योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 547, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊
<div align="right">५४७</div>जगत् व्यवहार वास्तविक नहीं, पर प्रत्यक्ष लगता है और सत् वस्तु अनुभवरूप नहीं भामती. वैसे ही हम, तुम, जगत्, सब आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में युद्ध होते दिखते हैं, शब्द होते हैं और आना जाना दिखता है, वह सब आकाशरूप है, हुआ कुछ नहीं. वैसे ही यह जगत् भी है। हे राम! स्वप्न सृष्टि मिथ्या है. कुछ बना नहीं और जो कुछ है सो अनुभव रूप है—भिन्न कुछ नहीं। जो तुम पूछो कि स्वप्न क्या है और कैसे होता है, तो सुनो. आदि परमात्मतत्त्व में स्वप्न में किंचन, हुआ है, सो वह विराट् आत्मा है। फिर उससे ये जीव हुए हैं, सो वे आकाशरूप हैं; क्योंकि विराट् आकाशरूप है और ये सब भी आकाश-रूप हैं। स्वप्न का दृष्टान्त भी मैंने बोध के निमित्त तुमसे कहा है, क्योंकि स्वप्न भी कुछ हुआ नहीं, केवल आत्मतत्त्वमात्र है; ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। हे राम! वह कान्ता जब मैंने देखी तो मैंने उससे पूछा, क्योंकि संकल्प मेरा और उसका एक था। जैसे स्वप्न में स्वप्न होता है, वैसे ही हमारा हुआ। हे राम! जैसे स्वप्न की सृष्टि आकाशरूप होती है, वैसे ही हम, तुम और सब जगत् आकाश है, कुछ हुआ नहीं। स्वप्न-जगत् और जाग्रत्-जगत् एक रूप हैं, परन्तु जाग्रत् दीर्घकाल का स्वप्न है, इससे इसमें दृढ व्यवहार, उत्पत्ति और प्रलय होने लगते हैं। हे राम! स्वप्न में भोग होते जान पड़ते हैं, सो भ्रान्तिमात्र है; निर्मल आकाशरूप आत्मा से भिन्न कुछ नहीं बना। दृश्य और द्रष्टा स्वप्न की नाईं अनहोते भी भाषित होते हैं। हम, तुम आदि दृश्य को मनरूपी द्रष्टा जो सत्य मानता है सो दोनों अज्ञान हैं भ्रममात्र उदय हुए हैं। जो शुद्ध द्रष्टा है, वह दृश्य से रहित है। जैसे द्रष्टा आकाश-रूप है, वैसे ही दृश्य भी आकाशरूप है और जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् भी अनुभवरूप है।
हे राम! चिदाकाश जो अनन्त आत्मा है, वह इस जगत् का कारण कैसे हो सकता है? जैसे स्वप्न की सृष्टि का कारण कोई नहीं, वैसे ही इस जाग्रत्-जगत् का कारण भी कोई नहीं; क्योंकि हुआ कुछ नहीं, जो कुछ है वह अनुभवरूप है—इससे यह जगत् अकारण है। हे राम!