भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 537

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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हे राम ! ऐसी अनन्त सृष्टियाँ देखीं. पर एक की सृष्टि को दूसरा न जानता था; सब अपनी-अपनी सृष्टि को जानते थे । जैसे अनेक मनुष्य एकही काल में शयन करते हैं और अपनी-अपनी स्वप्न सृष्टि देखते हैं, तो भी दूसरी सृष्टि को वे नहीं जानते। हे राम ! कुछ ऐसी सृष्टियाँ देखीं, जहाँ न सूर्य का प्रकाश था न चन्द्रमा का। न अग्नि का प्रकाश था । पर उनकी चेष्टा होती थी । कहीं ऐसा सृष्टि देखी, जहाँ सूर्य और चन्द्रमा हैं और कहीं ऐसी देखी कि उसको काल का ज्ञान भी नहीं और न वहाँ कोई दिन है, न रात्रि है, सदा एक समान रहती हैं। कहीं महाशून्यरूप तम ही दिखा, कहीं ऐसा दिखा कि देवता ही रहते हैं। कहीं मनुष्य ही रहते हैं। कहीं तिर्यक् पशुपक्षी कीट-पतंग ही रहते हैं। कहीं दैत्य ही देखे। कहीं जल ही देखा, और कोई तत्त्व न देख पड़ा । कहीं ऐसी सृष्टि नजर आई, जहाँ शास्त्र का विचार ही नहीं। कहीं शास्त्र-पुराण विपर्यरूप थे और कहीं समान थे। कहीं प्रलय होता देखा, और कहीं उत्पत्ति होती देखी । हे राम ! इसी प्रकार अनन्त सृष्टियाँ मैंने देखीं, परन्तु जब स्वरूप की ओर देखता, तब केवल ब्रह्मरूप ही दिखता और कुछ बना न दिखता। और जब संकल्प करके देखता, तब अनन्त सृष्टि दिखती । कहीं ऐसी सृष्टि दिखती, जहाँ बालक, वृद्ध, यौवन अवस्था की मर्यादा ही नहीं—जैसे जन्मे वैसे ही रहे—कहीं ऐसी सृष्टि है कि चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश नहीं, अग्नि के प्रकाश से उनकी चेष्टा होती है। कहीं ऐसा दिखा कि ऊपर को चले जावें; कहीं नीचे को चले जावें । कहीं ऐसे प्राणी देखे; जो शास्त्र की मर्यादा मे चेष्टा करते हैं । कहीं कृमि ही बसते हैं, और कोई नहीं । हे राम चैतन्यरूपी वन में मैंने अनन्त सृष्टिरूपी वृक्ष देखे, परन्तु दूसरा कुछ बना न देख पड़ा, सब चैतन्य का आभास ही नजर आया । जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है और बना कुछ नहीं, वैसे ही सृष्टि बनी कुछ नहीं । जैसे आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भासता है, वैसे ही अन-होती सृष्टि दिखती है । जैसे मरुस्थल में जल और गन्धर्वनगर की सृष्टि दिखती है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि भासित होती है।