भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 528

५२८ = * योगवाशिष्ठ *

का अभाव हो जाता है और अज्ञान भी नहीं रहता। जब ऐसा अभाव होता है, तब पीछे स्वच्छ निर्मल पद रहता है। हे राम! अब भी निर्मलपद है, परन्तु भ्रम से पदार्थसत्ता भासती है। जैसे निद्रा-दोष में केवल अनुभव में पदार्थसत्ता होकर भासती है और जागे में कहता है कि केवल भ्रममात्र ही था, वैसे ही इस जगत को भ्रममात्र जानो परमार्थ स्वरूप के प्रमाद में यह जगत दीखता है और स्वरूप में जागने में इसका अभाव हो जाता है। हे राम! जैसे स्वप्न में जीव अनहोना ही राज्य देखता है, वैसे ही तुम इस जगत को जानो। इसका फुरना ही इसके बन्धन का कारण है। जैसे कुसवारी कीड़ा आप ही स्थान बना-कर आप ही फँस मरता है और जैसे मद्यपान करनेवाला मद्यपान करके और का और बकता है और उससे बँधता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प ही में बँधता है और जब संकल्प मिटता है, तब परमानन्द को प्राप्त होकर परम स्वच्छ शान्ति उदय होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमशान्तिनिर्वाणवर्णनं नाम शताधिकपञ्चमस्सर्गः ॥ १०५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जहाँ आकाश होता है, वहाँ शून्यत्ता भी होती है। जहाँ अवकाश होता है, वहाँ आकाश भी होता है और जहाँ आकाश है, वहाँ पदार्थ भी होते हैं। वैसे ही जहाँ चैतन्यसत्ता है, वहाँ सृष्टि भी भासती है। पर बनी कुछ नहीं, और सदा रहती है। जैसे सूर्य की किरणों में जल कदापि नहीं उत्पन्न हुआ और जलाभास सदा रहता है, क्योंकि उर्मी का विवर्त है, वैसे ही सृष्टि आत्मा का विवर्त है—जहाँ चैतन्यसत्ता है, वहाँ सृष्टि भी है। इसी पर मैं एक इतिहास तुमसे कहता हूँ, जिसके सुनने और समझने से जग-मृत्यु से रहित होगा। वह इतिहास परमसुन्दर और चित्त को मोहनेवाला आश्चर्यरूप है और मेरा देखा हुआ है। हे राम! एक काल में मेरा चित्त जगत से उपरत हुआ तो मैंने विचार किया कि किसी एकान्त स्थान में जाकर समाधान करूँ; क्योंकि जगत मोहरूप व्यवहार से दृढ़ हुआ है। जितना कुछ जानने योग्य है, उसको मैं जानता हूँ, परन्तु व्यवहार