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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

निर्वाण प्रकरण ❇ ५२६

करके भी शान्तरूप होऊँ। तब ऐसा मैंने विचार किया कि निर्विकल्प समाधि करके परमशान्ति पाऊँ, और जो आदि, अन्त और मध्य से रहित परमानन्दस्वरूप अविनाशी पद है, उसमें विश्राम करूँ। हे राम! तब भी मैं ज्ञानवृत्तिमान् और परमात्मस्वरूप ही था, परन्तु चित्त की वृत्ति जब जगतभाव में उपगत हुई तो व्यवहार से भी एकान्त समाधि की इच्छा की कि जहाँ कोई क्षोभ न हो, वहाँ स्थित होऊँ। यों विचार कर मैं आकाश में उड़ा और एक देवता के पर्वत पर जा बैठा तो वहाँ बहुत प्रकार के इन्द्रियों के विषय देखे। अङ्गना गान करती हैं, सिर पर चमर होते हैं, और मन्द-मन्द पवन चलता है। पर वह भी मुझको आपातरमणीय अस्थिर लगे, क्योंकि वे किमी काल में किमी को सुखदायक नहीं—समाधिवाले के ये शत्रु हैं। उनको नीरस जानकर मैं फिर उड़ा और एक पर्वत की कन्दरा में, जो बहुत सुन्दर थी और जहाँ एक सुन्दर वन था, उसमें सुन्दर पवन चलता था, पहुँचा। ऐसे स्थान को मैंने देखा तो वह भी मुझको शत्रुवत् लगा, क्योंकि पक्षियों के शब्द होते थे और पवन का स्पर्श होता था व और भी अनेक विघ्न थे। उनको देखकर मैं आगे चला तो नागों के देश और सुन्दर नाग-कन्या देखीं, इन्द्रियों के बहुत सुन्दर विषय भी देखे, पर वे भी मुझको सर्पवत् लगे। जैसे सर्प का स्पर्श करने में अनर्थ होता है, वैसे ही मुझको विषय लगे। हे राम! जितने इन्द्रियों के विषय हैं, वे सब अनर्थ का कारण हैं। उनमें प्रीति मूढ़ और अज्ञानी करते हैं। फिर मैं समुद्र के किनारे गया और उसके पास जो पुष्प के स्थान थे, उनमें विचरा और कन्दरा और वन को देखता हुआ पर्वत, पाताल और दसों दिशा देखता फिरा। परन्तु मुझको कोई एकान्त स्थान पसन्द न आया। तब मैं फिर आकाश को उड़ा और पवन, मेघों, देवगणों, विद्याधरों और सिद्धों के स्थान लाँघता गया। आगे देखा कि कई ब्रह्माण्ड भूतों के उड़ते थे। उनमें मैंने अपूर्वभूत और नाना प्रकार के स्थान देखे।

फिर गरुड़ के स्थान लाँघे तो कहीं सूर्य का प्रकाश होता था और कहीं सूर्य का प्रकाश ही न था। फिर मैं चन्द्रमा के मण्डल को लाँघ

५३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

गया और अग्नि के स्थान लाँघकर महाआकाश में गया, जहाँ इन्द्रियों की रोकना भी न था, क्यों इन्द्रियों के विषय कोई दृष्टि में न आते थे। केवल एक आकाश ही आकाश दिखता था और वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी मागों का अभाव था। हे राम! निदान में उस स्थान में गया, जहाँ भूत स्वप्न में भी न दिखते थे और सिद्धों की भी गति न थी। वहाँ मैंने संकल्प की एक कुटी रची और उसके साथ फूल और पत्तों से पूर्ण कल्पवृक्ष रचे और उसके एक ओर मैंने छिद्र रक्खा। मेरा तो सूक्ष्म संकल्प था, इसलिए सब प्रत्यक्ष प्रकट हुआ। उस कुटी को रचकर उसमें मैंने प्रवेश किया और संकल्प किया कि एक वर्ष पर्यन्त में समाधि में रहूँगा और उसके उपरान्त समाधि से उतरूँगा। ऐसे विचारकर मैंने पद्मासन बाँधा और समाधि म स्थित होकर परमशान्ति में एक वर्ष पर्यन्त स्थित हुआ, जहाँ कोई क्षोभ न था। जब वर्ष व्यतीत हुआ, तब वह भावी समाधि के उतरने की थी इसलिए वह संकल्प हुआ। जैसे पृथ्वी में बोया हुआ बीज काल पाकर अंकुर उगता है, वैसे ही वह संकल्प मन में उगा। प्रथम जैसे सूखा वृक्ष वसन्तऋतु में हरा हो आता है, वैसे ही प्राण फुरे। फिर जैसे वसन्तऋतु में फूल खिलते हैं, वैसे ही ज्ञान-इन्द्रियां खिलकर विकसित हुईं और फिर स्पन्दन जो अहंकाररूपी पिशाच है, वह फुरा कि मैं वशिष्ठ हूँ। फिर उसकी इच्छारूपी स्त्री फुरी। हे राम! वह वर्ष मुझको ऐसे व्यतीत हुआ, जैसे पलक का खोलना होता है। काल भी बहुत प्रकार से व्यतीत होता है। किसी को थोड़ा ही बहुत हो जाता है और किसी को बहुत थोड़ा हो जाता है। जब सुख होता है, तब बहुत काल भी थोड़ा लगता है और जब दुःख होता है, तब थोड़ा काल भी बहुत हो जाता है। हे राम! इस समाधि का जो मैंने वर्णन किया, यह शक्ति सब जीवों में है, परन्तु सिद्ध नहीं होती, क्योंकि नानाप्रकार की वासना से अन्तःकरण मलिन रहता है। जब अन्तःकरण शुद्ध हो, तब जैसा संकल्प करे वैसा ही सिद्ध होता है। पर मलिन अन्तःकरणवाले का संकल्प सिद्ध नहीं होता।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीवशिष्ठसमाधि वर्णनं नाम षट्शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७६ ॥

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ५३१

राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम तो निर्वाणस्वरूप हो, तुमको अहं- काररूपी पिशाच कैसे हुआ—यह मेरा संशय दूर कीजिये ! वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी जब तक शरीर का सम्बन्ध है, तब तक अहंकार दूर नहीं होता । जैसे जहाँ आधार होता है, वहाँ आधेय भी होता है और जहाँ आधेय होता है वहाँ आधार भी होता है, वैसे ही जहाँ देह होती है, वहाँ अहंकार भी होता है, और जहाँ अहंकार होता है, वहाँ देह भी होती है । हे राम ! अहंकार बिना शरीर नहीं रहता, पर उस अहंकार को अज्ञानरूपी बालक ने कल्पना की है । पर ज्ञानी का अहंकार नष्ट हो जाता है । हे राम ! यह अहंकार अविद्या ने उपजाया है । जो वास्तव में मिथ्या हो और भामित हो, वह अविद्या है । और जब अविद्या ही मिथ्या है, तो उसका कार्य अहंकार कैसे सत् हो ? यह केवल मिथ्या भ्रम से उदय हुआ है । जैसे भ्रम से वृक्ष में वैताल भामता है, वैसे ही भ्रम से अहंकाररूपी वैताल उदय हुआ है और इसका कारण अविचार सिद्ध है । विचार करने से इसका अभाव हो जाता है । जहाँ विचार होता है, वहाँ अविद्या नहीं रहती । जैसे जहाँ दीपक होता है, वहाँ अन्धकार नहीं रहता, क्योंकि दीपक के जलाने से अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे ही विचार के उदय होने पर अविद्या का अभाव हो जाता है । जो वस्तु विचार करने से न रहे, उसे मिथ्या जानिये और जो आप ही मिथ्या है तो उसका कार्य कैसे सत्य हो ? इससे अहंकार को मिथ्या जानो ।

