भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 543

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५९३

ब्रह्म मे फिर कैसे सृष्टि उत्पन्न होती है सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठ- जी बोले, हे राम ! जब महाप्रलय होता है, तब सब भूत नष्ट हो जाते हैं, और ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है । उसको तुम मानते हो; क्योंकि तुमने भी कहा कि पीछे ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है । जब तुमने माना कि सबका कारण ब्रह्म ही शेष रहता है, तब सोचो, वह ब्रह्मसत्ता शुद्ध- स्वरूप और आकाश से भी सूक्ष्म है; वरन् आकाश के हजारहवें भाग से भी अतिसूक्ष्म है । हे राम ! ऐसे सूक्ष्म ब्रह्म में जगत् की उत्पत्ति कैसे कहूँ ? और जब उत्पत्ति ही नहीं तो उसका प्रलय कैसे हो ? यह जगत् जो दिखता है, वह ब्रह्म का हृदय है । अपनी स्वभावसत्ता का नाम हृदय है । जैसे स्वप्न में अपनी संवित् ही देश, काल, पर्वत आदिकरूप रखती है; वैसे ही यह जगत् संवित् रूप है और अपने स्वरूप के अज्ञान में हुए की नाईं दुःखदायक भासता है । जैसे अपनी परछाहीं में अज्ञान से भूत की कल्पना करके बालक भय पाता है, पर जब विचार में देखता है, तब भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं । हे राम ! चैतन्य-संवित् ही जगत् के आकार में भासने होती है, और कुछ वस्तु नहीं । जब सब वही हुआ, तब आदिसर्ग और प्रलय, सब उर्मी के अंग हैं, भिन्न नहीं । 'अस्ति', 'नास्ति', 'उदय', 'अस्त' आदि सब शब्द आकाशरूप हैं और सबका अधिष्ठान आत्मसत्ता है । सब शब्द ब्रह्म ही में होते हैं, और ब्रह्म सब शब्दों से रहित भी है । जो वह शब्दों से रहित हुआ तो जगत् की उत्पत्ति और प्रलय क्योंकर कहा जाय ? आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अकलेद्य और अदृश्य है, इन्द्रियों का विषय नहीं है । जगत् भी अविनाशी है; क्योंकि उपजा ही नहीं । हे राम ! जगत् भी आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मरूप ही है और जब आत्मरूप है तो विकार कहाँ हो ? सब शब्द और अर्थ का अधिष्ठान आत्मसत्ता है । इससे जगत् ब्रह्मस्वरूप है । जैसे अंगवाला सब अंग अपने ही जानता है, वैसे ही सब जगत् ब्रह्म के अंग हैं और वह सबको जानता है । वास्तव में आकाशवत् स्वच्छ, और देश, काल, वस्तु, सुख, दुःख, जन्म, मरण, साकार, निराकार, केवल, अकेवल, नाशी, अविनाशी

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