योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊
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द्वीप है और उस द्वीप के ऊपर दूना समुद्र है। इसी प्रकार पृथ्वी को लाँघ के आगे सुवर्ण की पृथ्वी आती है, जो दशसहस्र योजन पर्यन्त महासुन्दर प्रकाशरूप है। उसने सूर्य-चन्द्रमा के प्रकाश को भी लज्जित किया है। उसके बाद ओर लोकालोक पर्वत है, जो सर्वत्र प्रसिद्ध है, और उनमें बहुत से नगर वसते है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सदा प्रकाश ही रहता है—जैसे ज्ञानी के हृदय में सदा प्रकाश रहता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सर्वदा अन्धकार ही रहता है—जैसे अज्ञानी के हृदय में अन्धकार रहता है। कहीं ऐसे भी स्थान हैं, जहाँ प्रत्यक्ष पदार्थ मिलते हैं-जैसे पंडित के हृदय में अर्थ प्रत्यक्ष होते हैं। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ पदार्थ नहीं मिलते-जैसे मूर्ख के हृदय में वेद का अर्थ नहीं प्रकट होता। कहीं ऐसे स्थान हैं, जिनके देखने से हृदय प्रसन्न होता है-जैसे सन्तों के दर्शन से हृदय प्रसन्न होता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जिनमें सदा दुःख ही रहता है—जैसे अज्ञानी की संगति में सदा दुःख रहता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सूर्य उदय नहीं होता। कहीं सूर्य-चन्द्रमा दोनों उदय होते हैं। कहीं पशु ही रहते हैं। कहीं मनुष्य ही रहते हैं। कहीं दैत्य और कहीं देवता ही रहते हैं। कहीं किमान रहते हैं। कहीं धर्म का व्यवहार होता है। कहीं विद्याधर ही रहते हैं। कहीं उन्मत्त हाथी हैं। कहीं बड़े नन्दनवन हैं। कहीं ऐसे स्थान हैं जहाँ शास्त्र का विचार ही नहीं। कहीं शास्त्र के विचारवान् हैं। कहीं राज्य ही करते हैं। कहीं बड़ी वस्तियाँ हैं। कहीं उजाड़ वन हैं। कहीं पवन चलता है। कहीं बड़े सात छिद्र हैं। कहीं ऊर्ध्वशिखर हैं, जहाँ विद्याधर और देवता रहते हैं, कहीं मच्छ, यक्ष और राक्षस हैं और कहीं विद्याधरी देवियाँ महामत्त रहती हैं। इसी प्रकार अनन्त देशों और स्थानों की बस्तियाँ हैं। उस लोकालोक के शिखर पर सात योजन का एक तालाब है, जिसमें कमल लगे हैं; सब ओर कल्पवृक्ष हैं और वहाँ के सब पत्थर चिन्तामणि हैं। उसके उत्तर ओर एक सुवर्ण की शिला पड़ी है, जिसके शिखर पर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बैठते और विलास करते हैं। उसकी शिला में मैं रहती हूँ और मेरा भर्त्ता और सम्पूर्ण परिवार भी वहीं रहता है।