हे राम ! जैसे आकाश के वृक्ष का कारण कोई नहीं, वैसे ही अहंकार- का कारण कोई नहीं । मन सहित जाँ बाः इन्द्रियाँ हैं, शुद्ध आत्मा उनका विषय नहीं; क्योंकि वे साकार और दृश्य हैं । साकार का कारण निराकार आत्मा कैसे हो ? जो आकार हैं वे सब मिथ्या हैं; जो बीज होता है, उसमे अंकुर उत्पन्न होता है, तब जाना जाता है कि बीज से अंकुर उत्पन्न है; परन्तु बीज ही न हो तो उसका कार्य अंकुर कैसे उत्पन्न हो ? वैसे जगत् का कारण संवेदन ही न हो तो जगत् कैसे हो । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा हो तो उसका कारण भी

५३२ 💥 योगवाशिष्ठ 💥

मानिये और जब दूसरा चन्द्रमा ही नहीं तो उसका कारण कैसे मानिये ?

हे राम ! ब्रह्म आकाश, अद्वैत, शुद्ध, फुरने से रहित, अच्युत और अविनाशी है, वह कारण कार्य कैसे हो ? हे राम ! पृथ्वी आदिक तत्त्व अविद्यमान हैं, पर भ्रम से भासते हैं। केवल शुद्ध आत्मा अपने रूप में स्थित है। जो तुम कहो कि अविद्यमान हैं, तो भासते क्यों हैं, तो उसका उत्तर यह है कि जैसे स्वप्न में अनहोती सृष्टि भासती है, वैसे ही यह जगत् भी अनहोता भासता है। जैसे भ्रम में आकाश में वृक्ष अनहोते भासते हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं और संकल्पनगर रच लीजे तो चेष्टा भी होती है, परन्तु इसका स्वरूप संकल्पमात्र है, वास्तव में अर्थाकार कुछ नहीं होता और अपने काल में सत्य भासता है, पर जब संकल्प का लय होता है तब उसका भी अभाव हो जाता है—इससे आकाश वृक्ष की नाईं हुआ है। जैसे आकाश के वृक्ष भावना से भासते हैं, वैसे ही यह जगत् संकल्पमात्र है। स्वरूप में कुछ नहीं है, जो विचार करके देखिये तो इसका अभाव हो जाता है। हे राम ! शुद्ध आत्मतत्त्व अपने आपमें स्थित है, वही जगत् का आकार हो दिखता है—दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे स्वप्न में जितने पदार्थ दिखते हैं, वे सब अनुभवरूप हैं, वैसे ही जगत् भी ब्रह्मरूप है। हे राम ! हमको सदा वही भासता है तो अहंकार कहाँ हो ? न में अहंकार हूँ और न मेरा अहंकार है। केवल आकाश में अहंकार कहाँ हो ? हे राम ! न में हूँ और न मुझ में कुछ फुरना है; अथवा सब आत्मसत्ता में ही हूँ तो भी अहंकार न हुआ। हे राम ! हमारा अहंकार ऐसा है, जैसे अग्नि की मूर्ति लिखी होती तो उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता दृश्यमात्र होती है, वैसे ही ज्ञानी का अहंकार देखने भर को है। उसे कर्तृत्व या भोक्तृत्व नहीं होता और वे अपने स्वभाव में स्थित हैं। सब ज्ञानवानों का एक ही निश्चय है कि ब्रह्म ही है और अहंकार का अभाव है। अहंकार न आगे था, न अब है और न फिर होगा—भ्रम से अहंकार शब्द जाना जाता है।

हे राम ! जब ऐसे जानोगे, तब अहंकार नष्ट हो जायगा। जैसे शरदकाल में मेघ देखने भर को वर्षा से रहित होता है, वैसे ही ज्ञानी का

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

५३३

अहंकार देखने भर को होता है। और की बुद्धि में भासता है, परन्तु ज्ञानी के निश्चय में असंभव है; क्योंकि उसका अहंप्रत्यय आत्मा में रहता है और परिच्छिन्न अहंकार का अभाव हो जाता है जब अहंकार नष्ट होता है, तब अविद्या का भी नाश हो जाता है और यही अज्ञान का नाश है—ये तीनों पर्याय हैं। हे राम! अपने स्वभाव में स्थित रहो और प्रकृत आचार करो; हृदय से शिलाकोषवत् हो रहो और बाहर इन्द्रियों की सब क्रियाएँ हों; अपने निश्चय को गुप्त रखो और सब इन्द्रियों को इस प्रकार धारण करो, जैसे आकाश सबको धारण कर रहा है; अन्तर में शिला के जठरवत् रहो । तब देखने भर को तुम में भी अहंकार दृष्ट होगा । जैसे अग्नि की मूर्ति लिखी दृष्टि में आती है, वैसे ही तुम में अहंकार दृष्ट होगा, परन्तु अर्थाकार न होगा । केवल ब्रह्मसत्ता ही भासेगी, और कुछ न भासेगा ।

इति श्रीयो० नि० विदितवेदाहंकारव० नामश० सप्तसप्ततिमस्सर्गः ॥७७॥

राम ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है कि तुमने अहंकार के त्याग से परम सत्य की प्राप्ति का उपदेश किया है । यह परम दशा है और राग-द्वेष मल से रहित, निर्मल, उत्तम, अविनाशी और आदि-अन्त से रहित है । यह दशा तुमने परमविभुता के लिए कही है । हे भगवन्! सर्वदा, सब प्रकार सब वस्तुएँ वही ब्रह्मसत्ता है और समरूपसत्ता के अनुभव से परम निर्मल है तो शिलाख्यान किस निमित्त कहा है सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह तो सबम, सर्वदा और सबसे रहित है, पर उसके बोध के लिए मैंने तुम से शिलाख्यान का दृष्टान्त कहा है । हे राम! ऐसा स्थान कोई नहीं, जहाँ सृष्टि न हो । सब स्थानों में सृष्टि है, पर आदि से कुछ नहीं बना और सर्वदा सृष्टि बसती है—शिला के कोष में भी अनेक सृष्टि है । जैसे आकाश में शून्यत्ता है, वैसे ही शिलाकोष में भी सृष्टि है । श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! जो सबमें सृष्टि बसती है तो आकाशरूप क्यों न हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यही मैं भी तुमसे कहता हूँ कि जो कुछ सृष्टि है वह सब आकाशरूप है। स्वरूप में सृष्टि उपजी ही नहीं, सर्वदा आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित

