योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५२६
करके भी शान्तरूप होऊँ। तब ऐसा मैंने विचार किया कि निर्विकल्प समाधि करके परमशान्ति पाऊँ, और जो आदि, अन्त और मध्य से रहित परमानन्दस्वरूप अविनाशी पद है, उसमें विश्राम करूँ। हे राम! तब भी मैं ज्ञानवृत्तिमान् और परमात्मस्वरूप ही था, परन्तु चित्त की वृत्ति जब जगतभाव में उपगत हुई तो व्यवहार से भी एकान्त समाधि की इच्छा की कि जहाँ कोई क्षोभ न हो, वहाँ स्थित होऊँ। यों विचार कर मैं आकाश में उड़ा और एक देवता के पर्वत पर जा बैठा तो वहाँ बहुत प्रकार के इन्द्रियों के विषय देखे। अङ्गना गान करती हैं, सिर पर चमर होते हैं, और मन्द-मन्द पवन चलता है। पर वह भी मुझको आपातरमणीय अस्थिर लगे, क्योंकि वे किमी काल में किमी को सुखदायक नहीं—समाधिवाले के ये शत्रु हैं। उनको नीरस जानकर मैं फिर उड़ा और एक पर्वत की कन्दरा में, जो बहुत सुन्दर थी और जहाँ एक सुन्दर वन था, उसमें सुन्दर पवन चलता था, पहुँचा। ऐसे स्थान को मैंने देखा तो वह भी मुझको शत्रुवत् लगा, क्योंकि पक्षियों के शब्द होते थे और पवन का स्पर्श होता था व और भी अनेक विघ्न थे। उनको देखकर मैं आगे चला तो नागों के देश और सुन्दर नाग-कन्या देखीं, इन्द्रियों के बहुत सुन्दर विषय भी देखे, पर वे भी मुझको सर्पवत् लगे। जैसे सर्प का स्पर्श करने में अनर्थ होता है, वैसे ही मुझको विषय लगे। हे राम! जितने इन्द्रियों के विषय हैं, वे सब अनर्थ का कारण हैं। उनमें प्रीति मूढ़ और अज्ञानी करते हैं। फिर मैं समुद्र के किनारे गया और उसके पास जो पुष्प के स्थान थे, उनमें विचरा और कन्दरा और वन को देखता हुआ पर्वत, पाताल और दसों दिशा देखता फिरा। परन्तु मुझको कोई एकान्त स्थान पसन्द न आया। तब मैं फिर आकाश को उड़ा और पवन, मेघों, देवगणों, विद्याधरों और सिद्धों के स्थान लाँघता गया। आगे देखा कि कई ब्रह्माण्ड भूतों के उड़ते थे। उनमें मैंने अपूर्वभूत और नाना प्रकार के स्थान देखे।
फिर गरुड़ के स्थान लाँघे तो कहीं सूर्य का प्रकाश होता था और कहीं सूर्य का प्रकाश ही न था। फिर मैं चन्द्रमा के मण्डल को लाँघ