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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

५५३

द्वीप है और उस द्वीप के ऊपर दूना समुद्र है। इसी प्रकार पृथ्वी को लाँघ के आगे सुवर्ण की पृथ्वी आती है, जो दशसहस्र योजन पर्यन्त महासुन्दर प्रकाशरूप है। उसने सूर्य-चन्द्रमा के प्रकाश को भी लज्जित किया है। उसके बाद ओर लोकालोक पर्वत है, जो सर्वत्र प्रसिद्ध है, और उनमें बहुत से नगर वसते है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सदा प्रकाश ही रहता है—जैसे ज्ञानी के हृदय में सदा प्रकाश रहता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सर्वदा अन्धकार ही रहता है—जैसे अज्ञानी के हृदय में अन्धकार रहता है। कहीं ऐसे भी स्थान हैं, जहाँ प्रत्यक्ष पदार्थ मिलते हैं-जैसे पंडित के हृदय में अर्थ प्रत्यक्ष होते हैं। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ पदार्थ नहीं मिलते-जैसे मूर्ख के हृदय में वेद का अर्थ नहीं प्रकट होता। कहीं ऐसे स्थान हैं, जिनके देखने से हृदय प्रसन्न होता है-जैसे सन्तों के दर्शन से हृदय प्रसन्न होता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जिनमें सदा दुःख ही रहता है—जैसे अज्ञानी की संगति में सदा दुःख रहता है। कहीं ऐसे स्थान हैं, जहाँ सूर्य उदय नहीं होता। कहीं सूर्य-चन्द्रमा दोनों उदय होते हैं। कहीं पशु ही रहते हैं। कहीं मनुष्य ही रहते हैं। कहीं दैत्य और कहीं देवता ही रहते हैं। कहीं किमान रहते हैं। कहीं धर्म का व्यवहार होता है। कहीं विद्याधर ही रहते हैं। कहीं उन्मत्त हाथी हैं। कहीं बड़े नन्दनवन हैं। कहीं ऐसे स्थान हैं जहाँ शास्त्र का विचार ही नहीं। कहीं शास्त्र के विचारवान् हैं। कहीं राज्य ही करते हैं। कहीं बड़ी वस्तियाँ हैं। कहीं उजाड़ वन हैं। कहीं पवन चलता है। कहीं बड़े सात छिद्र हैं। कहीं ऊर्ध्वशिखर हैं, जहाँ विद्याधर और देवता रहते हैं, कहीं मच्छ, यक्ष और राक्षस हैं और कहीं विद्याधरी देवियाँ महामत्त रहती हैं। इसी प्रकार अनन्त देशों और स्थानों की बस्तियाँ हैं। उस लोकालोक के शिखर पर सात योजन का एक तालाब है, जिसमें कमल लगे हैं; सब ओर कल्पवृक्ष हैं और वहाँ के सब पत्थर चिन्तामणि हैं। उसके उत्तर ओर एक सुवर्ण की शिला पड़ी है, जिसके शिखर पर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बैठते और विलास करते हैं। उसकी शिला में मैं रहती हूँ और मेरा भर्त्ता और सम्पूर्ण परिवार भी वहीं रहता है।

५५४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

हे मुनीश्वर ! उसमें एक वृद्ध ब्राह्मण रहता है, जो अब तक जीता है और एकान्त जाकर सदा वेद का अध्ययन करता है। उसने मुझको अपने विवाह के निमित्त अपने मन में उपजाया था और अब में बड़ी हुई हूँ तो वह मेरे साथ विवाह नहीं करता। वह जब से उपजा है, तब से ब्रह्मचारी ही रहता है और वेद का अध्ययन करके विरक्तचित्त हुआ है। हे मुनीश्वर ! मैं वस्त्रों और भूषणों में युक्त हूँ; चन्द्रमा की नाईं मेरे सुन्दर अङ्ग हैं और मैं सब जीवों के मोहनेवाली हूँ। मुझको देखकर कामदेव भी मूर्च्छित हो जाता है। फूलों की नाईं मेरा हँसना है और सब गुण मुझमें हैं। महालक्ष्मी की में सखी हूँ। पर मुझको त्यागकर वह ब्राह्मण एकान्त में जाकर बैठा है और सदा वेद का अध्ययन करता है। वह बड़ा दीर्घसूत्री है। जब में उत्पन्न हुई थी, तब वह कहता था कि मैं तुझको ब्याहूँगा, पर अब में यौवन अवस्था को प्राप्त हुई हूँ, तब त्यागकर एकान्त में जा बैठा है। हे मुनीश्वर ! स्त्री को सदा भर्ता चाहिए। अब में यौवन अवस्था से जलती हूँ। बड़े तालाब जो कमल-सहित दृष्टिगत होते हैं, वे भर्ता के वियोग में मुझे अग्नि के अङ्गारे से लगते हैं। नन्दनवन आदि बड़े बाग मुझको मरुस्थल से लगते हैं। इनको देखकर में रुदन करती हूँ और नेत्रों से ऐसा जल बहता है, जैसे वर्षाकाल का मेघ बरसता है।

