योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५९३
ब्रह्म मे फिर कैसे सृष्टि उत्पन्न होती है सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठ- जी बोले, हे राम ! जब महाप्रलय होता है, तब सब भूत नष्ट हो जाते हैं, और ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है । उसको तुम मानते हो; क्योंकि तुमने भी कहा कि पीछे ब्रह्मसत्ता ही शेष रहती है । जब तुमने माना कि सबका कारण ब्रह्म ही शेष रहता है, तब सोचो, वह ब्रह्मसत्ता शुद्ध- स्वरूप और आकाश से भी सूक्ष्म है; वरन् आकाश के हजारहवें भाग से भी अतिसूक्ष्म है । हे राम ! ऐसे सूक्ष्म ब्रह्म में जगत् की उत्पत्ति कैसे कहूँ ? और जब उत्पत्ति ही नहीं तो उसका प्रलय कैसे हो ? यह जगत् जो दिखता है, वह ब्रह्म का हृदय है । अपनी स्वभावसत्ता का नाम हृदय है । जैसे स्वप्न में अपनी संवित् ही देश, काल, पर्वत आदिकरूप रखती है; वैसे ही यह जगत् संवित् रूप है और अपने स्वरूप के अज्ञान में हुए की नाईं दुःखदायक भासता है । जैसे अपनी परछाहीं में अज्ञान से भूत की कल्पना करके बालक भय पाता है, पर जब विचार में देखता है, तब भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं । हे राम ! चैतन्य-संवित् ही जगत् के आकार में भासने होती है, और कुछ वस्तु नहीं । जब सब वही हुआ, तब आदिसर्ग और प्रलय, सब उर्मी के अंग हैं, भिन्न नहीं । 'अस्ति', 'नास्ति', 'उदय', 'अस्त' आदि सब शब्द आकाशरूप हैं और सबका अधिष्ठान आत्मसत्ता है । सब शब्द ब्रह्म ही में होते हैं, और ब्रह्म सब शब्दों से रहित भी है । जो वह शब्दों से रहित हुआ तो जगत् की उत्पत्ति और प्रलय क्योंकर कहा जाय ? आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अकलेद्य और अदृश्य है, इन्द्रियों का विषय नहीं है । जगत् भी अविनाशी है; क्योंकि उपजा ही नहीं । हे राम ! जगत् भी आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मरूप ही है और जब आत्मरूप है तो विकार कहाँ हो ? सब शब्द और अर्थ का अधिष्ठान आत्मसत्ता है । इससे जगत् ब्रह्मस्वरूप है । जैसे अंगवाला सब अंग अपने ही जानता है, वैसे ही सब जगत् ब्रह्म के अंग हैं और वह सबको जानता है । वास्तव में आकाशवत् स्वच्छ, और देश, काल, वस्तु, सुख, दुःख, जन्म, मरण, साकार, निराकार, केवल, अकेवल, नाशी, अविनाशी
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इत्यादिक सब शब्द और अर्थ उसी के नाम हैं। जैसे सब अवयव अव- यवी पुरुष के हैं, जो उनको फैलावे तो भी अपना स्वरूप है, जो समेटे तो भी अपने अवयव हैं, वैसे ही उत्पत्ति और प्रलय सब ब्रह्म ही के अवयव हैं; भिन्न नहीं। परन्तु भिन्न की नाईं जगत् हुआ भासता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु हुए की नाईं लगता है और किरणें ही जल होकर दिखती हैं, वैसे ही आत्मा जगत् के आकार में भासता है। वह आत्मस्वरूप ही है।
हे राम ! शुद्ध, चिन्मात्र, ब्रह्मरूपी एक वृक्ष है, उसमें जो संवित् का फुरना हुआ है, वही उसकी दृढ़मूल है। चित्त शरीररूपी स्तम्भ है। लोकपाल डालें हैं। शाखा जगत् है। फल प्रकाश है, जिससे जगत् प्रकाशित होता है। अन्धकार श्यामता है। पोल आकाश है। फूलों के गुच्छे प्रलय हैं। गुच्छों को हिलानेवाले भौंरे विष्णु, रुद्रादिक हैं। जड़ता त्वचा है। इस प्रकार सब आत्मब्रह्म है। ब्रह्मतत्वभाव से भी कुछ नहीं बना। सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित है। हे राम! जगत् का भाव, अभाव, उत्पत्ति, प्रलयादिक अनुभवरूप ब्रह्म स्थित है। उसमें कोई विकार नहीं। वह केवल, शुद्ध, निरञ्जन, निर्मल आत्म-आकाश है। जैसे चन्द्रमा के मण्डल में विष की वेल नहीं होती, वैसे ही आत्मा में कोई विकार नहीं होता, वह निर्मल आकाशरूप, आदि-अन्त-मध्य की कल्पना से रहित है। तब लोकपाल आदि का भ्रम कैसे हो ? ये सम्पूर्ण विकार आत्मा के अज्ञान से भासित होते हैं। जब तुम एकाग्रचित्त होकर देखोगे, तब जगद्भ्रम शान्त हो जायगा। यह जगद्भ्रम फुरने से भासित हुआ है। जब फुरना उलटकर आत्मा की ओर आवेगा, तब यह जगद्भ्रम मिट जायगा। जैसे पवन से अग्नि जागता है और पवन ही से दीपक बुझ जाता है, वैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है और जब चित्त का फुरना अन्तर्मुख होता है, तब जगद्भ्रम मिट जाता है। हे राम ! जब ज्ञान से देखोगे, तब अज्ञानरूप फुरने का त्रैकालिक अभाव हो जायगा और आत्मा में बन्धनमुक्ति न भासित होगी—इसमें कुछ संशय नहीं। यह जगत्जाल आत्मा में नहीं उपजा, अज्ञान से
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भासित होता है। जब विचार करके देखोगे, तब अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य तृणवत् भासित होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बोधजगदेकताप्रतिपादनं नाम शताधिकैकाशीतितमसर्गः ॥ १८१ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जगत्जाल तुमने चिद्रूप होकर एक स्थान में बैठकर देखा अथवा सृष्टि में जाकर देखा ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मैं अनन्त आत्मा, सर्वशक्तिसम्पन्न और सर्वव्यापी चिदाकाश हूँ। मुझमें आना जाना कैसे हो ? न एक स्थान में बैठकर देखा और न सृष्टि में जाकर देखा। हे राम ! मैं चिदाकाश हूँ; मैंने चिदाकाश में ही यह सब देखा। हे राम ! जैसे तुम अपने अङ्गों को शिखा से लेकर नखपर्यन्त देखते हो, वैसे ही मैंने ज्ञाननेत्र से अपने आप ही में जगत् देखा, जो निराकार, निरवयव, आकाशरूप निर्मल, सावयव और फुरने से देख पड़ा है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल आकाशरूप है। जैसे स्वप्न में सृष्टि का अनुभव हो, परन्तु संवित्स्वरूप है, बना कुछ नहीं, और जैसे वृक्ष के पत्ते, डाल, फूल, फल सब वृक्ष के अङ्ग होते हैं, वैसे ही ज्ञाननेत्र से मैंने जगत् को देखा। हे राम ! जैसे समुद्र अपने तरङ्ग, फेन, बुलबुले और जल को अपने आप ही में देखता है, वैसे ही मैं अपने आपमें जगत् को देखता हूँ। अब भी मैं इस देह में स्थित हुआ पर्वत की सृष्टि को ज्ञान से देखता हूँ। जैसे कुटी के भीतर-बाहर आकाश एकरूप है, वैसे ही मुझको आगे और अब भी आकाशरूप जगत् अपने आपमें भासित होते हैं। जैसे जल अपने रस को जानता है, बरफ अपनी शीतलता को जानता है और पवन अपनी स्पन्दनता को जानता है, वैसे ही मैंने ज्ञान से सृष्टि को अपने में देखा। जिस ज्ञानवान् पुरुष की शुद्ध बुद्धि में एकता हुई है, वह अपने को सर्वात्मा देखता है और जिसको आत्मस्थिति हुई है, वह अवेदन को भी अवेदन देखता है और कभी उपजा नहीं मानता। जैसे देवता अपने-अपने स्थान में बैठे हुए दिव्यनेत्रों मे कोटि योजनपर्यन्त अपने को विद्यमान देखते हैं, वैसे ही जगतों को मैंने सर्वात्म होकर देखा। जैसे पृथ्वी में जो निधि,
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औषध और रूपसहित पदार्थ होते हैं, उन्हें पृथ्वी अपने में ही देखती है, वैसे ही मैंने जगत् को अपने में ही देखा ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह जो छन्द का पाठ करनेवाली कमल-नयनी कान्ता थी, उसने फिर क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह आकाश शरीर को धारण करके मेरे निकट आई और जैसे भवानी आकाश में आकर स्थित हों, वैसे ही आकर स्थित हुई । जैसे में आकाश-शरीर था, वैसे ही उसको भी मैंने आकाश-शरीर देखा । प्रथम मैंने आकाश में इस कारण न देखा कि मेरा आधिभौतिक शरीर था । जब चित्पद होकर में स्थित हुआ, तब वह कान्ता देखी । में आकाशरूप हूँ और वह सुन्दरी भी आकाशरूप है और जगज्जाल जो देखे थे भी आकाशरूप है । श्रीराम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम भी आकाशरूप थे और वह भी आकाशरूप थी, पर वचन-विलास तो तब होता है, जब शरीर होता है, उसमें बोलने का स्थान कण्ठ, तालु, नासिका, दन्त, होठ और हृदय में पेरनेवाले प्राण होते हैं और अक्षर का उच्चारण होता है । पर तुम दोनों तो निराकार थे; तुमने देखा और बोला किस प्रकार ? बोलना रूप, अवलोक और मनस्कार से होता है-रूप अर्थात् दृश्य, अवलोक अर्थात् इन्द्रियाँ और मनस्कार अर्थात् मन का फुरना-इन तीनों के बिना तुम कैसे बोले ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्वप्न में रूप, अवलोक और मनस्कार; शब्दपाठ और परस्पर वचन जो होते हैं, वे आकाशरूप होते हैं । वैसे ही हमारा देखना, बोलना और आपस में संवाद हुआ था । जैसे स्वप्न में रूप, अवलोक और मनस्कार आकाश-रूप होते हैं और प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं, वैसे ही हमारा देखना और बोलना हुआ । यह प्रश्न तुम्हारा सही नहीं कि देखना और बोलना कैसे हुआ ? जैसे आकाश में सृष्टि देखी है, वैसे ही यह सृष्टि भी है, और जैसे उनके शरीर थे, वैसे ही इनके और हमारे शरीर हैं; जैसे यह जगत् है, वैसे ही वह जगत् है ।
हे राम ! यह आश्चर्य है कि सत् वस्तु नहीं भासित होता और असत् वस्तु भासित होती है । जैसे स्वप्न में पृथ्वी पर्वत, समुद्र और
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<div align="right">५४७</div>जगत् व्यवहार वास्तविक नहीं, पर प्रत्यक्ष लगता है और सत् वस्तु अनुभवरूप नहीं भामती. वैसे ही हम, तुम, जगत्, सब आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में युद्ध होते दिखते हैं, शब्द होते हैं और आना जाना दिखता है, वह सब आकाशरूप है, हुआ कुछ नहीं. वैसे ही यह जगत् भी है। हे राम! स्वप्न सृष्टि मिथ्या है. कुछ बना नहीं और जो कुछ है सो अनुभव रूप है—भिन्न कुछ नहीं। जो तुम पूछो कि स्वप्न क्या है और कैसे होता है, तो सुनो. आदि परमात्मतत्त्व में स्वप्न में किंचन, हुआ है, सो वह विराट् आत्मा है। फिर उससे ये जीव हुए हैं, सो वे आकाशरूप हैं; क्योंकि विराट् आकाशरूप है और ये सब भी आकाश-रूप हैं। स्वप्न का दृष्टान्त भी मैंने बोध के निमित्त तुमसे कहा है, क्योंकि स्वप्न भी कुछ हुआ नहीं, केवल आत्मतत्त्वमात्र है; ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। हे राम! वह कान्ता जब मैंने देखी तो मैंने उससे पूछा, क्योंकि संकल्प मेरा और उसका एक था। जैसे स्वप्न में स्वप्न होता है, वैसे ही हमारा हुआ। हे राम! जैसे स्वप्न की सृष्टि आकाशरूप होती है, वैसे ही हम, तुम और सब जगत् आकाश है, कुछ हुआ नहीं। स्वप्न-जगत् और जाग्रत्-जगत् एक रूप हैं, परन्तु जाग्रत् दीर्घकाल का स्वप्न है, इससे इसमें दृढ व्यवहार, उत्पत्ति और प्रलय होने लगते हैं। हे राम! स्वप्न में भोग होते जान पड़ते हैं, सो भ्रान्तिमात्र है; निर्मल आकाशरूप आत्मा से भिन्न कुछ नहीं बना। दृश्य और द्रष्टा स्वप्न की नाईं अनहोते भी भाषित होते हैं। हम, तुम आदि दृश्य को मनरूपी द्रष्टा जो सत्य मानता है सो दोनों अज्ञान हैं भ्रममात्र उदय हुए हैं। जो शुद्ध द्रष्टा है, वह दृश्य से रहित है। जैसे द्रष्टा आकाश-रूप है, वैसे ही दृश्य भी आकाशरूप है और जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् भी अनुभवरूप है।
हे राम! चिदाकाश जो अनन्त आत्मा है, वह इस जगत् का कारण कैसे हो सकता है? जैसे स्वप्न की सृष्टि का कारण कोई नहीं, वैसे ही इस जाग्रत्-जगत् का कारण भी कोई नहीं; क्योंकि हुआ कुछ नहीं, जो कुछ है वह अनुभवरूप है—इससे यह जगत् अकारण है। हे राम!
