात्र हैं । जैसे संकल्पनगर होता है, जो मन से रचा है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में कुछ बना नहीं, केवल ब्रह्म अपने आपमें स्थित है, हमको तो सदा वही भासता है । हे राम ! आत्मा में यह जगत् न उदय होता है और न अस्त, सदा ज्यों का त्यों निर्मल शान्तपद है ।

सं० नि० तत्त्वज्ञानातिपादनं नामाशीतितमः सर्गः ॥९४॥

✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ५२७

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जगत् का भाव-अभाव, जड़-चैतन्य, स्थावर-जङ्गम, सूक्ष्म-स्थूल, शुभ-अशुभ कुछ हुआ नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ कि यह कार्य है और इसका यह कारण है? यह हुआ ही नहीं तो फिर कारण-कार्य कैसे हो? जो सब देश, सब काल और सब वस्तु हो वह कारण-कार्य कैसे हो? आत्मा केवल अपने आपमें स्थित है और जो है और नहीं की नाईं स्थित हुआ है, उसमें संवेदन है और उसके फुरने से जगत् भासता है। वह फुरना चैतन्यमात्र का विवर्त है और उस विवर्त से जगत्भ्रम हुआ है। जब वही फुरना उलटकर अपनी ओर आता है, तब जगत् भ्रम मिट जाता है और जब फुरता है तब ध्यान, ध्याता और ध्येयरूप होकर स्थित होता है। इसी का नाम जगत् है, और इसी में बन्धन और मुक्ति है। आत्मा में न बन्धन और न मोक्ष है। हे राम! जब तरङ्ग घन होकर बहता है, तब एक नदी होकर चलता है, वैसे ही जब वासना दृढ़ होती है, तब जगतरूप होकर स्थित होता और भासित होता है। जब ऐसी वासना दृढ़ हुई, तब रागद्वेष संकल्प में बन्धनवान् होता है और जब वासना क्षय होती है तब जगत् का अभाव होकर स्वच्छ आत्मा दिखता है। जैसे शरदकाल का आकाश स्वच्छ होता है-उससे भी निर्मल दिखता है। हे राम! जीव जो निकल जाता है सो मरता नहीं। मुआ तब कहा जाय, जब अत्यन्त अभाव को प्राप्त हो और न जाना जाय। इससे यह मरना नहीं, क्योंकि फिर जगत् भासता है। यह मरना सुषुप्ति की नाईं हुआ-जैसे सुषुप्ति से जागने पर जगत् भासता है और वही चेष्टा करने लगता है और जैसे स्वप्न और जाग्रत् होता है, वैसे ही मृत्यु और जन्म भी है।

यदि मरने का शोक उपजे तो जीने का सुख भी मानिये और जो जीने का हर्ष उपजे तो उसमें मरने का शोक मानिये-दोनों अवस्था शरीर की मम रची हैं। जब यह अवस्था शरीर की जानोगे तब तुम्हारा हृदय शीतल हो जायगा। जब संवेदन फुरने का अत्यन्त अभाव हो, तब परम शान्ति होती है। ध्यान, ध्याता और ध्येय तीनों

