भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 541

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५४१

आत्मसत्ता के आश्रित अनन्त सृष्टियाँ संकल्प के फुरने से मुझको देख पड़ीं। कहीं महाप्रलय के क्षोभ होते थे और समुद्र उछलते थे। उनके तरङ्ग देवलोक को गिराते थे। कहीं श्याम रंग का चन्द्रमा उष्ण और सूर्य शीतल दीखता था। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि दिन को अँधेरा हो जाता और रात्रि को जीव उलूक आदि की नाईं चेष्टा करते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि उनको रात्रि और दिन का कुछ ज्ञान न था। काल का ज्ञान नहीं, और धर्म-अधर्म का भी ज्ञान नहीं। मनमाने आचरण करते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि पुण्य करने वाले नरक को जाते थे और पापी स्वर्ग को जाते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि बालू से तेल निकलता था, विषपान से लोग अमर होते थे और अमृत-पान से मर जाते थे। हे राम! जैसे किसी का निश्चय होता है, वैसा ही आगे भासित होता है। यह जगत् संकल्पमात्र है। जैसी भावना होती है, वैसा ही आगे होकर भासता है। कहीं पत्थरों में कमल उपजते थे और कहीं वृक्षों में रत्न और हीरे नजर आते थे। आकाश में बड़े प्रकाश से युक्त वृक्षों के वन देख पड़े। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि बादल ही उनके वस्त्र हैं और वस्त्रों की नाईं बादलों को पहन लें। कहीं शीश पर भार लिये सब चेष्टा करते थे। निदान अन्धे, काने, बहरे इत्यादि लोगों की नाना प्रकार की सृष्टि देखी। हे राम! जब मैं स्वरूप की ओर देखता, तब सब सृष्टि शून्यरूप दिखती और जब संकल्प की ओर देखता, तब नाना प्रकार का जगत् भासित हो। कहीं ऐसी ही सृष्टि दृष्टि आई कि लोग चन्द्रमा और सूर्य को जानते ही नहीं। कहीं एक पृथ्वी की सृष्टि पृथ्वी में; अग्नि की सृष्टि अग्नि में और जल की सृष्टि जल में देखी। कहीं पाँच भूतों की सृष्टि देखी- जैसे यह विद्यमान है। और कहीं कठपुतली की तरह सृष्टि चेष्टा करती देखी- जैसे यह विद्यमान है और भोजन करती है। कहीं-कहीं प्राणों बिना यन्त्र की पुतली भी चेष्टा करती देखी। हे राम! जब ऐसी सृष्टियाँ देखीं तो मैं महाआकाश में अनन्त योजन पर्यन्त चला गया। परन्तु एक आकाश ही दृष्टिगोचर था, और कोई तत्त्व न दीखा। फिर ऐसी सृष्टि