योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८२ * योगवाशिष्ठ *
देखी कि वे खाना, पीना, आदि सब चेष्टा वैताल की नाईं करते थे, परन्तु देख न पड़ते थे। जैसे वैताल सब चेष्टा करते हैं और दृष्टिगत नहीं होते, वैसे ही वे दृष्टि न आते थे। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि जहाँ मैं और तुम की कल्पना भी नहीं, केवल निश्चलभाव था, और कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि उनके मन ही नहीं था। कहीं अहंकार-सृष्टि देखी; कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि वे मय में आत्मभावना करते हैं; कहीं सब अपना रूप ही जानें और भेद-भावना किसी में न करें। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि सब मांस की लक्ष्मी से शोभित हैं। कहीं ऐसी सृष्टि देखी कि उपजकर नाश हो जाते हैं—जैसे नख और केश उपजते हैं—और कहीं ऐसे देखे कि चिरकाल पर्यन्त रहते हैं। हे राम! इस प्रकार मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखीं, जो अनहोती ही फुरती हैं और संकल्पमात्र हैं। जब संकल्प क्षय हो जाता है, तब जगतभ्रम निवृत्त हो जाता है। चित्त के स्पन्दन से सब जगतजाल देखे, पल में ऊपर गया, नीचे गया और दशों दिशाओं में गया, परन्तु सब चैतन्यरूपी समुद्र के बुलबुले थे, और कुछ न भासित हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगज्जालवर्णनं नाम शताधिकसप्तषष्टितमसर्गः ॥ १८० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! चिदाकाश ब्रह्म अपने आप में स्थित है जैसे जल अपने जलभाव में स्थित है—और उसमें जो चैतन्योन्मुखत्व होता है, उसको मुनीश्वर चित्ताकाश कहते हैं। उस मन में संकल्प-विकल्प उठने से जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड बन गये हैं; उनका नाम भूताकाश है। मन से उपजे हैं, इस कारण इनका नाम भूताकाश है। ये संकल्पमात्र हैं, आत्मा से भिन्न नहीं। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! यदि यह नियम है कि ब्रह्मा के दिन में प्राणी उत्पन्न होते हैं; रात्रि में उनका प्रलय हो जाता है और जब महाप्रलय होता है, तब कोई प्राणी नहीं रहता, सब ब्रह्मसत्ता में लीन हो जाते हैं और सब शान्तरूप हो जाते हैं, केवल सूक्ष्म ब्रह्म ही शेष रहता है, तो उस सूक्ष्म