योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३८ * योगवाशिष्ठ *
हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश में चित्तरूपी गन्धर्व ने सृष्टि रची है, पर स्वरूप से भिन्न कुछ उपजा नहीं—सब अकारण है । जो समवायकारण बिना सृष्टि भासित हो, उसे भ्रममात्र जानिये । जैसे स्वप्न की सृष्टि बिना कारण होती है और अर्थाकार मानती है तो भी अजात जात है अर्थात उपजे बिना उपजी भासित है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि आभास मात्र है । हे राम ! आभास में भी अधिष्ठानसत्ता होती है, जिसके आश्रय से आभास फुरता है । सच्चिदानन्द ब्रह्म सबका अधिष्ठान है । सब आत्मसत्ता में ही स्थित हैं—ब्रह्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं । चेतना में ही नानात्व भासता है, परन्तु नानात्व हुआ कुछ नहीं; आत्मा ही सर्वदा अपने आप में स्थित है । जैसे क्षीरसमुद्र में वायु से नाना प्रकार के तरङ्ग उठते दीखते, तो भी क्षीर से भिन्न नहीं—ऐसा क्षीरसमुद्र का तरङ्ग कोई नहीं, जिसमें घृत न हो, वैसे ही जो कुछ पदार्थ हैं, उन सबमें ब्रह्मसत्ता प्रविष्ट है । जैसे दूध को मथने से घृत निकलता है, वैसे ही विचार करने से जगत् ब्रह्मस्वरूप भासता है—कुछ भिन्न नहीं दिखता, क्योंकि कारण द्वारा कुछ नहीं उपजा, परमार्थ से केवल आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है । स्फुरणरूपी भ्रम से कुछ हुआ दृष्टिगत होता है और जब स्फुरणरूपी भ्रम निवृत्त होता है, तब ब्रह्म ही दिखता है; इससे अविद्यारूप स्फुरण को त्यागकर अपने निर्विकल्पस्वरूप में स्थित होओ । तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जायगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगज्जालसमुद्भवोनाम शताधिकनवतमतितमसर्गः ॥ १७६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार मैंने सृष्टि देखी, तब फिर विचार हुआ कि वह शब्द करनेवाला कौन था, उसको देखूँ । तब मैं देखने लगा तो देखते-देखते वीणा का सा शब्द सुना । परन्तु उसको न देखा । तब फिर देखा तो शब्द का अर्थ भासित होने लगा । फिर देखा तो एक स्त्री दीख पड़ी, जिसका शरीर सुवर्णसदृश था; बहुत सुन्दर वस्त्र पहिने हुए थी और सब अङ्ग भूषणों से भूषित थे; मानो लक्ष्मी या भवानी थी । जब मैंने उसको देखा, तब वह मेरे निकट आई