५३४ | * योगवाशिष्ठ *


है। और आकाश की बात क्या कहनी है। शिलाकोष में सृष्टि बसती है और आकाशरूप है, अर्थात् कुछ हुई नहीं। हे राम! पृथ्वी में ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। अणु-अणु में सृष्टि है और सब ओर से बसती है, परन्तु परमार्थ से कुछ नहीं बना, केवल आत्मरूप है और सब सृष्टि शब्दमात्र है। जैसे यह सृष्टि भासती है, वैसे ही वह भी है। जो यह शब्दमात्र है तो वह भी शब्दमात्र है और जो यह सत्य भासती है तो वह भी सत्य भासती है।

हे रामजी! ऐसा कोई जल का कण नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। सभी में सृष्टि है और यह आश्चर्य देखो कि इसके बिना कुछ नहीं। ऐसा कोई अग्नि और वायु का कण नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। सबमें सृष्टि है और वह आकाशरूप है, कुछ बना नहीं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें सदा ज्यों की त्यों स्थित है। हे राम! आकाश में ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें सृष्टि न हो, परन्तु कुछ उपजी नहीं। ऐसा ब्रह्म अणु कोई नहीं, जहाँ सृष्टि न हो, परन्तु स्वरूप में कुछ हुई नहीं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें सदा स्थित है। हे राम! ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें ब्रह्मसत्ता नहीं, और ऐसा कोई चित्अणु नहीं, जिसमें सृष्टि नहीं। पर जैसे किसी ने अग्नि कही और किसी ने उष्णता कही तो उसमें भेद कोई नहीं, वैसे ही कोई ब्रह्म कहते हैं और कोई जगत कहते हैं। शब्द दो हैं, परन्तु वस्तु एक ही है। जगत ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही जगत है, कुछ भेद नहीं। जैसे बहते जल का शब्द होता है, पर उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता, वैसे ही जगत मुझको कुछ पदार्थ नहीं भासित होता है, क्योंकि दूसरी कोई वस्तु बनी नहीं। मैं, तुम और यह जगत्, सुमेरु आदि पर्वत, देवता, किन्नर, दैत्य, नाग इत्यादि सब जगत निर्वाणस्वरूप हैं—आत्म-तत्त्व में कुछ नहीं बना। ये बोलते-चालते जो जीव भासते हैं, उसे स्वप्न की नाईं जानो। जैसे कोई पुरुष सोया हो और स्वप्न में उसे नाना प्रकार के युद्ध होते या यन्त्र बजते और चेष्टा होती दिखाई दें, पर जो उसके निकट जाग्रत पुरुष बैठा हो, उसको कुछ नहीं भासित

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५३५

होता, क्योंकि वना कुछ नहीं और उसको सब कुछ भासता है, वैसे ही ज्ञानी के हृदय में जगत् शून्य है और अज्ञानी को भ्रम से नाना प्रकार का दिखता है। इससे हे राम! इस जगत् को स्वप्नवत् जानकर प्राकृत आचार करो और हृदय में शिला की नाईं हो कि कुछ न फुरे। ब्रह्म और जगत् में रञ्च भी भेद नहीं। ब्रह्म ही जगत् और जगत् ही ब्रह्म है। जगत् का स्पष्ट अर्थ ब्रह्म से भिन्न नहीं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम शताधिकाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ १७८ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने आकाशकोष में कुटी बनाकर एक वर्ष की समाधि लगाई तो उसके अनन्तर जो वृत्तान्त हुआ सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैं समाधि मे जगा, तब आकाश में एक परम मनोहर वीणा की तान के सदृश अङ्गना का शब्द सुना। तब मैंने विचार किया कि मैं तो बहुत ऊँचे पर आया हूँ, जहाँ सिद्धों की भी गति नहीं और सिद्धों से भी तीन लाख योजन ऊँचा आया हूँ। यह शब्द कहाँ से आया ? ऐसे विचारकर मैं देखने लगा तो दशों दिशाओं में आकाश ही दीखा, परन्तु सृष्टि का कर्त्ता कोई न देख पड़े। तब मैंने विचार किया कि सृष्टि आकाश में होती है, इससे मैं आकाश ही हो जाऊँ और इस शब्द को जान पाऊँ कि किसका शब्द है। बल्कि आकाश को भी त्यागकर चिदाकाश हो जाऊँ, जहाँ भूताकाश भी कुटी सा भासता है, तब इसका भी अन्त भासेगा और जान लूँगा कि यह किसका शब्द होता है। ऐसे विचारकर मैंने निश्चय किया कि यह शरीर यहाँ रहे और नेत्र मूँदे रहें। तब पद्मासन लगाकर मैंने बाहर की इन्द्रियों को रोका और जो इन्द्रियों की वृत्ति शब्द आदि को ग्रहण करती थी, उसको भी रोक लिया। निदान भीतर-बाहर की सब वृत्तियों के साथ अहंवृत्ति त्यागकर मैं आकाशरूप हो गया। जैसे इस ब्रह्माण्ड में आकाश का अन्त नहीं मिलता, वैसे ही मैं इसको त्यागकर चिदाकाशरूप हो गया, जिसका संकल्प ही रूप है। उसको भी त्यागकर मैं बुद्धि-आकाश में आया। फिर उसको भी त्यागकर

५३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

चिदाकाश में आया और उस शब्द को सुनने के संकल्प में चिदाकाश- रूप हो गया । जैसे समुद्र में मिली जल की बूँद समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही मैं चिदाकाश हो गया, जो निराकार और निराधार है; सबको धारण कर रहा है और परमानन्दस्वरूप, शान्त और अनन्त है और जिसमें सब ब्रह्माण्ड प्रतिबिम्बित होते हैं । जब मैं आत्मा के आदर्श में स्थित हुआ, तब मुझको अनन्त सृष्टियाँ अपने आपमें भासित होने लगीं ।

जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु होते हैं, वैसे ही ब्रह्म में सृष्टियाँ हैं । परन्तु जीव जीव की अपनी-अपनी सृष्टि है । एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता । जैसे कई एक मनुष्य सोये हों और अपनी-अपनी स्वप्नसृष्टि को देखें तो उसमें अपना आकाश और काल देखते हैं, एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, परन्तु ज्ञानी सब सृष्टियाँ अपने में देखता है, वैसे ही मुझको सब सृष्टियाँ चिदाकाश में भासित हुईं । पर जीवों को अपनी-अपनी सृष्टि भासती थी । हे राम ! एक सृष्टि ऐसी भासी कि उसमें कोई आवरण न था, जैसे पृथ्वी के चौफेरे समुद्र होते हैं—कहीं-कहीं एक ही भूत का आवरण था । कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टि में आई जिस पर पाँचों तत्त्वों का आवरण था । प्रथम पृथ्वी का, दूसरा जल का, तीसरा अग्नि का, चतुर्थ वायु का और पञ्चम आकाश का । कहीं ऐसी सृष्टियाँ देखीं जिन पर चार ही तत्त्वों का आवरण था । कहीं ऐसी सृष्टि देखी जिस पर षट् आवरण थे । कहीं दश आवरण नजर आये, कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टिगत हुई जिस पर षोडश आवरण थे और कहीं ऐसी देख पड़ी जिन पर चौंतीस आवरण थे । कहीं तत्त्वों के छत्तीस आवरण संयुक्त सृष्टियाँ भी देखीं । हे राम ! इस प्रकार मैंने चिदा- काश में अनन्त सृष्टियाँ देखीं, परन्तु सब आकाशरूप थीं; आत्मा में कुछ भिन्न वस्तु न थी । मन के फुरने से मुझको सृष्टि देख पड़ी, क्योंकि मन संकल्पमात्र ही था—कुछ बना नहीं । जैसे दीवार पर चित्र लिखे हों, वैसे ही आत्मारूपी दीवार पर चित्ररूप सृष्टि दीखी कि अपने-अपने व्यवहार में सब मग्न हैं ।

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

<div align="right">५३७</div>

हे राम ! ऐसी अनन्त सृष्टियाँ देखीं. पर एक की सृष्टि को दूसरा न जानता था; सब अपनी-अपनी सृष्टि को जानते थे । जैसे अनेक मनुष्य एकही काल में शयन करते हैं और अपनी-अपनी स्वप्न सृष्टि देखते हैं, तो भी दूसरी सृष्टि को वे नहीं जानते। हे राम ! कुछ ऐसी सृष्टियाँ देखीं, जहाँ न सूर्य का प्रकाश था न चन्द्रमा का। न अग्नि का प्रकाश था । पर उनकी चेष्टा होती थी । कहीं ऐसा सृष्टि देखी, जहाँ सूर्य और चन्द्रमा हैं और कहीं ऐसी देखी कि उसको काल का ज्ञान भी नहीं और न वहाँ कोई दिन है, न रात्रि है, सदा एक समान रहती हैं। कहीं महाशून्यरूप तम ही दिखा, कहीं ऐसा दिखा कि देवता ही रहते हैं। कहीं मनुष्य ही रहते हैं। कहीं तिर्यक् पशुपक्षी कीट-पतंग ही रहते हैं। कहीं दैत्य ही देखे। कहीं जल ही देखा, और कोई तत्त्व न देख पड़ा । कहीं ऐसी सृष्टि नजर आई, जहाँ शास्त्र का विचार ही नहीं। कहीं शास्त्र-पुराण विपर्यरूप थे और कहीं समान थे। कहीं प्रलय होता देखा, और कहीं उत्पत्ति होती देखी । हे राम ! इसी प्रकार अनन्त सृष्टियाँ मैंने देखीं, परन्तु जब स्वरूप की ओर देखता, तब केवल ब्रह्मरूप ही दिखता और कुछ बना न दिखता। और जब संकल्प करके देखता, तब अनन्त सृष्टि दिखती । कहीं ऐसी सृष्टि दिखती, जहाँ बालक, वृद्ध, यौवन अवस्था की मर्यादा ही नहीं—जैसे जन्मे वैसे ही रहे—कहीं ऐसी सृष्टि है कि चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश नहीं, अग्नि के प्रकाश से उनकी चेष्टा होती है। कहीं ऐसा दिखा कि ऊपर को चले जावें; कहीं नीचे को चले जावें । कहीं ऐसे प्राणी देखे; जो शास्त्र की मर्यादा मे चेष्टा करते हैं । कहीं कृमि ही बसते हैं, और कोई नहीं । हे राम चैतन्यरूपी वन में मैंने अनन्त सृष्टिरूपी वृक्ष देखे, परन्तु दूसरा कुछ बना न देख पड़ा, सब चैतन्य का आभास ही नजर आया । जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है और बना कुछ नहीं, वैसे ही सृष्टि बनी कुछ नहीं । जैसे आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भासता है, वैसे ही अन-होती सृष्टि दिखती है । जैसे मरुस्थल में जल और गन्धर्वनगर की सृष्टि दिखती है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि भासित होती है।

५३८ * योगवाशिष्ठ *

हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश में चित्तरूपी गन्धर्व ने सृष्टि रची है, पर स्वरूप से भिन्न कुछ उपजा नहीं—सब अकारण है । जो समवायकारण बिना सृष्टि भासित हो, उसे भ्रममात्र जानिये । जैसे स्वप्न की सृष्टि बिना कारण होती है और अर्थाकार मानती है तो भी अजात जात है अर्थात उपजे बिना उपजी भासित है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि आभास मात्र है । हे राम ! आभास में भी अधिष्ठानसत्ता होती है, जिसके आश्रय से आभास फुरता है । सच्चिदानन्द ब्रह्म सबका अधिष्ठान है । सब आत्मसत्ता में ही स्थित हैं—ब्रह्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं । चेतना में ही नानात्व भासता है, परन्तु नानात्व हुआ कुछ नहीं; आत्मा ही सर्वदा अपने आप में स्थित है । जैसे क्षीरसमुद्र में वायु से नाना प्रकार के तरङ्ग उठते दीखते, तो भी क्षीर से भिन्न नहीं—ऐसा क्षीरसमुद्र का तरङ्ग कोई नहीं, जिसमें घृत न हो, वैसे ही जो कुछ पदार्थ हैं, उन सबमें ब्रह्मसत्ता प्रविष्ट है । जैसे दूध को मथने से घृत निकलता है, वैसे ही विचार करने से जगत् ब्रह्मस्वरूप भासता है—कुछ भिन्न नहीं दिखता, क्योंकि कारण द्वारा कुछ नहीं उपजा, परमार्थ से केवल आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है । स्फुरणरूपी भ्रम से कुछ हुआ दृष्टिगत होता है और जब स्फुरणरूपी भ्रम निवृत्त होता है, तब ब्रह्म ही दिखता है; इससे अविद्यारूप स्फुरण को त्यागकर अपने निर्विकल्पस्वरूप में स्थित होओ । तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जायगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगज्जालसमुद्भवोनाम शताधिकनवतमतितमसर्गः ॥ १७६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार मैंने सृष्टि देखी, तब फिर विचार हुआ कि वह शब्द करनेवाला कौन था, उसको देखूँ । तब मैं देखने लगा तो देखते-देखते वीणा का सा शब्द सुना । परन्तु उसको न देखा । तब फिर देखा तो शब्द का अर्थ भासित होने लगा । फिर देखा तो एक स्त्री दीख पड़ी, जिसका शरीर सुवर्णसदृश था; बहुत सुन्दर वस्त्र पहिने हुए थी और सब अङ्ग भूषणों से भूषित थे; मानो लक्ष्मी या भवानी थी । जब मैंने उसको देखा, तब वह मेरे निकट आई