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सब जीव आकाशरूप हैं और अनेक स्वप्न की सृष्टि जो नाना प्रकार की होती है वह भी आकाशरूप है । उसका कुछ आकार नहीं । जो निराकार अद्वैत आत्मसत्ता है, उसमें आदि में आभासरूप जगत् फुरा है, तो वह आकाशरूप क्यों न हो ? अब साकार और निराकार का भेद कहते हैं, सो सुनो । एक चित् है, दूसरा चैत्य । चित्शुद्ध चिन्मात्र का नाम है और चैत्य दृश्य फुरने को कहते हैं । जिस चित् में दृश्य का सम्बन्ध है, उसका नाम जीव है । जिस चित् का अज्ञान में द्वैत का सम्बन्ध है, और अनात्म में आत्म-अभिमान है, वह जीव साकाररूप है । उसके स्वप्न की सृष्टि भी आकाशरूप है । जो अचैत्य चिन्मात्र निराकार सत्ता है, तो उसका स्वप्न आभासरूप जगत् आकाशरूप क्यों न हो ? हे राम ! यह जगत् निरुपादान है अर्थात कुछ बना नहीं और चिदाकाश निराकाररूप है । जैसे स्वप्न में जगत् अकृत्रिम होता है, वैसे ही यह जगत् है । न इसका कोई निमित्तकारण है और न समवायकारण । पर आत्मा अच्युत और अद्वैत है । उसे दृश्य का कारण कैसे कहिये । हे राम ! न कोई करता है, न भोक्ता है, न कोई जगत् है और नहीं कहना भी नहीं बनता । जो ज्ञानवान् है वह पाषाणवत् मौन स्थित होता है और जब प्रकृत आचार आ पड़ता है, तब उसको भी करता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदेकताप्रतिपादनं शताधिकद्व्यशीतितमसर्गः ॥ १८२ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह जो तुम्हारे निकट आकाशरूप कान्ता आई तो वह शरीर बिना अनेक क, च, ट, त आदिक अक्षर कैसे बोली ? जो तुम स्वप्न की नाईं कहो तो स्वप्न में भी केवल आकाश होता है । वहाँ य, र, ल, व आदिक कैसे बोलते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्वप्न में जो शरीर होता है वह आकाशरूप है । उसमें क, च, ट, त आदिक अक्षर कभी उद्दिष्ट नहीं हुए, जैसे मृतक कभी नहीं बोलता वैसे ही आकाशरूप आत्मा में शब्द कभी नहीं उठता । जो तुम कहो कि स्वप्न में जो य, र, ल, व आदिक अक्षर प्रवृत्त होते हैं, तो उसका
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उत्तर यह है कि जो कुछ शब्द वहाँ सत् हुए होते तो उन्हें निकट बैठे लोग भी सुनते । हे राम ! निकट बैठे ने नहीं सुना तो ऐसे में कहता हूँ कि आकाशरूप है, कुछ हुआ नहीं, और जो हुआ भासित होता है, वह भ्रान्तिमात्र केवल चिन्मात्र आकाश का किञ्चन है । आकाश में आकाश ही स्थित है । वैसे ही यह जगत् भी कुछ हुआ नहीं । हे राम ! जैसे चन्द्रमा में श्यामता, आकाश में वृक्ष और पत्थर में पुतलियाँ नृत्य करती लगें तो मिथ्या है, वैसे ही इस जगत् का होना भी मिथ्या है । हे राम ! स्वप्न में जो जगत् दिखता है, वह चिदाकाश का किञ्चन है । वह भी आकाशरूप है-उससे भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न का जगत् आकाशरूप है, वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है और जैसे यह जगत् है, वैसे ही वे जगत् भी थे । यह जो आकाश है सो आत्मकाश में अनाकाश है । जैसे स्वप्न की सृष्टि भ्रम से दिखती है, वैसे ही जगत् भी भ्रम से प्रत्यक्ष लगता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो यह जगत् स्वप्न है तो जाग्रत् सा क्यों भासित होता है और जो असत् है तो सत्य की नाईं क्यों लगता है ?
वशिष्ठजी बोले-हे राम ! एक मृदुसंवेग, दूसरा मध्यसंवेग और तीसरा तीव्रसंवेग है । संवेग संकल्प के परिणाम को कहते हैं । वह उक्त प्रकार मे त्रिविधि है । जैसे कोई पुरुष अपने स्थान में बैठा हुआ मनोराज्य से किसी व्यवहार को रचता है, तो उसको जानता है कि संकल्पमात्र है और नट स्वाँग भरता है, तब वह जानता है कि मेरा स्वाँग है और अपने स्वरूप को सत्य जानता है । इसका नाम मृदुसंवेग है; क्योंकि अपना स्वरूप नहीं भूला । मध्यसंवेग यह है कि जैसे किसी पुरुष को स्वप्न आता है तो उसमें स्वप्न की सृष्टि भासित होती है और एक शरीर अपना भासित होता है; तब जीव अपने शरीर को सत्य जानता है और जगत् को भी सत्य जानता है । स्वरूप का प्रमाद होने के कारण स्वप्नकाल की सृष्टि को जीव सत्य जानता है और आगे हुए को असत्य जानता है । इसका नाम मध्यसंवेग है; क्योंकि सोया हुआ शीघ्र ही जाग उठता है । और जो सोया और जागे नहीं, उसका नाम
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तीव्रमंदवेग है। हे राम! आदिसंकल्प स्वप्न में रूप भासते हैं और उसमें नाना प्रकार की सृष्टि होकर स्थित है। जिनको आदिस्वरूप का प्रमाद नहीं हुआ, उनको यह जगत् मृदुमंदवेग है; क्योंकि वे अपनी लीलामात्र असत्य जानते हैं। और जिनको आदिस्वरूप का प्रमाद हुआ है, वे फिर शीघ्र ही जाग उठते हैं। तब उनको वह जगत् असत्य भासता है और इस जगत् में सत्य की प्रतीति नहीं होती। जिनको प्रमाद हुआ है और फिर नहीं जागे, उनको यह जगत् सत्य ही लगता है; क्योंकि उनकी चित्त की वृत्ति का परिणाम तीव्र हो गया है, इस कारण अज्ञानी को यह जगत् स्वप्न-जाग्रत होकर भासता है—जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न की सृष्टि सत्य भासता है।
