भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 549

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ५४६

उत्तर यह है कि जो कुछ शब्द वहाँ सत् हुए होते तो उन्हें निकट बैठे लोग भी सुनते । हे राम ! निकट बैठे ने नहीं सुना तो ऐसे में कहता हूँ कि आकाशरूप है, कुछ हुआ नहीं, और जो हुआ भासित होता है, वह भ्रान्तिमात्र केवल चिन्मात्र आकाश का किञ्चन है । आकाश में आकाश ही स्थित है । वैसे ही यह जगत् भी कुछ हुआ नहीं । हे राम ! जैसे चन्द्रमा में श्यामता, आकाश में वृक्ष और पत्थर में पुतलियाँ नृत्य करती लगें तो मिथ्या है, वैसे ही इस जगत् का होना भी मिथ्या है । हे राम ! स्वप्न में जो जगत् दिखता है, वह चिदाकाश का किञ्चन है । वह भी आकाशरूप है-उससे भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न का जगत् आकाशरूप है, वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है और जैसे यह जगत् है, वैसे ही वे जगत् भी थे । यह जो आकाश है सो आत्मकाश में अनाकाश है । जैसे स्वप्न की सृष्टि भ्रम से दिखती है, वैसे ही जगत् भी भ्रम से प्रत्यक्ष लगता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो यह जगत् स्वप्न है तो जाग्रत् सा क्यों भासित होता है और जो असत् है तो सत्य की नाईं क्यों लगता है ?

वशिष्ठजी बोले-हे राम ! एक मृदुसंवेग, दूसरा मध्यसंवेग और तीसरा तीव्रसंवेग है । संवेग संकल्प के परिणाम को कहते हैं । वह उक्त प्रकार मे त्रिविधि है । जैसे कोई पुरुष अपने स्थान में बैठा हुआ मनोराज्य से किसी व्यवहार को रचता है, तो उसको जानता है कि संकल्पमात्र है और नट स्वाँग भरता है, तब वह जानता है कि मेरा स्वाँग है और अपने स्वरूप को सत्य जानता है । इसका नाम मृदुसंवेग है; क्योंकि अपना स्वरूप नहीं भूला । मध्यसंवेग यह है कि जैसे किसी पुरुष को स्वप्न आता है तो उसमें स्वप्न की सृष्टि भासित होती है और एक शरीर अपना भासित होता है; तब जीव अपने शरीर को सत्य जानता है और जगत् को भी सत्य जानता है । स्वरूप का प्रमाद होने के कारण स्वप्नकाल की सृष्टि को जीव सत्य जानता है और आगे हुए को असत्य जानता है । इसका नाम मध्यसंवेग है; क्योंकि सोया हुआ शीघ्र ही जाग उठता है । और जो सोया और जागे नहीं, उसका नाम