* निर्वाण प्रकरण * ५३६

और कहने लगी—हे मुनीश्वर ! और संसार जो मैंने देखा है वह सामान्यधर्मा मुझको दिखा है, पर तुम उत्तमधर्मा और संसारसमुद्र के पार हुए दिखते हो। तुम संसारसमुद्र से पार हो। जो कोई तुम्हारी ओर आता है, उसके आश्रयस्वरूप हो और उसको भवसागर से निकाल भी लेते हो, पर और जीव संसारसमुद्र में बहे जाते हैं और तुम पार हुए हो; इससे तुमको नमस्कार है। हे राम! जब इस प्रकार उस अङ्गना ने कहा, तब मैं आश्चर्य में हुआ कि इसने मुझे कभी देखा सुना भी नहीं, फिर क्योंकर जाना? तब मैंने ऐसे विचार किया कि यह माया का कोई चरित्र है और सब ब्रह्माण्ड मुझको इसी में दिखे हैं। हे राम! ऐसे विचारकर में फिर आकाश को उड़ा। तब और सृष्टि दिखने लगी। जैसे स्वप्न की सृष्टि, संकल्प की सृष्टि और गन्धर्वनगर की सृष्टि होती है, वैसे ही यह सृष्टि है—वास्तव में कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्नादिक की सृष्टि अनहोती भासती है, वैसे ही यह जगत् है—केवल बोधमात्र आत्मा अपने आपमें स्थित है। हे राम! जब में बोध में स्थित होकर देखता, तब मुझको आत्मा ही दिखता; और जब संकल्प करके देखता, तब नाना प्रकार के जगत् भासित होते—कहीं नष्ट होते और कहीं नष्ट होकर उत्पन्न होते जैसे पीपल के पत्ते गिरते हैं और वैसे ही उपजते हैं, वैसे ही जगत् उपजते देखे। कहीं ऐसे दिखे कि नाश होकर और के और उत्पन्न हो रहे हैं, कहीं उत्पन्न होते ही दिखते और कहीं भिन्न-भिन्न सृष्टि और भिन्न-भिन्न शास्त्र देखे। कहीं सूर्य, चन्द्रमा तारों का चक्र ऐसे ही फिरता दिखा और कहीं और प्रकार देखा। कहीं नरक की सृष्टि और कहीं स्वर्ग के स्थान देखे। इसी प्रकार अनन्त सृष्टियाँ देखीं। अनन्त रुद्र देखे। अनन्त ब्रह्मा देखे। अनन्त विष्णु देखे। कहीं प्रलय के मेघ गरजते थे। कहीं सुमेरु आदिक पर्वत उड़ते दिखते थे। कहीं ब्रह्माण्ड जलते और द्वादश सूर्य तपते थे और कहीं ऐसे स्थान नजर आते थे कि प्राणी जन्मते ही पुष्ट हो जाते। कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टि गोचर हुई कि एक सृष्टि में मरा और दूसरी सृष्टि में आया और दूसरी सृष्टि में मरा उसी सृष्टि में आया। कहीं प्रलय होता देखा

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  • योगवासिष्ठ *

कहीं ज्यों की त्यों सृष्टि देखी। जैसे दो पुरुष एक ही शय्या पर सोये हों और दोनों को स्वप्न आवे तो एक की सृष्टि में प्रलय होता है और दूसरे की ज्यों की त्यों रहती है। इसमें कुछ आश्चर्य नहीं।

हे राम ! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखीं, परन्तु उनमें सार ब्रह्मसत्ता ही थी और सब स्वप्नवत् थे। जैसे केले के वृक्ष में सार कुछ नहीं निकलता, वैसे ही उस स्थान में सार कुछ न देखा। हे राम ! क्रिया—काल आदि सब विश्व ब्रह्मस्वरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग बुल-बुले सब जलरूप हैं, वैसे ही सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है, भिन्न नहीं। जैसे क्षीरसमुद्र में तरङ्ग क्षीर से भिन्न नहीं होते, वैसे ही तुम और मैं, सब जगत् ब्रह्म ही है। जब मैं बोध की ओर देखता, तब सब ब्रह्म ही दिखता और जब संकल्प की ओर देखता, तब नाना प्रकार का जगत् दिखता। इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखीं। कहीं ऐसी सृष्टि देखी जो अधूरी ही थी। कहीं गुणों की सृष्टि देखी। कहीं ऐसी सृष्टि थी कि धर्म-अधर्म को जानती ही न थी। हे राम ! एक सौ पचास सृष्टियाँ त्रेता-युग की मैंने देखीं, जो भिन्न-भिन्न थीं और भिन्न ही भिन्न जगत् भी थे। उनमें ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ भिन्न-भिन्न देखे, जिनको मेरे ही समान ज्ञान था और जिनकी मेरे ही समान मूर्ति थी। उनमें कोई-कोई मुझसे उत्तम भी थे और उन सबके आगे उपदेश लेने के निमित्त राम बैठे थे। त्रेतायुग में अनेक युग और अनेक द्वापर, त्रेता और सतयुग देखे, जो सब चैतन्य आकाश के आश्रय में थे। हे राम ! हुए बिना ही यह सब दीखा। जैसे मरुस्थल में जल, आकाश में अनहोनी नीलता और रज्जू में सर्प भासित होता है, वैसे ही ब्रह्म से अनहोता जगत् भासित होता है। हे राम ! मन के फुरने से जगत् भासता है। और उसके मिटने से सब ब्रह्म ही भासता है। हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में अनन्त त्रसरेणु दिखते हैं, वैसे ही अनन्त सृष्टियाँ देखीं, जो एक चैतन्य से अनेक चैतन्य दीखीं। जैसे वृक्ष में फल प्रकट होते हैं, वैसे ही संकल्परूपी वृक्ष में सृष्टिरूपी फल देख पड़े।