हे राम! चित्त के फुरने का नाम जगत् है। जब चित्त बहिर्मुख होता है, तब जगतरूप में भासता है और स्वरूप का अज्ञान होता है। जब अज्ञान होता है, तब जगद्भ्रम दृढ़ होता जाता है—इससे इस जगत् का कारण अज्ञान है। हे राम! आत्मा के अज्ञान से जगत्-भासता है। जब आत्मज्ञान होगा तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जायगा। यह आत्मा अपना आप है, इससे आत्मपद में स्थित होओ, तब जगत् भ्रम निवृत्त हो जायगा। हे राम! अज्ञान में इस जगत् की सत्य प्रतीति होती है और उसमें जैसी-जैसी भावना होती है वैसे ही रूप में जगत् भासता है। हे राम! जिस प्रकार जगद्भ्रम सत्य होकर भासता है, वह भी सुनो। जो अज्ञानी जीव है, वह जब मृतक होता है तब मुक्त नहीं होता, बल्कि अज्ञान के वश जड़ पत्थर सदृश होता है, क्योंकि चेतनरूप है। हे राम! जब मृत्यु होती है, तब आकाशरूप चित्त में ही जगत् फुर आता है और अपनी वासना के अनुसार नाना प्रकार का होकर जगत् भासता है, एवं नाना प्रकार के व्यवहार रचनाक्रिया-सहित होकर भासते हैं। जीवों की कल्पपर्यन्त सब क्रियाएँ आन्तर्वाहक होती हैं—जैसी हमारी हैं।
हे राम! तुम देखो, वह जगत् क्या है—किसी कारण से तो नहीं उपजा? जैसे वह स्वप्न-जगत् कलनामात्र में सन् भासता है, वैसे ही
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५५१
इस जगत् को भी जानो। हे राम ! यह जो तुमको स्वप्न आता है, उसमें जो पुरुष और पदार्थ हैं, वे भी सत्य हैं, क्योंकि ब्रह्मसत्ता सर्वात्मा है। हे राम ! प्रबोध होने से भी स्वप्न के पदार्थ विद्यमान भासते हैं। इसी से कहा है कि स्वप्न, संकल्प और जाग्रत् तुल्य हैं। जैसे आगे शुक्र, ब्राह्मण के पुत्र इन्द्र, लवण और गाधि का उदाहरण कहा है। इनको मनोराज्यभ्रम प्रत्यक्ष हुआ है। दीर्घतपा को जिसका उदाहरण आगे कहेंगे, प्रत्यक्ष स्वप्न हुआ है। प्रत्येक जीव की अपनी सृष्टि है। संकल्प अपना-अपना है, इससे सृष्टि भिन्न-भिन्न है। पर सबका अधिष्ठान आत्म-सत्ता है। सब सृष्टि का प्रतिविम्ब आत्मरूपी आदर्श में होता है और सब सृष्टि आत्मा का अनुभव है। जैसे बीज में वृक्ष उत्पन्न होता है और उस वृक्ष से और वृक्ष होते हैं सो भी विचार से देखो कि बीज तो एक ही था और सब वृक्ष आदि उसी बीज से उपजे हैं, वैसे ही एक आत्मा से अनेक सृष्टियाँ प्रकाशित होती हैं, परन्तु स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं। जैसे एक पुरुष सोया है और उसको स्वप्न की सृष्टि भासती है और फिर स्वप्न में जो बहुत जीव भासते हैं उनको भी अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि भासती है।
हे राम ! जिससे आदि-स्वप्न की सृष्टि भासती है, वह पुरुष एक ही है। उसे एक ही में अनन्त सृष्टियाँ चित्त के फुरने से होती हैं। वैसे ही आत्मसत्ता के आश्रय से अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं। परन्तु स्वरूप में कुछ हुआ नहीं, सब आकाशरूप हैं। जीवों को अपनी-अपनी सृष्टि अज्ञान से भासती है। हे राम ! जीवों को अन्य सृष्टि का ज्ञान नहीं होता, वे अपनी ही सृष्टि को जानते हैं, क्योंकि संकल्प भिन्न-भिन्न हैं। कितनों के लेखे हम स्वप्नों के नर हैं और कितने ही हमारे लेखे स्वप्न के नर हैं। वे और सृष्टि में सोये हैं और हमारी सृष्टि उनको स्वप्न में दिखती है। जिनके लिए हम स्वप्न के नर हैं। और जो हमारी सृष्टि में सोये हैं, उनको स्वप्न में और सृष्टि भासित हुई है। वे हमारे स्वप्न के नर हैं। हे राम ! इस प्रकार आत्मतत्त्व के आश्रय से अनन्त सृष्टि भासती हैं। जो जीव सृष्टि को सत् जानकर विचरते
५५२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, वे मोक्षमार्ग से शून्य हैं। जैसे जो मनुष्य शयन करता है, उसको स्वप्न में चित्त का परिणाम होता है। उसमें जो जीव होते हैं उनको फिर स्वप्न होता है। तब उनको अपनी-अपनी सृष्टि भासती है। तो यह अनन्त सृष्टि अनुभव के आश्रय होती है। वैसे ही एक आत्मा के आश्रय में जो असंख्य सृष्टियाँ फुरती हैं वे कई समान, कई अर्धसमान और कई विलक्षण भासित होती हैं पर जीव अपनी-अपनी सृष्टि को जानते हैं। जैसे एक घर में दस पुरुष सोये हैं और उनको अपना-अपना स्वप्न आवे, तब एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता। वैसे ही यह सृष्टि भी और जीव को नहीं भासती; क्योंकि संकल्प अपना-अपना है। जैसे पत्थर को पत्थर नहीं जानता। जो अन्तर्वाहक शरीर योगेश्वर हैं, उनको और सृष्टियों का भी ज्ञान होता है।
हे राम! वास्तव में सृष्टि भी निराकार आकाशरूप है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे आत्मा में सृष्टि है। और जैसे रस्सी में सर्प भासता है, वैसे ही आत्मा में सृष्टि भासती है। हे राम! वास्तव में कुछ हुआ नहीं; सर्वदा सब प्रकार आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जिनको आत्मा का प्रमाद हुआ है, उनको जगत् भासता है। वास्तव में जगत् किसी कारण से नहीं उपजा—आभासरूप है। सम्यक्ज्ञान के होने पर ब्रह्म अद्वैत भासता है और असम्यक्ज्ञान से द्वैतरूप जगत् होकर भासता है। जैसे रस्सी के सम्यक्ज्ञान से रस्सी ही दिखती है और असम्यक्ज्ञान से सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के असम्यक्ज्ञान से जगत् का भान होता है। हे राम! मैंने उस देवी से प्रश्न किया कि हे देवि! तुम कहाँ से आई हो; तुम्हारा स्थान कहाँ है; तुम कौन हो और यहाँ किस निमित्त आई हो? तब वह देवी बोली, हे मुनीश्वर! ब्रह्मरूपा महाकाश के अणु का भी जो अणु है और उसके छिद्र में भी जो छिद्र है, उसमें तुम रहते हो और तुम्हारा यह जगत् भी उसी में है। तुम्हारी सृष्टि का जो ब्रह्मा है उसकी संवेदन-रूपा कन्या ने यह जगत् रचा है। उस तुम्हारे जगत् में पृथ्वी है और उसके ऊपर समुद्र है, जिसमें पृथ्वी घिरी हुई है। उसके ऊपर दूना और
❊ निर्वाण प्रकरण ❊
