योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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- योगवासिष्ठ *
कहीं ज्यों की त्यों सृष्टि देखी। जैसे दो पुरुष एक ही शय्या पर सोये हों और दोनों को स्वप्न आवे तो एक की सृष्टि में प्रलय होता है और दूसरे की ज्यों की त्यों रहती है। इसमें कुछ आश्चर्य नहीं।
हे राम ! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखीं, परन्तु उनमें सार ब्रह्मसत्ता ही थी और सब स्वप्नवत् थे। जैसे केले के वृक्ष में सार कुछ नहीं निकलता, वैसे ही उस स्थान में सार कुछ न देखा। हे राम ! क्रिया—काल आदि सब विश्व ब्रह्मस्वरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग बुल-बुले सब जलरूप हैं, वैसे ही सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है, भिन्न नहीं। जैसे क्षीरसमुद्र में तरङ्ग क्षीर से भिन्न नहीं होते, वैसे ही तुम और मैं, सब जगत् ब्रह्म ही है। जब मैं बोध की ओर देखता, तब सब ब्रह्म ही दिखता और जब संकल्प की ओर देखता, तब नाना प्रकार का जगत् दिखता। इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखीं। कहीं ऐसी सृष्टि देखी जो अधूरी ही थी। कहीं गुणों की सृष्टि देखी। कहीं ऐसी सृष्टि थी कि धर्म-अधर्म को जानती ही न थी। हे राम ! एक सौ पचास सृष्टियाँ त्रेता-युग की मैंने देखीं, जो भिन्न-भिन्न थीं और भिन्न ही भिन्न जगत् भी थे। उनमें ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ भिन्न-भिन्न देखे, जिनको मेरे ही समान ज्ञान था और जिनकी मेरे ही समान मूर्ति थी। उनमें कोई-कोई मुझसे उत्तम भी थे और उन सबके आगे उपदेश लेने के निमित्त राम बैठे थे। त्रेतायुग में अनेक युग और अनेक द्वापर, त्रेता और सतयुग देखे, जो सब चैतन्य आकाश के आश्रय में थे। हे राम ! हुए बिना ही यह सब दीखा। जैसे मरुस्थल में जल, आकाश में अनहोनी नीलता और रज्जू में सर्प भासित होता है, वैसे ही ब्रह्म से अनहोता जगत् भासित होता है। हे राम ! मन के फुरने से जगत् भासता है। और उसके मिटने से सब ब्रह्म ही भासता है। हे राम ! जैसे सूर्य की किरणों में अनन्त त्रसरेणु दिखते हैं, वैसे ही अनन्त सृष्टियाँ देखीं, जो एक चैतन्य से अनेक चैतन्य दीखीं। जैसे वृक्ष में फल प्रकट होते हैं, वैसे ही संकल्परूपी वृक्ष में सृष्टिरूपी फल देख पड़े।
जैसे एक गूलर के फल में अनन्त मच्छर होते हैं, वैसे ही एक