योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 554, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५५४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
हे मुनीश्वर ! उसमें एक वृद्ध ब्राह्मण रहता है, जो अब तक जीता है और एकान्त जाकर सदा वेद का अध्ययन करता है। उसने मुझको अपने विवाह के निमित्त अपने मन में उपजाया था और अब में बड़ी हुई हूँ तो वह मेरे साथ विवाह नहीं करता। वह जब से उपजा है, तब से ब्रह्मचारी ही रहता है और वेद का अध्ययन करके विरक्तचित्त हुआ है। हे मुनीश्वर ! मैं वस्त्रों और भूषणों में युक्त हूँ; चन्द्रमा की नाईं मेरे सुन्दर अङ्ग हैं और मैं सब जीवों के मोहनेवाली हूँ। मुझको देखकर कामदेव भी मूर्च्छित हो जाता है। फूलों की नाईं मेरा हँसना है और सब गुण मुझमें हैं। महालक्ष्मी की में सखी हूँ। पर मुझको त्यागकर वह ब्राह्मण एकान्त में जाकर बैठा है और सदा वेद का अध्ययन करता है। वह बड़ा दीर्घसूत्री है। जब में उत्पन्न हुई थी, तब वह कहता था कि मैं तुझको ब्याहूँगा, पर अब में यौवन अवस्था को प्राप्त हुई हूँ, तब त्यागकर एकान्त में जा बैठा है। हे मुनीश्वर ! स्त्री को सदा भर्ता चाहिए। अब में यौवन अवस्था से जलती हूँ। बड़े तालाब जो कमल-सहित दृष्टिगत होते हैं, वे भर्ता के वियोग में मुझे अग्नि के अङ्गारे से लगते हैं। नन्दनवन आदि बड़े बाग मुझको मरुस्थल से लगते हैं। इनको देखकर में रुदन करती हूँ और नेत्रों से ऐसा जल बहता है, जैसे वर्षाकाल का मेघ बरसता है।
जब में मुख आदि अपने अङ्गों को देखती हूँ, तब नेत्रों के जल से कमलिनी डूब जाती है, और जब कल्पतरु और तमाल वृक्ष के फूलों और पत्रों की शय्या पर शयन करती हूँ, तब अङ्गों के स्पर्श से फूल जलते हैं। जिस कमल में मेरा स्पर्श होता है, वह जल जाता है। हे भगवन् ! भर्ता के वियोग में में तपी हुई हूँ। जब में बरफ के पर्वत पर जा बैठती हूँ, तब वह भी अग्नि सा हो जाता है। में नाना प्रकार के फूलों को गले में डालती हूँ, तब भी तपन नहीं निवृत्ति होती। मेरे भर्ता की देह त्रिलोकी है और उसके चरणों में सदा मेरी प्रीति रहती है। में गृह के सब आचार करती हूँ और सब गुणों से सम्पन्न हूँ; सबको धारण कर रही हूँ; सबकी प्रतिपालक हूँ और ज्ञेय की मुझको