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द्वीप है और उस द्वीप के ऊपर दूना समुद्र है। इसी प्रकार पृथ्वी को लाँघ के आगे सुवर्ण की पृथ्वी आती है, जो दशसहस्र योजन पर्यन्त महासुन्दर प्रकाशरूप है। उसने सूर्य-चन्द्रमा के प्रकाश को भी लज्जित किया है। उसके बाद ओर लोकालोक पर्वत है, जो सर्वत्र प्रसिद्ध है, और उनमें बहुत से नगर वसते है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सदा प्रकाश ही रहता है—जैसे ज्ञानी के हृदय में सदा प्रकाश रहता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सर्वदा अन्धकार ही रहता है—जैसे अज्ञानी के हृदय में अन्धकार रहता है। कहीं ऐसे भी स्थान हैं, जहाँ प्रत्यक्ष पदार्थ मिलते हैं-जैसे पंडित के हृदय में अर्थ प्रत्यक्ष होते हैं। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ पदार्थ नहीं मिलते-जैसे मूर्ख के हृदय में वेद का अर्थ नहीं प्रकट होता। कहीं ऐसे स्थान हैं, जिनके देखने से हृदय प्रसन्न होता है-जैसे सन्तों के दर्शन से हृदय प्रसन्न होता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जिनमें सदा दुःख ही रहता है—जैसे अज्ञानी की संगति में सदा दुःख रहता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सूर्य उदय नहीं होता। कहीं सूर्य-चन्द्रमा दोनों उदय होते हैं। कहीं पशु ही रहते हैं। कहीं मनुष्य ही रहते हैं। कहीं दैत्य और कहीं देवता ही रहते हैं। कहीं किमान रहते हैं। कहीं धर्म का व्यवहार होता है। कहीं विद्याधर ही रहते हैं। कहीं उन्मत्त हाथी हैं। कहीं बड़े नन्दनवन हैं। कहीं ऐसे स्थान हैं जहाँ शास्त्र का विचार ही नहीं। कहीं शास्त्र के विचारवान् हैं। कहीं राज्य ही करते हैं। कहीं बड़ी वस्तियाँ हैं। कहीं उजाड़ वन हैं। कहीं पवन चलता है। कहीं बड़े सात छिद्र हैं। कहीं ऊर्ध्वशिखर हैं, जहाँ विद्याधर और देवता रहते हैं, कहीं मच्छ, यक्ष और राक्षस हैं और कहीं विद्याधरी देवियाँ महामत्त रहती हैं। इसी प्रकार अनन्त देशों और स्थानों की बस्तियाँ हैं। उस लोकालोक के शिखर पर सात योजन का एक तालाब है, जिसमें कमल लगे हैं; सब ओर कल्पवृक्ष हैं और वहाँ के सब पत्थर चिन्तामणि हैं। उसके उत्तर ओर एक सुवर्ण की शिला पड़ी है, जिसके शिखर पर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बैठते और विलास करते हैं। उसकी शिला में मैं रहती हूँ और मेरा भर्त्ता और सम्पूर्ण परिवार भी वहीं रहता है।
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हे मुनीश्वर ! उसमें एक वृद्ध ब्राह्मण रहता है, जो अब तक जीता है और एकान्त जाकर सदा वेद का अध्ययन करता है। उसने मुझको अपने विवाह के निमित्त अपने मन में उपजाया था और अब में बड़ी हुई हूँ तो वह मेरे साथ विवाह नहीं करता। वह जब से उपजा है, तब से ब्रह्मचारी ही रहता है और वेद का अध्ययन करके विरक्तचित्त हुआ है। हे मुनीश्वर ! मैं वस्त्रों और भूषणों में युक्त हूँ; चन्द्रमा की नाईं मेरे सुन्दर अङ्ग हैं और मैं सब जीवों के मोहनेवाली हूँ। मुझको देखकर कामदेव भी मूर्च्छित हो जाता है। फूलों की नाईं मेरा हँसना है और सब गुण मुझमें हैं। महालक्ष्मी की में सखी हूँ। पर मुझको त्यागकर वह ब्राह्मण एकान्त में जाकर बैठा है और सदा वेद का अध्ययन करता है। वह बड़ा दीर्घसूत्री है। जब में उत्पन्न हुई थी, तब वह कहता था कि मैं तुझको ब्याहूँगा, पर अब में यौवन अवस्था को प्राप्त हुई हूँ, तब त्यागकर एकान्त में जा बैठा है। हे मुनीश्वर ! स्त्री को सदा भर्ता चाहिए। अब में यौवन अवस्था से जलती हूँ। बड़े तालाब जो कमल-सहित दृष्टिगत होते हैं, वे भर्ता के वियोग में मुझे अग्नि के अङ्गारे से लगते हैं। नन्दनवन आदि बड़े बाग मुझको मरुस्थल से लगते हैं। इनको देखकर में रुदन करती हूँ और नेत्रों से ऐसा जल बहता है, जैसे वर्षाकाल का मेघ बरसता है।
जब में मुख आदि अपने अङ्गों को देखती हूँ, तब नेत्रों के जल से कमलिनी डूब जाती है, और जब कल्पतरु और तमाल वृक्ष के फूलों और पत्रों की शय्या पर शयन करती हूँ, तब अङ्गों के स्पर्श से फूल जलते हैं। जिस कमल में मेरा स्पर्श होता है, वह जल जाता है। हे भगवन् ! भर्ता के वियोग में में तपी हुई हूँ। जब में बरफ के पर्वत पर जा बैठती हूँ, तब वह भी अग्नि सा हो जाता है। में नाना प्रकार के फूलों को गले में डालती हूँ, तब भी तपन नहीं निवृत्ति होती। मेरे भर्ता की देह त्रिलोकी है और उसके चरणों में सदा मेरी प्रीति रहती है। में गृह के सब आचार करती हूँ और सब गुणों से सम्पन्न हूँ; सबको धारण कर रही हूँ; सबकी प्रतिपालक हूँ और ज्ञेय की मुझको
❉ निर्वाण प्रकरण ❉
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सदा इच्छा रहती है । हे मुनीश्वर ! मैं पतिव्रता हूँ; जो पुरुष पतिव्रता स्त्री को ग्रहण करता है, वह बहुत सुख पाता है और तीनों ताप से रहित होता है, क्योंकि उसमें सब गुण मिलते हैं । वह सदा भर्ता में प्रीति करती है और भर्ता की प्रीति उसमें होती है—ऐसी मैं हूँ । पर मुझको त्यागकर वह ब्राह्मण एकान्त में जा बैठा है और सब समय वेद का अध्ययन और विचार करता रहता है । मेरे भर्ता ने कामना का त्याग किया है, उसको कोई इच्छा नहीं रही और मैं उसके वियोग से जलती हूँ । हे भगवन् ! वह स्त्री भी भली है, जिसका भर्ता विवाह करके मर गया हो । कुँआरी भी भली है और जो भर्ता के संयोग से प्रथम ही मर जाती है यह भी श्रेष्ठ है । पर जिसको भर्ता प्राप्त हुआ है परन्तु उसको स्पर्श नहीं करता तो उसको बड़ा दुःख होता है । हे मुनीश्वर ! जो पुरुष परमात्मा की भावना के संस्कार से रहित उत्पन्न हुआ है वह वैसे ही निष्फल है, जैसे पात्र बिना अन्न निष्फल होता है । मतलब यह कि सन्तजन, तीर्थ आदि से रहित पापस्थानों में डाला हुआ धन निष्फल होता है । जैसे सम-दृष्टि बिना बोध और वेश्या की लज्जा निष्फल है, वैसे ही मैं पति बिना निष्फल हूँ । हे भगवन् ! जब मैं शय्या बिछाकर शयन करती हूँ, तब फूल भी जल जाते हैं । जैसे समुद्र का बड़वाग्नि जलाता है, वैसे ही कमलों को मेरे अङ्ग जलाते हैं । हे मुनीश्वर ! जो सुख के स्थान हैं वे मुझको दुःखदायक हैं और जो मध्य स्थान हैं, वे न सुख देते हैं न दुःख देते हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विद्याधरीविशोकवर्णनं नाम शताधिकत्र्यशीतितमस्सर्गः ॥ १२३ ॥
हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैं तप करती फिरती हूँ । अब मुझको भी भर्ता के वियोग से वैराग्य उपजा है । भर्ता की वैराग्यरूपी ओस मेरी तृष्णारूपी कमलिनी पर पड़ी है और उससे में जल गई हूँ, इससे जगत् मुझको नीरस लगता है । हे मुनीश्वर ! यह जगत् असार है इसमें स्थित वस्तु कोई नहीं; इस कारण मुझको भी वैराग्य उपजा है । मेरा भर्ता स्वयम्भू संसार से विरक्त होकर एकान्त में जा बैठा है और वेद को
५५६ ❉ योगवाशिष्ठ ❉
विचारता रहता है, परन्तु आत्मपद को नहीं प्राप्त हुआ। वह मन को स्थिर करने का उपाय करता है, परन्तु अब तक उसका मन स्थिर नहीं हुआ। सब एषणाओं से रहित होकर वह शास्त्र को विचारता रहता है पर आत्मा का साक्षात्कार उसे नहीं हुआ। मुझको भी वैराग्य उपजा है। अब हम दोनों वैराग्य से सम्पन्न हुए हैं और परमपद पाने की इच्छा हुई है। शरीर हमको नीरस हो गया है—जैसे शरत्काल की वेल नीरस होती है—इस कारण में योग की धारणा करने लगी हूँ। यह शक्ति अब मुझको उत्पन्न हुई है कि आकाशमार्ग को आऊँ और जाऊँ; योग-धारणा से आकाश पर उड़ने की भी शक्ति हुई है और सिद्धमार्ग की धारणा से सिद्धों के मार्ग में भी आती जाती हूँ, परन्तु अर्थ कुछ सिद्ध न हुआ, क्योंकि पाने योग्य आत्मपद नहीं प्राप्त हुआ, जिसके पाने से कोई दुःख न रहे। अब मुझे निर्वाण की इच्छा हुई है।
मैंने सिद्धों के गण, देवता, विद्याधर और ज्ञानियों के बहुत स्थान देखे हैं; परन्तु जहाँ गई, वहाँ सब तुम्हारी ही स्तुति करते हैं कि वशिष्ठजी आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान को निवृत्त करते हैं। जैसे बड़ा मेघ बरसता है, परन्तु जब वायु चलता है, तब मेघ को दूर करता है, वैसे ही तुम्हारे वचन अज्ञान को दूर करते हैं। जब ऐसे मैंने तुम्हारी स्तुति सुनी, तब मैंने इस सृष्टि में आने का अभ्यास किया और धारणा के अभ्यास से तुम्हारी सृष्टि में आई हूँ। इससे हे मुनीश्वर! मेरी और मेरे भर्त्ता की शान्ति के लिए आत्मज्ञान का उपदेश करो। मेरा भर्त्ता, जो मन को स्थिर करने का यत्न करता है, उसको तुम ऐसा उपदेश करो कि शीघ्र ही स्थिर हो और आत्मज्ञान को पावे। और मुझको भी आत्मज्ञान का उपदेश करो। हे भगवन्! तुम माया से पार मुझको दीखते हो, इस कारण में तुम्हारी शरण आई हूँ। मैं स्त्री बुद्धि से तुम्हारे निकट नहीं आई, शिष्यभाव को लेकर आई हूँ और मैं जानती हूँ कि मेरा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है, क्योंकि जो कोई महापुरुष की शरण आता है तो निष्फल नहीं जाता, बल्कि सब प्रयोजन पूर्ण होता है। जैसी किसी की कामना
५५६ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
विचारता रहता है, परन्तु आत्मपद को नहीं प्राप्त हुआ । वह मन को स्थिर करने का उपाय करता है, परन्तु अब तक उसका मन स्थिर नहीं हुआ । सब एषणाओं से रहित होकर वह शास्त्र को विचारता रहता है पर आत्मा का साक्षात्कार उसे नहीं हुआ । मुझको भी वैराग्य उपजा है । अब हम दोनों वैराग्य से सम्पन्न हुए हैं और परमपद पाने की इच्छा हुई है । शरीर हमको नीरस हो गया है—जैसे शरत्काल की बेल नीरस होती है—इस कारण मैं योग की धारणा करने लगी हूँ । यह शक्ति अब मुझको उत्पन्न हुई है कि आकाशमार्ग को आऊँ और जाऊँ; योग-धारणा से आकाश पर उड़ने की भी शक्ति हुई है और सिद्धमार्ग की धारणा से सिद्धों के मार्ग में भी आती जाती हूँ, परन्तु अर्थ कुछ सिद्ध न हुआ, क्योंकि पाने योग्य आत्मपद नहीं प्राप्त हुआ, जिसके पाने में कोई दुःख न रहे । अब मुझे निर्वाण की इच्छा हुई है ।
मैंने सिद्धों के गण, देवता, विद्याधर और ज्ञानियों के बहुत स्थान देखे हैं; परन्तु जहाँ गई, वहाँ सब तुम्हारी ही स्तुति करते हैं कि वशिष्ठजी आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान को निवृत्त करते हैं । जैसे बड़ा मेघ बरसता है, परन्तु जब वायु चलता है, तब मेघ को दूर करता है, वैसे ही तुम्हारे वचन अज्ञान को दूर करते हैं । जब ऐसे मैंने तुम्हारी स्तुति सुनी, तब मैंने इस सृष्टि में आने का अभ्यास किया और धारणा के अभ्यास से तुम्हारी सृष्टि में आई हूँ । इससे हे मुनीश्वर ! मेरी और मेरे भर्त्ता की शान्ति के लिए आत्मज्ञान का उपदेश करो । मेरा भर्त्ता, जो मन को स्थिर करने का यत्न करता है, उसको तुम ऐसा उपदेश करो कि शीघ्र ही स्थिर हो और आत्मज्ञान को पावै । और मुझको भी आत्मज्ञान का उपदेश करो । हे भगवन् ! तुम माया से पार मुझको दीखते हो, इस कारण मैं तुम्हारी शरण आई हूँ । मैं स्त्री बुद्धि मे तुम्हारे निकट नहीं आई, शिष्यभाव को लेकर आई हूँ और मैं जानती हूँ कि मेरा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है, क्योंकि जो कोई महापुरुष की शरण आता है तो निष्फल नहीं जाता, बल्कि सब प्रयोजन पूर्ण होता है । जैसी किसी की कामना