जैसे एक गूलर के फल में अनन्त मच्छर होते हैं, वैसे ही एक

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५४१

आत्मसत्ता के आश्रित अनन्त सृष्टियाँ संकल्प के फुरने से मुझको देख पड़ीं। कहीं महाप्रलय के क्षोभ होते थे और समुद्र उछलते थे। उनके तरङ्ग देवलोक को गिराते थे। कहीं श्याम रंग का चन्द्रमा उष्ण और सूर्य शीतल दीखता था। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि दिन को अँधेरा हो जाता और रात्रि को जीव उलूक आदि की नाईं चेष्टा करते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि उनको रात्रि और दिन का कुछ ज्ञान न था। काल का ज्ञान नहीं, और धर्म-अधर्म का भी ज्ञान नहीं। मनमाने आचरण करते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि पुण्य करने वाले नरक को जाते थे और पापी स्वर्ग को जाते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि बालू से तेल निकलता था, विषपान से लोग अमर होते थे और अमृत-पान से मर जाते थे। हे राम! जैसे किसी का निश्चय होता है, वैसा ही आगे भासित होता है। यह जगत् संकल्पमात्र है। जैसी भावना होती है, वैसा ही आगे होकर भासता है। कहीं पत्थरों में कमल उपजते थे और कहीं वृक्षों में रत्न और हीरे नजर आते थे। आकाश में बड़े प्रकाश से युक्त वृक्षों के वन देख पड़े। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि बादल ही उनके वस्त्र हैं और वस्त्रों की नाईं बादलों को पहन लें। कहीं शीश पर भार लिये सब चेष्टा करते थे। निदान अन्धे, काने, बहरे इत्यादि लोगों की नाना प्रकार की सृष्टि देखी। हे राम! जब मैं स्वरूप की ओर देखता, तब सब सृष्टि शून्यरूप दिखती और जब संकल्प की ओर देखता, तब नाना प्रकार का जगत् भासित हो। कहीं ऐसी ही सृष्टि दृष्टि आई कि लोग चन्द्रमा और सूर्य को जानते ही नहीं। कहीं एक पृथ्वी की सृष्टि पृथ्वी में; अग्नि की सृष्टि अग्नि में और जल की सृष्टि जल में देखी। कहीं पाँच भूतों की सृष्टि देखी- जैसे यह विद्यमान है। और कहीं कठपुतली की तरह सृष्टि चेष्टा करती देखी- जैसे यह विद्यमान है और भोजन करती है। कहीं-कहीं प्राणों बिना यन्त्र की पुतली भी चेष्टा करती देखी। हे राम! जब ऐसी सृष्टियाँ देखीं तो मैं महाआकाश में अनन्त योजन पर्यन्त चला गया। परन्तु एक आकाश ही दृष्टिगोचर था, और कोई तत्त्व न दीखा। फिर ऐसी सृष्टि

२८२ * योगवाशिष्ठ *

देखी कि वे खाना, पीना, आदि सब चेष्टा वैताल की नाईं करते थे, परन्तु देख न पड़ते थे। जैसे वैताल सब चेष्टा करते हैं और दृष्टिगत नहीं होते, वैसे ही वे दृष्टि न आते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि जहाँ मैं और तुम की कल्पना भी नहीं, केवल निश्चलभाव था, और कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि उनके मन ही नहीं था। कहीं अहंकार-सृष्टि देखी; कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि वे मय में आत्मभावना करते हैं; कहीं सब अपना रूप ही जानें और भेद-भावना किसी में न करें। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि सब मांस की लक्ष्मी से शोभित हैं। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि उपजकर नाश हो जाते हैं—जैसे नख और केश उपजते हैं—और कहीं ऐसे देखे कि चिरकाल पर्यन्त रहते हैं। हे राम! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखीं, जो अनहोती ही फुरती हैं और संकल्पमात्र हैं। जब संकल्प क्षय हो जाता है, तब जगतभ्रम निवृत्त हो जाता है। चित्त के स्पन्दन से सब जगतजाल देखे, पल में ऊपर गया, नीचे गया और दशों दिशाओं में गया, परन्तु सब चैतन्यरूपी समुद्र के बुलबुले थे, और कुछ न भासित हुआ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगज्जालवर्णनं नाम शताधिकसप्तषष्टितमसर्गः ॥ १८० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! चिदाकाश ब्रह्म अपने आप में स्थित है जैसे जल अपने जलभाव में स्थित है—और उसमें जो चैतन्योन्मुखत्व होता है, उसको मुनीश्वर चित्ताकाश कहते हैं। उस मन में संकल्प-विकल्प उठने से जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड बन गये हैं; उनका नाम भूताकाश है। मन से उपजे हैं, इस कारण इनका नाम भूताकाश है। ये संकल्पमात्र हैं, आत्मा से भिन्न नहीं। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! यदि यह नियम है कि ब्रह्मा के दिन में प्राणी उत्पन्न होते हैं; रात्रि में उनका प्रलय हो जाता है और जब महाप्रलय होता है, तब कोई प्राणी नहीं रहता, सब ब्रह्मसत्ता में लीन हो जाते हैं और सब शान्तरूप हो जाते हैं, केवल सूक्ष्म ब्रह्म ही शेष रहता है, तो उस सूक्ष्म

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५९३

ब्रह्म मे फिर कैसे सृष्टि उत्पन्न होती है सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठ- जी बोले, हे राम ! जब महाप्रलय होता है, तब सब भूत नष्ट हो जाते हैं, और ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है । उसको तुम मानते हो; क्योंकि तुमने भी कहा कि पीछे ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है । जब तुमने माना कि सबका कारण ब्रह्म ही शेष रहता है, तब सोचो, वह ब्रह्मसत्ता शुद्ध- स्वरूप और आकाश से भी सूक्ष्म है; वरन् आकाश के हजारहवें भाग से भी अतिसूक्ष्म है । हे राम ! ऐसे सूक्ष्म ब्रह्म में जगत् की उत्पत्ति कैसे कहूँ ? और जब उत्पत्ति ही नहीं तो उसका प्रलय कैसे हो ? यह जगत् जो दिखता है, वह ब्रह्म का हृदय है । अपनी स्वभावसत्ता का नाम हृदय है । जैसे स्वप्न में अपनी संवित् ही देश, काल, पर्वत आदिकरूप रखती है; वैसे ही यह जगत् संवित् रूप है और अपने स्वरूप के अज्ञान में हुए की नाईं दुःखदायक भासता है । जैसे अपनी परछाहीं में अज्ञान से भूत की कल्पना करके बालक भय पाता है, पर जब विचार में देखता है, तब भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं । हे राम ! चैतन्य-संवित् ही जगत् के आकार में भासने होती है, और कुछ वस्तु नहीं । जब सब वही हुआ, तब आदिसर्ग और प्रलय, सब उर्मी के अंग हैं, भिन्न नहीं । 'अस्ति', 'नास्ति', 'उदय', 'अस्त' आदि सब शब्द आकाशरूप हैं और सबका अधिष्ठान आत्मसत्ता है । सब शब्द ब्रह्म ही में होते हैं, और ब्रह्म सब शब्दों से रहित भी है । जो वह शब्दों से रहित हुआ तो जगत् की उत्पत्ति और प्रलय क्योंकर कहा जाय ? आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अकलेद्य और अदृश्य है, इन्द्रियों का विषय नहीं है । जगत् भी अविनाशी है; क्योंकि उपजा ही नहीं । हे राम ! जगत् भी आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मरूप ही है और जब आत्मरूप है तो विकार कहाँ हो ? सब शब्द और अर्थ का अधिष्ठान आत्मसत्ता है । इससे जगत् ब्रह्मस्वरूप है । जैसे अंगवाला सब अंग अपने ही जानता है, वैसे ही सब जगत् ब्रह्म के अंग हैं और वह सबको जानता है । वास्तव में आकाशवत् स्वच्छ, और देश, काल, वस्तु, सुख, दुःख, जन्म, मरण, साकार, निराकार, केवल, अकेवल, नाशी, अविनाशी

