योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 539, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण * ५३६
और कहने लगी—हे मुनीश्वर ! और संसार जो मैंने देखा है वह सामान्यधर्मा मुझको दिखा है, पर तुम उत्तमधर्मा और संसारसमुद्र के पार हुए दिखते हो। तुम संसारसमुद्र से पार हो। जो कोई तुम्हारी ओर आता है, उसके आश्रयस्वरूप हो और उसको भवसागर से निकाल भी लेते हो, पर और जीव संसारसमुद्र में बहे जाते हैं और तुम पार हुए हो; इससे तुमको नमस्कार है। हे राम! जब इस प्रकार उस अङ्गना ने कहा, तब मैं आश्चर्य में हुआ कि इसने मुझे कभी देखा सुना भी नहीं, फिर क्योंकर जाना? तब मैंने ऐसे विचार किया कि यह माया का कोई चरित्र है और सब ब्रह्माण्ड मुझको इसी में दिखे हैं। हे राम! ऐसे विचारकर में फिर आकाश को उड़ा। तब और सृष्टि दिखने लगी। जैसे स्वप्न की सृष्टि, संकल्प की सृष्टि और गन्धर्वनगर की सृष्टि होती है, वैसे ही यह सृष्टि है—वास्तव में कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्नादिक की सृष्टि अनहोती भासती है, वैसे ही यह जगत् है—केवल बोधमात्र आत्मा अपने आपमें स्थित है। हे राम! जब में बोध में स्थित होकर देखता, तब मुझको आत्मा ही दिखता; और जब संकल्प करके देखता, तब नाना प्रकार के जगत् भासित होते—कहीं नष्ट होते और कहीं नष्ट होकर उत्पन्न होते जैसे पीपल के पत्ते गिरते हैं और वैसे ही उपजते हैं, वैसे ही जगत् उपजते देखे। कहीं ऐसे दिखे कि नाश होकर और के और उत्पन्न हो रहे हैं, कहीं उत्पन्न होते ही दिखते और कहीं भिन्न-भिन्न सृष्टि और भिन्न-भिन्न शास्त्र देखे। कहीं सूर्य, चन्द्रमा तारों का चक्र ऐसे ही फिरता दिखा और कहीं और प्रकार देखा। कहीं नरक की सृष्टि और कहीं स्वर्ग के स्थान देखे। इसी प्रकार अनन्त सृष्टियाँ देखीं। अनन्त रुद्र देखे। अनन्त ब्रह्मा देखे। अनन्त विष्णु देखे। कहीं प्रलय के मेघ गरजते थे। कहीं सुमेरु आदिक पर्वत उड़ते दिखते थे। कहीं ब्रह्माण्ड जलते और द्वादश सूर्य तपते थे और कहीं ऐसे स्थान नजर आते थे कि प्राणी जन्मते ही पुष्ट हो जाते। कहीं ऐसी सृष्टि दृष्टि गोचर हुई कि एक सृष्टि में मरा और दूसरी सृष्टि में आया और दूसरी सृष्टि में मरा उसी सृष्टि में आया। कहीं प्रलय होता देखा