५५८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
के दो ध्रुव हैं। काल इस चक्र को फेरता है। सो फेरता-फेरता नाशरूप जो काल है, वह कल्प के अन्त में उस चक्र के मुख में जा समाता है।
हे मुनीश्वर ! परमात्मा अनन्त है, उसका कोई अन्त नहीं जान सकता। जब संवेदन जगता है तब जीव जानता है कि यह जगत् ईश्वर की सत्ता से है और जब फुरने से रहित होता है, तब जाना नहीं जाता कि जगत् कहाँ गया। हे मुनीश्वर ! तुम चलो और मेरी सृष्टि का विलास देखो। तुम तो जगत् के विलास से पार हुए हो और यद्यपि तुमको इच्छा नहीं है तो भी कृपा करके उस शिला में हमारी सृष्टि देखो। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार कहकर वह आकाशमार्ग में मुझे ले चली—जैसे गन्ध को वायु ले जाता है। तब मैं और वह दोनों आकाशमार्ग में उड़े और भूताकाश में चिरकाल तक उड़ते गये। तब हमको लोकालोक पर्वत देख पड़ा। उसके निकट जाकर उसके शिखर देखे कि बहुत ऊँचे गये हैं और बड़े मेघ उस पर विचरते हैं। शिखर ऐसे सुन्दर हैं, मानो क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा निकला है। वहाँ जाकर मैंने महासुन्दर सुवर्ण की एक शिला देखी। उसके निकट गया तो मैंने कहा, हे देवि ! वह तो शिला पड़ी है, तुम्हारी सृष्टि कहाँ है ? इसमें पृथ्वी, द्वीप की मर्यादा, जिसका आवरण चौहेंफेर समुद्र होता है, और उन पर की दसमहस योजनपर्यन्त सुवर्ण की पृथ्वी, पर्वत, सप्तलोक, आकाश, दशोंदिशा, तारामण्डल, रात्रि-दिन के प्रकाश सूर्य, चन्द्रमा और भूतों का संचार, देवगण, विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, योगेश्वर, वरुण, कुबेर, जगत् की उत्पत्ति प्रलय का संचार, पाताल की भूमिका, मण्डलेश्वर, न्याय करनेवाले, मरुस्थल की भूमिका, नन्दनवन आदिक, दैत्यों के विरोधी देवता आदि कहाँ हैं ? यह तो एक शिला मात्र है।
हे राम ! जब मैंने आश्चर्य को प्राप्त होकर ऐसे कहा, तब विद्याधरी बोली—हे भगवन् ! मुझको तो प्रत्यक्ष इस शिला में अपनी सृष्टि दिखती है—जैसे शुद्ध आईने में अपना मुख दिखता है, वैसे ही मुझको अपनी सृष्टि इस शिला में प्रत्यक्ष दिखती है—जैसी मर्यादा देश
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५५६
देशान्तर की मुझको भासित होती है, इसका संस्कार मेरे हृदय में है, इसी से मुझको प्रत्यक्ष भासित है। तुम्हारे हृदय में इसका संस्कार नहीं है, इसी से तुमको नहीं भासित होती। तुम्हारी सृष्टि की अपेक्षा यह शिला पड़ी है और तुमको शिला का निश्चय है, इस कारण तुमको इसमें जगत् नहीं दीखता। हे भगवन् ! जिसका अभ्यास होता है, वह पदार्थ अवश्य प्राप्त होता है और वही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! गुरु शिष्य को उपदेश करता है, पर उपदेशमात्र से इष्ट की प्राप्ति नहीं होती। जब उसका अभ्यास करे, तब इष्ट की प्राप्ति होती है। हे मुनीश्वर ! ऐसा न्याय और सिद्धता कोई नहीं, जो अभ्यास करने से न मिले, ऐसी कला कोई नहीं, जो अभ्यास करने से न प्राप्त हो और ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो अभ्यास की प्रबलता से सिद्ध न हो। जो थककर छोड़े नहीं तो अवश्य सिद्ध होते हैं। हे मुनीश्वर ! जो कुछ सिद्ध होता दिखता है, सो सब अभ्यास से होता है। प्रथम जब मैं तुम्हारे साथ आई थी, तब मुझको भी शिला में सृष्टि नहीं दीखी थी, क्योंकि यह सृष्टि अन्तवाहक शरीर में स्थित है। तुम्हारे साथ द्वैतरूपी कथा के कहने से अन्तवाहक शरीर मुझको भूल गया था, इससे विश्व की चर्चा और तुम्हारी सृष्टि की चर्चा करके मुझको वह स्पष्ट नहीं भासित होती। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही तुम्हारी सृष्टि के संकल्प से मुझको भी अपनी सृष्टि नहीं दिखती, परन्तु चिरकाल जो अभ्यास किया है, इससे फिर भासित होती है, क्योंकि जो दृढ़ अभ्यास होता है, उसकी जय होती है। हे मुनीश्वर, चिन्मात्र पद में फुरने से आदि जीवों के शरीर अन्तवाहक हुए हैं, अर्थात् आकाशरूप शरीर थे। जब उनमें प्रमाद से दृढ़ अभ्यास हुआ, तब आधिभौतिक होकर दिखने लगे। जब फिर भावना उलटकर योग की धारणा से अभ्यास होता है, तब आधिभौतिकता क्षीण हो जाती है और अन्तवाहकता प्रकट होती है। उससे जीव आकाश में पक्षी की नाईं उड़ता फिरता है। इससे तुम देखो कि अभ्यास के बल से सब कुछ सिद्ध होता है।
५६० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हे मुनीश्वर ! अज्ञान से मनुष्यों को अहंकाररूपी पिशाच लगा है, सो दृढ़ स्थित हुआ है। जब शास्त्र के वचनों में दृढ़ अभ्यास होता है, तब वह क्षीण हो जाता है। हे मुनीश्वर ! तुम देखो, जिस किसी को इष्ट की प्राप्ति होती है सो अभ्यास के बल में होती है। जो अज्ञानी होता है और ब्रह्म का अभ्यास करता है सो ज्ञानी होता है। पर्वत बड़ा है, परन्तु अभ्यास में कोई उसे चूर्ण किया चाहे तो वह चूर्ण हो जाता है। सम्पूर्ण वृक्ष का खा लेना कठिन है, परन्तु अभ्यास करके शनैः शनैः घुन उसे खा जाता है। आप भी छोटा है, परन्तु जो वस्तु पाना कठिन हो, वह उसे अभ्यास से सुगम हो जाती है। जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु के निकट जाकर जिस पदार्थ की इच्छा करो वह सिद्ध होता है, वैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि और कल्पतरु में जीव जिस पदार्थ का अभ्यास करता है, वह सिद्ध होता है और—अभ्यासरूपी भूमिका फल देती है। बालक अवस्था से जो अभ्यास होता है, वही वृद्धावस्था तक रहता है। हे मुनीश्वर ! जो बान्धव नहीं होता और निकट रहता है तो निकट के अभ्यास से बान्धव हो जाता है, परन्तु बान्धव जो विदेश में रहता है तो अभ्यास की क्षीणता से वह अबान्धव हो जाता है। हे मुनीश्वर ! विष भी अमृत की भावना करने में अभ्यास के द्वारा अमृत हो जाता है। जो मिष्टान्न में कटुक भावना होती है तो वह कटु लगता है और कटु में मिष्टान्न की भावना कीजिये तो वह मिष्टान्न लगता है—जैसे किसी को नीम और किसी को मिष्टान्न प्रिय है।