५४४ ❉ योगवाशिष्ठ ❉

इत्यादिक सब शब्द और अर्थ उसी के नाम हैं। जैसे सब अवयव अव- यवी पुरुष के हैं, जो उनको फैलावे तो भी अपना स्वरूप है, जो समेटे तो भी अपने अवयव हैं, वैसे ही उत्पत्ति और प्रलय सब ब्रह्म ही के अवयव हैं; भिन्न नहीं। परन्तु भिन्न की नाईं जगत् हुआ भासता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु हुए की नाईं लगता है और किरणें ही जल होकर दिखती हैं, वैसे ही आत्मा जगत् के आकार में भासता है। वह आत्मस्वरूप ही है।

हे राम ! शुद्ध, चिन्मात्र, ब्रह्मरूपी एक वृक्ष है, उसमें जो संवित् का फुरना हुआ है, वही उसकी दृढ़मूल है। चित्त शरीररूपी स्तम्भ है। लोकपाल डालें हैं। शाखा जगत् है। फल प्रकाश है, जिससे जगत् प्रकाशित होता है। अन्धकार श्यामता है। पोल आकाश है। फूलों के गुच्छे प्रलय हैं। गुच्छों को हिलानेवाले भौंरे विष्णु, रुद्रादिक हैं। जड़ता त्वचा है। इस प्रकार सब आत्मब्रह्म है। ब्रह्मतत्वभाव से भी कुछ नहीं बना। सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित है। हे राम! जगत् का भाव, अभाव, उत्पत्ति, प्रलयादिक अनुभवरूप ब्रह्म स्थित है। उसमें कोई विकार नहीं। वह केवल, शुद्ध, निरञ्जन, निर्मल आत्म-आकाश है। जैसे चन्द्रमा के मण्डल में विष की वेल नहीं होती, वैसे ही आत्मा में कोई विकार नहीं होता, वह निर्मल आकाशरूप, आदि-अन्त-मध्य की कल्पना से रहित है। तब लोकपाल आदि का भ्रम कैसे हो ? ये सम्पूर्ण विकार आत्मा के अज्ञान से भासित होते हैं। जब तुम एकाग्रचित्त होकर देखोगे, तब जगद्भ्रम शान्त हो जायगा। यह जगद्भ्रम फुरने से भासित हुआ है। जब फुरना उलटकर आत्मा की ओर आवेगा, तब यह जगद्भ्रम मिट जायगा। जैसे पवन से अग्नि जागता है और पवन ही से दीपक बुझ जाता है, वैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है और जब चित्त का फुरना अन्तर्मुख होता है, तब जगद्भ्रम मिट जाता है। हे राम ! जब ज्ञान से देखोगे, तब अज्ञानरूप फुरने का त्रैकालिक अभाव हो जायगा और आत्मा में बन्धनमुक्ति न भासित होगी—इसमें कुछ संशय नहीं। यह जगत्जाल आत्मा में नहीं उपजा, अज्ञान से

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

भासित होता है। जब विचार करके देखोगे, तब अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य तृणवत् भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बोधजगदेकताप्रतिपादनं नाम शताधिकैकाशीतितमसर्गः ॥ १८१ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जगत्जाल तुमने चिद्रूप होकर एक स्थान में बैठकर देखा अथवा सृष्टि में जाकर देखा ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मैं अनन्त आत्मा, सर्वशक्तिसम्पन्न और सर्वव्यापी चिदाकाश हूँ। मुझमें आना जाना कैसे हो ? न एक स्थान में बैठकर देखा और न सृष्टि में जाकर देखा। हे राम ! मैं चिदाकाश हूँ; मैंने चिदाकाश में ही यह सब देखा। हे राम ! जैसे तुम अपने अङ्गों को शिखा से लेकर नखपर्यन्त देखते हो, वैसे ही मैंने ज्ञाननेत्र से अपने आप ही में जगत् देखा, जो निराकार, निरवयव, आकाशरूप निर्मल, सावयव और फुरने से देख पड़ा है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल आकाशरूप है। जैसे स्वप्न में सृष्टि का अनुभव हो, परन्तु संवित्स्वरूप है, बना कुछ नहीं, और जैसे वृक्ष के पत्ते, डाल, फूल, फल सब वृक्ष के अङ्ग होते हैं, वैसे ही ज्ञाननेत्र से मैंने जगत् को देखा। हे राम ! जैसे समुद्र अपने तरङ्ग, फेन, बुलबुले और जल को अपने आप ही में देखता है, वैसे ही मैं अपने आपमें जगत् को देखता हूँ। अब भी मैं इस देह में स्थित हुआ पर्वत की सृष्टि को ज्ञान से देखता हूँ। जैसे कुटी के भीतर-बाहर आकाश एकरूप है, वैसे ही मुझको आगे और अब भी आकाशरूप जगत् अपने आपमें भासित होते हैं। जैसे जल अपने रस को जानता है, बरफ अपनी शीतलता को जानता है और पवन अपनी स्पन्दनता को जानता है, वैसे ही मैंने ज्ञान से सृष्टि को अपने में देखा। जिस ज्ञानवान् पुरुष की शुद्ध बुद्धि में एकता हुई है, वह अपने को सर्वात्मा देखता है और जिसको आत्मस्थिति हुई है, वह अवेदन को भी अवेदन देखता है और कभी उपजा नहीं मानता। जैसे देवता अपने-अपने स्थान में बैठे हुए दिव्यनेत्रों मे कोटि योजनपर्यन्त अपने को विद्यमान देखते हैं, वैसे ही जगतों को मैंने सर्वात्म होकर देखा। जैसे पृथ्वी में जो निधि,

५४६ ॠ योगवाशिष्ठ ॠ

औषध और रूपसहित पदार्थ होते हैं, उन्हें पृथ्वी अपने में ही देखती है, वैसे ही मैंने जगत् को अपने में ही देखा ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह जो छन्द का पाठ करनेवाली कमल-नयनी कान्ता थी, उसने फिर क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह आकाश शरीर को धारण करके मेरे निकट आई और जैसे भवानी आकाश में आकर स्थित हों, वैसे ही आकर स्थित हुई । जैसे में आकाश-शरीर था, वैसे ही उसको भी मैंने आकाश-शरीर देखा । प्रथम मैंने आकाश में इस कारण न देखा कि मेरा आधिभौतिक शरीर था । जब चित्पद होकर में स्थित हुआ, तब वह कान्ता देखी । में आकाशरूप हूँ और वह सुन्दरी भी आकाशरूप है और जगज्जाल जो देखे थे भी आकाशरूप है । श्रीराम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम भी आकाशरूप थे और वह भी आकाशरूप थी, पर वचन-विलास तो तब होता है, जब शरीर होता है, उसमें बोलने का स्थान कण्ठ, तालु, नासिका, दन्त, होठ और हृदय में पेरनेवाले प्राण होते हैं और अक्षर का उच्चारण होता है । पर तुम दोनों तो निराकार थे; तुमने देखा और बोला किस प्रकार ? बोलना रूप, अवलोक और मनस्कार से होता है-रूप अर्थात् दृश्य, अवलोक अर्थात् इन्द्रियाँ और मनस्कार अर्थात् मन का फुरना-इन तीनों के बिना तुम कैसे बोले ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्वप्न में रूप, अवलोक और मनस्कार; शब्दपाठ और परस्पर वचन जो होते हैं, वे आकाशरूप होते हैं । वैसे ही हमारा देखना, बोलना और आपस में संवाद हुआ था । जैसे स्वप्न में रूप, अवलोक और मनस्कार आकाश-रूप होते हैं और प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं, वैसे ही हमारा देखना और बोलना हुआ । यह प्रश्न तुम्हारा सही नहीं कि देखना और बोलना कैसे हुआ ? जैसे आकाश में सृष्टि देखी है, वैसे ही यह सृष्टि भी है, और जैसे उनके शरीर थे, वैसे ही इनके और हमारे शरीर हैं; जैसे यह जगत् है, वैसे ही वह जगत् है ।

