भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 548

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  • योगवाशिष्ठ *

सब जीव आकाशरूप हैं और अनेक स्वप्न की सृष्टि जो नाना प्रकार की होती है वह भी आकाशरूप है । उसका कुछ आकार नहीं । जो निराकार अद्वैत आत्मसत्ता है, उसमें आदि में आभासरूप जगत् फुरा है, तो वह आकाशरूप क्यों न हो ? अब साकार और निराकार का भेद कहते हैं, सो सुनो । एक चित् है, दूसरा चैत्य । चित्शुद्ध चिन्मात्र का नाम है और चैत्य दृश्य फुरने को कहते हैं । जिस चित् में दृश्य का सम्बन्ध है, उसका नाम जीव है । जिस चित् का अज्ञान में द्वैत का सम्बन्ध है, और अनात्म में आत्म-अभिमान है, वह जीव साकाररूप है । उसके स्वप्न की सृष्टि भी आकाशरूप है । जो अचैत्य चिन्मात्र निराकार सत्ता है, तो उसका स्वप्न आभासरूप जगत् आकाशरूप क्यों न हो ? हे राम ! यह जगत् निरुपादान है अर्थात कुछ बना नहीं और चिदाकाश निराकाररूप है । जैसे स्वप्न में जगत् अकृत्रिम होता है, वैसे ही यह जगत् है । न इसका कोई निमित्तकारण है और न समवायकारण । पर आत्मा अच्युत और अद्वैत है । उसे दृश्य का कारण कैसे कहिये । हे राम ! न कोई करता है, न भोक्ता है, न कोई जगत् है और नहीं कहना भी नहीं बनता । जो ज्ञानवान् है वह पाषाणवत् मौन स्थित होता है और जब प्रकृत आचार आ पड़ता है, तब उसको भी करता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदेकताप्रतिपादनं शताधिकद्व्यशीतितमसर्गः ॥ १८२ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह जो तुम्हारे निकट आकाशरूप कान्ता आई तो वह शरीर बिना अनेक क, च, ट, त आदिक अक्षर कैसे बोली ? जो तुम स्वप्न की नाईं कहो तो स्वप्न में भी केवल आकाश होता है । वहाँ य, र, ल, व आदिक कैसे बोलते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्वप्न में जो शरीर होता है वह आकाशरूप है । उसमें क, च, ट, त आदिक अक्षर कभी उद्दिष्ट नहीं हुए, जैसे मृतक कभी नहीं बोलता वैसे ही आकाशरूप आत्मा में शब्द कभी नहीं उठता । जो तुम कहो कि स्वप्न में जो य, र, ल, व आदिक अक्षर प्रवृत्त होते हैं, तो उसका