हे मुनीश्वर ! जो कुछ सिद्ध होता है, वह अभ्यास के बल में सिद्ध होता है। जो पुण्य किया होता है तो पाप के अभ्यास से नष्ट हो जाता है और पाप का पुण्य के अभ्यास से नाश होता है। माता भी अमाता हो जाती है। अर्थ के अनर्थ हो जाते हैं। मित्र अमित्र हो जाता है और भाग्य अभाग्य हो जाता है। निदान सब पदार्थ चल हो जाते हैं, परन्तु अभ्यास का नाश कदाचित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जो पदार्थ निकट पड़ा होता है और साधक इन्द्रियाँ भी विद्यमान होती हैं, तो भी वह अभ्यास के बिना नहीं प्राप्त होता। जहाँ अभ्यासरूपी
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५६१
सूर्य उदय होता है, वहाँ इष्ट की प्राप्ति होती है। अज्ञानरूपी विशूचिका रोग ब्रह्मचर्चा के अभ्यास से नष्ट हो जाता है। हे मुनीश्वर! संसार-रूपी समुद्र आदि-अन्त से रहित है, पर आत्मअभ्यासरूपी नौका द्वारा जीव उसे तर जाता है—जो अभ्यास को न त्यागोगे तो अवश्य तरोगे। हे मुनीश्वर! जो पदार्थ उदय हो, उसके अभाव की भावना कीजिये तो अस्त हो जाता है, और जो अस्त हो, पर उसके उदय होने की भावना कीजिये तो वह उदय होता है। जैसे सिद्ध के शाप से प्रत्यक्ष प्राप्त पदार्थ नष्ट हो जाता है और वरदान से अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति होती है। हे मुनीश्वर! जो पुरुष शास्त्र से इष्ट पदार्थ को सुनता है और उसका अभ्यास नहीं करता, उसे मनुष्यों में नीच जानो। उसको इष्ट पदार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होती। जैसे वन्ध्या के पुत्र नहीं होता, वैसे ही उसको इष्ट पदार्थ की सिद्धि नहीं होती। हे मुनीश्वर! जो आत्मरूपी इष्ट को त्यागकर और किसी पदार्थ की वाञ्छा करता है, वह अनिष्ट के बाद अनिष्ट पाकर एक नरक से दूसरे नरक को भोगता है। हे मुनीश्वर! जिसको अभ्यास का भी अभ्यास प्राप्त हुआ है, उसको शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होती है। जीव अभ्यास के बल से इष्ट को पाता है—जैसे प्रकाश से पदार्थ देखिये कि वह पड़ा है। तो उसका नाम अभ्यास है और उसके निमित्त यत्न करना अभ्यास का अभ्यास है। जब यत्न और अभ्यास करते हैं, तब पदार्थ को पाते हैं। बारम्बार चिन्तन करने का नाम अभ्यास है। जब ऐसा अभ्यास हो, तब इष्ट पदार्थ की प्राप्ति होती है—अन्यथा नहीं होती। हे मुनीश्वर! चौदह प्रकार के भूतजात हैं, जैसा-जैसा किसी को अभ्यास है उसके बल से वैसा ही वैसा वह सिद्ध होता है। अभ्यासरूपी सूर्य के प्रकाश से जीव अपने इष्ट पदार्थ पाता है। अभ्यास के बल से भय निवृत्त होता है और पृथ्वी, पर्वत, वन, कन्दरा में निर्भय होकर जीव विचरता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चाशीतितमसर्गः ॥ १५ ॥
विद्याधरी बोली, हे मुनीश्वर! सब पदार्थ निरन्तर अभ्यास से सिद्ध
५६२ ❇ योगवाशिष्ट ❇
होते हैं । तुम्हारा शिला में दृढ़ निश्चय है, इससे तुमको शिला ही दिखती है और मुझको इसमें सृष्टि दिखती है । जब तुम्हारा संकल्प भी मेरे संकल्प के साथ मिले, तब तुमको भी यह जगत् भासित हो । यह जगत् जो स्थित है सो मेरे अन्तवाहक में है । आदि-वपु सबका अन्त-वाहक है । अतः अन्तवाहक में सबकी एकता है-जैसे समुद्र में सब तरङ्गों की एकता होती है । हे मुनीश्वर ! जब तुम धारणा का अभ्यास करके शुद्ध बुद्धि को प्राप्त होगे, तब तुमको इस शिला में सृष्टि भासित होगी । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब उसने इस प्रकार मुझसे शुद्ध युक्ति कही, तब मैंने पद्मासन लगाकर सब विषय त्याग दिये और कथा के क्षोभ का भी त्यागकर अपने आधिभौतिक का भी त्याग किया । तब निरन्तर शुद्ध बोध का अभ्यास करने से मुझमें बोध का अनुभव उदय हुआ । जैसे मेघ के अभाव से शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही कलना से रहित मुझमें शुद्ध बोध का अनुभव उदय हुआ, जो उदय और अस्त से रहित परम शान्तरूप है । उसमें वह शिला मुझको आकाशरूप देख पड़ी और शिलातत्त्व में केवल बोधमात्र दृष्टिगोचर हुई । पृथ्वी आदि तत्त्व कोई मुझको नजर न आये, केवल अद्वैत आकाश आत्मतत्त्वमात्र अपना रूप ही दृष्टिगोचर हुआ पर जब बोधमात्र से अन्तवाहकरूप होकर स्पन्दन फुरा, तब अन्तवाहक से उस शिला में सृष्टि भासित होने लगी । जैसे मनोराज्य की सृष्टि होती है और बोध से भिन्न-भिन्न नहीं होती, वैसे ही वह सृष्टि मुझको दिखी और शिला का रूप प्रतीत हुई । जैसे स्वप्न के गृह में शिला दिखे तो वह अनुभव ही शिला और गृहरूप होकर भाषित होता है, कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही वह शिला देख पड़ी ।
हे राम ! जैसे मैंने आकाशरूप वह शिला देखी, वैसे ही सब जगत् चिदाकाशरूप है, कुछ द्वैत नहीं बना । सर्वदा आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है, पर आत्मा के अज्ञान से द्वैत भासित होता है-जैसे कोई पुरुष स्वप्न में अपना सिर कटा देखे और रुदन करे, पर जागकर अपने को ज्यों का त्यों देखता है, वैसे ही जब तक जीव अज्ञाननिद्रा में सोता है,