भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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❉ निर्वाण प्रकरण ❉

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सदा इच्छा रहती है । हे मुनीश्वर ! मैं पतिव्रता हूँ; जो पुरुष पतिव्रता स्त्री को ग्रहण करता है, वह बहुत सुख पाता है और तीनों ताप से रहित होता है, क्योंकि उसमें सब गुण मिलते हैं । वह सदा भर्ता में प्रीति करती है और भर्ता की प्रीति उसमें होती है—ऐसी मैं हूँ । पर मुझको त्यागकर वह ब्राह्मण एकान्त में जा बैठा है और सब समय वेद का अध्ययन और विचार करता रहता है । मेरे भर्ता ने कामना का त्याग किया है, उसको कोई इच्छा नहीं रही और मैं उसके वियोग से जलती हूँ । हे भगवन् ! वह स्त्री भी भली है, जिसका भर्ता विवाह करके मर गया हो । कुँआरी भी भली है और जो भर्ता के संयोग से प्रथम ही मर जाती है यह भी श्रेष्ठ है । पर जिसको भर्ता प्राप्त हुआ है परन्तु उसको स्पर्श नहीं करता तो उसको बड़ा दुःख होता है । हे मुनीश्वर ! जो पुरुष परमात्मा की भावना के संस्कार से रहित उत्पन्न हुआ है वह वैसे ही निष्फल है, जैसे पात्र बिना अन्न निष्फल होता है । मतलब यह कि सन्तजन, तीर्थ आदि से रहित पापस्थानों में डाला हुआ धन निष्फल होता है । जैसे सम-दृष्टि बिना बोध और वेश्या की लज्जा निष्फल है, वैसे ही मैं पति बिना निष्फल हूँ । हे भगवन् ! जब मैं शय्या बिछाकर शयन करती हूँ, तब फूल भी जल जाते हैं । जैसे समुद्र का बड़वाग्नि जलाता है, वैसे ही कमलों को मेरे अङ्ग जलाते हैं । हे मुनीश्वर ! जो सुख के स्थान हैं वे मुझको दुःखदायक हैं और जो मध्य स्थान हैं, वे न सुख देते हैं न दुःख देते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विद्याधरीविशोकवर्णनं नाम शताधिकत्र्यशीतितमस्सर्गः ॥ १२३ ॥

हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैं तप करती फिरती हूँ । अब मुझको भी भर्ता के वियोग से वैराग्य उपजा है । भर्ता की वैराग्यरूपी ओस मेरी तृष्णारूपी कमलिनी पर पड़ी है और उससे में जल गई हूँ, इससे जगत् मुझको नीरस लगता है । हे मुनीश्वर ! यह जगत् असार है इसमें स्थित वस्तु कोई नहीं; इस कारण मुझको भी वैराग्य उपजा है । मेरा भर्ता स्वयम्भू संसार से विरक्त होकर एकान्त में जा बैठा है और वेद को