५२८ = * योगवाशिष्ठ *

का अभाव हो जाता है और अज्ञान भी नहीं रहता। जब ऐसा अभाव होता है, तब पीछे स्वच्छ निर्मल पद रहता है। हे राम! अब भी निर्मलपद है, परन्तु भ्रम से पदार्थसत्ता भासती है। जैसे निद्रा-दोष में केवल अनुभव में पदार्थसत्ता होकर भासती है और जागे में कहता है कि केवल भ्रममात्र ही था, वैसे ही इस जगत को भ्रममात्र जानो परमार्थ स्वरूप के प्रमाद में यह जगत दीखता है और स्वरूप में जागने में इसका अभाव हो जाता है। हे राम! जैसे स्वप्न में जीव अनहोना ही राज्य देखता है, वैसे ही तुम इस जगत को जानो। इसका फुरना ही इसके बन्धन का कारण है। जैसे कुसवारी कीड़ा आप ही स्थान बना-कर आप ही फँस मरता है और जैसे मद्यपान करनेवाला मद्यपान करके और का और बकता है और उससे बँधता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प ही में बँधता है और जब संकल्प मिटता है, तब परमानन्द को प्राप्त होकर परम स्वच्छ शान्ति उदय होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमशान्तिनिर्वाणवर्णनं नाम शताधिकपञ्चमस्सर्गः ॥ १०५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जहाँ आकाश होता है, वहाँ शून्यत्ता भी होती है। जहाँ अवकाश होता है, वहाँ आकाश भी होता है और जहाँ आकाश है, वहाँ पदार्थ भी होते हैं। वैसे ही जहाँ चैतन्यसत्ता है, वहाँ सृष्टि भी भासती है। पर बनी कुछ नहीं, और सदा रहती है। जैसे सूर्य की किरणों में जल कदापि नहीं उत्पन्न हुआ और जलाभास सदा रहता है, क्योंकि उर्मी का विवर्त है, वैसे ही सृष्टि आत्मा का विवर्त है—जहाँ चैतन्यसत्ता है, वहाँ सृष्टि भी है। इसी पर मैं एक इतिहास तुमसे कहता हूँ, जिसके सुनने और समझने से जग-मृत्यु से रहित होगा। वह इतिहास परमसुन्दर और चित्त को मोहनेवाला आश्चर्यरूप है और मेरा देखा हुआ है। हे राम! एक काल में मेरा चित्त जगत से उपरत हुआ तो मैंने विचार किया कि किसी एकान्त स्थान में जाकर समाधान करूँ; क्योंकि जगत मोहरूप व्यवहार से दृढ़ हुआ है। जितना कुछ जानने योग्य है, उसको मैं जानता हूँ, परन्तु व्यवहार

निर्वाण प्रकरण ❇ ५२६

करके भी शान्तरूप होऊँ। तब ऐसा मैंने विचार किया कि निर्विकल्प समाधि करके परमशान्ति पाऊँ, और जो आदि, अन्त और मध्य से रहित परमानन्दस्वरूप अविनाशी पद है, उसमें विश्राम करूँ। हे राम! तब भी मैं ज्ञानवृत्तिमान् और परमात्मस्वरूप ही था, परन्तु चित्त की वृत्ति जब जगतभाव में उपगत हुई तो व्यवहार से भी एकान्त समाधि की इच्छा की कि जहाँ कोई क्षोभ न हो, वहाँ स्थित होऊँ। यों विचार कर मैं आकाश में उड़ा और एक देवता के पर्वत पर जा बैठा तो वहाँ बहुत प्रकार के इन्द्रियों के विषय देखे। अङ्गना गान करती हैं, सिर पर चमर होते हैं, और मन्द-मन्द पवन चलता है। पर वह भी मुझको आपातरमणीय अस्थिर लगे, क्योंकि वे किमी काल में किमी को सुखदायक नहीं—समाधिवाले के ये शत्रु हैं। उनको नीरस जानकर मैं फिर उड़ा और एक पर्वत की कन्दरा में, जो बहुत सुन्दर थी और जहाँ एक सुन्दर वन था, उसमें सुन्दर पवन चलता था, पहुँचा। ऐसे स्थान को मैंने देखा तो वह भी मुझको शत्रुवत् लगा, क्योंकि पक्षियों के शब्द होते थे और पवन का स्पर्श होता था व और भी अनेक विघ्न थे। उनको देखकर मैं आगे चला तो नागों के देश और सुन्दर नाग-कन्या देखीं, इन्द्रियों के बहुत सुन्दर विषय भी देखे, पर वे भी मुझको सर्पवत् लगे। जैसे सर्प का स्पर्श करने में अनर्थ होता है, वैसे ही मुझको विषय लगे। हे राम! जितने इन्द्रियों के विषय हैं, वे सब अनर्थ का कारण हैं। उनमें प्रीति मूढ़ और अज्ञानी करते हैं। फिर मैं समुद्र के किनारे गया और उसके पास जो पुष्प के स्थान थे, उनमें विचरा और कन्दरा और वन को देखता हुआ पर्वत, पाताल और दसों दिशा देखता फिरा। परन्तु मुझको कोई एकान्त स्थान पसन्द न आया। तब मैं फिर आकाश को उड़ा और पवन, मेघों, देवगणों, विद्याधरों और सिद्धों के स्थान लाँघता गया। आगे देखा कि कई ब्रह्माण्ड भूतों के उड़ते थे। उनमें मैंने अपूर्वभूत और नाना प्रकार के स्थान देखे।