हे राम ! यह आश्चर्य है कि सत् वस्तु नहीं भासित होता और असत् वस्तु भासित होती है । जैसे स्वप्न में पृथ्वी पर्वत, समुद्र और

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

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जगत् व्यवहार वास्तविक नहीं, पर प्रत्यक्ष लगता है और सत् वस्तु अनुभवरूप नहीं भामती. वैसे ही हम, तुम, जगत्, सब आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में युद्ध होते दिखते हैं, शब्द होते हैं और आना जाना दिखता है, वह सब आकाशरूप है, हुआ कुछ नहीं. वैसे ही यह जगत् भी है। हे राम! स्वप्न सृष्टि मिथ्या है. कुछ बना नहीं और जो कुछ है सो अनुभव रूप है—भिन्न कुछ नहीं। जो तुम पूछो कि स्वप्न क्या है और कैसे होता है, तो सुनो. आदि परमात्मतत्त्व में स्वप्न में किंचन, हुआ है, सो वह विराट् आत्मा है। फिर उससे ये जीव हुए हैं, सो वे आकाशरूप हैं; क्योंकि विराट् आकाशरूप है और ये सब भी आकाश-रूप हैं। स्वप्न का दृष्टान्त भी मैंने बोध के निमित्त तुमसे कहा है, क्योंकि स्वप्न भी कुछ हुआ नहीं, केवल आत्मतत्त्वमात्र है; ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। हे राम! वह कान्ता जब मैंने देखी तो मैंने उससे पूछा, क्योंकि संकल्प मेरा और उसका एक था। जैसे स्वप्न में स्वप्न होता है, वैसे ही हमारा हुआ। हे राम! जैसे स्वप्न की सृष्टि आकाशरूप होती है, वैसे ही हम, तुम और सब जगत् आकाश है, कुछ हुआ नहीं। स्वप्न-जगत् और जाग्रत्-जगत् एक रूप हैं, परन्तु जाग्रत् दीर्घकाल का स्वप्न है, इससे इसमें दृढ व्यवहार, उत्पत्ति और प्रलय होने लगते हैं। हे राम! स्वप्न में भोग होते जान पड़ते हैं, सो भ्रान्तिमात्र है; निर्मल आकाशरूप आत्मा से भिन्न कुछ नहीं बना। दृश्य और द्रष्टा स्वप्न की नाईं अनहोते भी भाषित होते हैं। हम, तुम आदि दृश्य को मनरूपी द्रष्टा जो सत्य मानता है सो दोनों अज्ञान हैं भ्रममात्र उदय हुए हैं। जो शुद्ध द्रष्टा है, वह दृश्य से रहित है। जैसे द्रष्टा आकाश-रूप है, वैसे ही दृश्य भी आकाशरूप है और जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् भी अनुभवरूप है।

हे राम! चिदाकाश जो अनन्त आत्मा है, वह इस जगत् का कारण कैसे हो सकता है? जैसे स्वप्न की सृष्टि का कारण कोई नहीं, वैसे ही इस जाग्रत्-जगत् का कारण भी कोई नहीं; क्योंकि हुआ कुछ नहीं, जो कुछ है वह अनुभवरूप है—इससे यह जगत् अकारण है। हे राम!

५४८

  • योगवाशिष्ठ *

सब जीव आकाशरूप हैं और अनेक स्वप्न की सृष्टि जो नाना प्रकार की होती है वह भी आकाशरूप है । उसका कुछ आकार नहीं । जो निराकार अद्वैत आत्मसत्ता है, उसमें आदि में आभासरूप जगत् फुरा है, तो वह आकाशरूप क्यों न हो ? अब साकार और निराकार का भेद कहते हैं, सो सुनो । एक चित् है, दूसरा चैत्य । चित्शुद्ध चिन्मात्र का नाम है और चैत्य दृश्य फुरने को कहते हैं । जिस चित् में दृश्य का सम्बन्ध है, उसका नाम जीव है । जिस चित् का अज्ञान में द्वैत का सम्बन्ध है, और अनात्म में आत्म-अभिमान है, वह जीव साकाररूप है । उसके स्वप्न की सृष्टि भी आकाशरूप है । जो अचैत्य चिन्मात्र निराकार सत्ता है, तो उसका स्वप्न आभासरूप जगत् आकाशरूप क्यों न हो ? हे राम ! यह जगत् निरुपादान है अर्थात कुछ बना नहीं और चिदाकाश निराकाररूप है । जैसे स्वप्न में जगत् अकृत्रिम होता है, वैसे ही यह जगत् है । न इसका कोई निमित्तकारण है और न समवायकारण । पर आत्मा अच्युत और अद्वैत है । उसे दृश्य का कारण कैसे कहिये । हे राम ! न कोई करता है, न भोक्ता है, न कोई जगत् है और नहीं कहना भी नहीं बनता । जो ज्ञानवान् है वह पाषाणवत् मौन स्थित होता है और जब प्रकृत आचार आ पड़ता है, तब उसको भी करता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदेकताप्रतिपादनं शताधिकद्व्यशीतितमसर्गः ॥ १८२ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह जो तुम्हारे निकट आकाशरूप कान्ता आई तो वह शरीर बिना अनेक क, च, ट, त आदिक अक्षर कैसे बोली ? जो तुम स्वप्न की नाईं कहो तो स्वप्न में भी केवल आकाश होता है । वहाँ य, र, ल, व आदिक कैसे बोलते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्वप्न में जो शरीर होता है वह आकाशरूप है । उसमें क, च, ट, त आदिक अक्षर कभी उद्दिष्ट नहीं हुए, जैसे मृतक कभी नहीं बोलता वैसे ही आकाशरूप आत्मा में शब्द कभी नहीं उठता । जो तुम कहो कि स्वप्न में जो य, र, ल, व आदिक अक्षर प्रवृत्त होते हैं, तो उसका