फिर गरुड़ के स्थान लाँघे तो कहीं सूर्य का प्रकाश होता था और कहीं सूर्य का प्रकाश ही न था। फिर मैं चन्द्रमा के मण्डल को लाँघ

५३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

गया और अग्नि के स्थान लाँघकर महाआकाश में गया, जहाँ इन्द्रियों की रोकना भी न था, क्यों इन्द्रियों के विषय कोई दृष्टि में न आते थे। केवल एक आकाश ही आकाश दिखता था और वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी मागों का अभाव था। हे राम! निदान में उस स्थान में गया, जहाँ भूत स्वप्न में भी न दिखते थे और सिद्धों की भी गति न थी। वहाँ मैंने संकल्प की एक कुटी रची और उसके साथ फूल और पत्तों से पूर्ण कल्पवृक्ष रचे और उसके एक ओर मैंने छिद्र रक्खा। मेरा तो सूक्ष्म संकल्प था, इसलिए सब प्रत्यक्ष प्रकट हुआ। उस कुटी को रचकर उसमें मैंने प्रवेश किया और संकल्प किया कि एक वर्ष पर्यन्त में समाधि में रहूँगा और उसके उपरान्त समाधि से उतरूँगा। ऐसे विचारकर मैंने पद्मासन बाँधा और समाधि म स्थित होकर परमशान्ति में एक वर्ष पर्यन्त स्थित हुआ, जहाँ कोई क्षोभ न था। जब वर्ष व्यतीत हुआ, तब वह भावी समाधि के उतरने की थी इसलिए वह संकल्प हुआ। जैसे पृथ्वी में बोया हुआ बीज काल पाकर अंकुर उगता है, वैसे ही वह संकल्प मन में उगा। प्रथम जैसे सूखा वृक्ष वसन्तऋतु में हरा हो आता है, वैसे ही प्राण फुरे। फिर जैसे वसन्तऋतु में फूल खिलते हैं, वैसे ही ज्ञान-इन्द्रियां खिलकर विकसित हुईं और फिर स्पन्दन जो अहंकाररूपी पिशाच है, वह फुरा कि मैं वशिष्ठ हूँ। फिर उसकी इच्छारूपी स्त्री फुरी। हे राम! वह वर्ष मुझको ऐसे व्यतीत हुआ, जैसे पलक का खोलना होता है। काल भी बहुत प्रकार से व्यतीत होता है। किसी को थोड़ा ही बहुत हो जाता है और किसी को बहुत थोड़ा हो जाता है। जब सुख होता है, तब बहुत काल भी थोड़ा लगता है और जब दुःख होता है, तब थोड़ा काल भी बहुत हो जाता है। हे राम! इस समाधि का जो मैंने वर्णन किया, यह शक्ति सब जीवों में है, परन्तु सिद्ध नहीं होती, क्योंकि नानाप्रकार की वासना से अन्तःकरण मलिन रहता है। जब अन्तःकरण शुद्ध हो, तब जैसा संकल्प करे वैसा ही सिद्ध होता है। पर मलिन अन्तःकरणवाले का संकल्प सिद्ध नहीं होता।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीवशिष्ठसमाधि वर्णनं नाम षट्शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७६ ॥