जब में मुख आदि अपने अङ्गों को देखती हूँ, तब नेत्रों के जल से कमलिनी डूब जाती है, और जब कल्पतरु और तमाल वृक्ष के फूलों और पत्रों की शय्या पर शयन करती हूँ, तब अङ्गों के स्पर्श से फूल जलते हैं। जिस कमल में मेरा स्पर्श होता है, वह जल जाता है। हे भगवन् ! भर्ता के वियोग में में तपी हुई हूँ। जब में बरफ के पर्वत पर जा बैठती हूँ, तब वह भी अग्नि सा हो जाता है। में नाना प्रकार के फूलों को गले में डालती हूँ, तब भी तपन नहीं निवृत्ति होती। मेरे भर्ता की देह त्रिलोकी है और उसके चरणों में सदा मेरी प्रीति रहती है। में गृह के सब आचार करती हूँ और सब गुणों से सम्पन्न हूँ; सबको धारण कर रही हूँ; सबकी प्रतिपालक हूँ और ज्ञेय की मुझको

❉ निर्वाण प्रकरण ❉

५५५

सदा इच्छा रहती है । हे मुनीश्वर ! मैं पतिव्रता हूँ; जो पुरुष पतिव्रता स्त्री को ग्रहण करता है, वह बहुत सुख पाता है और तीनों ताप से रहित होता है, क्योंकि उसमें सब गुण मिलते हैं । वह सदा भर्ता में प्रीति करती है और भर्ता की प्रीति उसमें होती है—ऐसी मैं हूँ । पर मुझको त्यागकर वह ब्राह्मण एकान्त में जा बैठा है और सब समय वेद का अध्ययन और विचार करता रहता है । मेरे भर्ता ने कामना का त्याग किया है, उसको कोई इच्छा नहीं रही और मैं उसके वियोग से जलती हूँ । हे भगवन् ! वह स्त्री भी भली है, जिसका भर्ता विवाह करके मर गया हो । कुँआरी भी भली है और जो भर्ता के संयोग से प्रथम ही मर जाती है यह भी श्रेष्ठ है । पर जिसको भर्ता प्राप्त हुआ है परन्तु उसको स्पर्श नहीं करता तो उसको बड़ा दुःख होता है । हे मुनीश्वर ! जो पुरुष परमात्मा की भावना के संस्कार से रहित उत्पन्न हुआ है वह वैसे ही निष्फल है, जैसे पात्र बिना अन्न निष्फल होता है । मतलब यह कि सन्तजन, तीर्थ आदि से रहित पापस्थानों में डाला हुआ धन निष्फल होता है । जैसे सम-दृष्टि बिना बोध और वेश्या की लज्जा निष्फल है, वैसे ही मैं पति बिना निष्फल हूँ । हे भगवन् ! जब मैं शय्या बिछाकर शयन करती हूँ, तब फूल भी जल जाते हैं । जैसे समुद्र का बड़वाग्नि जलाता है, वैसे ही कमलों को मेरे अङ्ग जलाते हैं । हे मुनीश्वर ! जो सुख के स्थान हैं वे मुझको दुःखदायक हैं और जो मध्य स्थान हैं, वे न सुख देते हैं न दुःख देते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विद्याधरीविशोकवर्णनं नाम शताधिकत्र्यशीतितमस्सर्गः ॥ १२३ ॥

हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैं तप करती फिरती हूँ । अब मुझको भी भर्ता के वियोग से वैराग्य उपजा है । भर्ता की वैराग्यरूपी ओस मेरी तृष्णारूपी कमलिनी पर पड़ी है और उससे में जल गई हूँ, इससे जगत् मुझको नीरस लगता है । हे मुनीश्वर ! यह जगत् असार है इसमें स्थित वस्तु कोई नहीं; इस कारण मुझको भी वैराग्य उपजा है । मेरा भर्ता स्वयम्भू संसार से विरक्त होकर एकान्त में जा बैठा है और वेद को

५५६ ❉ योगवाशिष्ठ ❉

विचारता रहता है, परन्तु आत्मपद को नहीं प्राप्त हुआ। वह मन को स्थिर करने का उपाय करता है, परन्तु अब तक उसका मन स्थिर नहीं हुआ। सब एषणाओं से रहित होकर वह शास्त्र को विचारता रहता है पर आत्मा का साक्षात्कार उसे नहीं हुआ। मुझको भी वैराग्य उपजा है। अब हम दोनों वैराग्य से सम्पन्न हुए हैं और परमपद पाने की इच्छा हुई है। शरीर हमको नीरस हो गया है—जैसे शरत्काल की वेल नीरस होती है—इस कारण में योग की धारणा करने लगी हूँ। यह शक्ति अब मुझको उत्पन्न हुई है कि आकाशमार्ग को आऊँ और जाऊँ; योग-धारणा से आकाश पर उड़ने की भी शक्ति हुई है और सिद्धमार्ग की धारणा से सिद्धों के मार्ग में भी आती जाती हूँ, परन्तु अर्थ कुछ सिद्ध न हुआ, क्योंकि पाने योग्य आत्मपद नहीं प्राप्त हुआ, जिसके पाने से कोई दुःख न रहे। अब मुझे निर्वाण की इच्छा हुई है।

मैंने सिद्धों के गण, देवता, विद्याधर और ज्ञानियों के बहुत स्थान देखे हैं; परन्तु जहाँ गई, वहाँ सब तुम्हारी ही स्तुति करते हैं कि वशिष्ठजी आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान को निवृत्त करते हैं। जैसे बड़ा मेघ बरसता है, परन्तु जब वायु चलता है, तब मेघ को दूर करता है, वैसे ही तुम्हारे वचन अज्ञान को दूर करते हैं। जब ऐसे मैंने तुम्हारी स्तुति सुनी, तब मैंने इस सृष्टि में आने का अभ्यास किया और धारणा के अभ्यास से तुम्हारी सृष्टि में आई हूँ। इससे हे मुनीश्वर! मेरी और मेरे भर्त्ता की शान्ति के लिए आत्मज्ञान का उपदेश करो। मेरा भर्त्ता, जो मन को स्थिर करने का यत्न करता है, उसको तुम ऐसा उपदेश करो कि शीघ्र ही स्थिर हो और आत्मज्ञान को पावे। और मुझको भी आत्मज्ञान का उपदेश करो। हे भगवन्! तुम माया से पार मुझको दीखते हो, इस कारण में तुम्हारी शरण आई हूँ। मैं स्त्री बुद्धि से तुम्हारे निकट नहीं आई, शिष्यभाव को लेकर आई हूँ और मैं जानती हूँ कि मेरा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है, क्योंकि जो कोई महापुरुष की शरण आता है तो निष्फल नहीं जाता, बल्कि सब प्रयोजन पूर्ण होता है। जैसी किसी की कामना

५५६ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

विचारता रहता है, परन्तु आत्मपद को नहीं प्राप्त हुआ । वह मन को स्थिर करने का उपाय करता है, परन्तु अब तक उसका मन स्थिर नहीं हुआ । सब एषणाओं से रहित होकर वह शास्त्र को विचारता रहता है पर आत्मा का साक्षात्कार उसे नहीं हुआ । मुझको भी वैराग्य उपजा है । अब हम दोनों वैराग्य से सम्पन्न हुए हैं और परमपद पाने की इच्छा हुई है । शरीर हमको नीरस हो गया है—जैसे शरत्काल की बेल नीरस होती है—इस कारण मैं योग की धारणा करने लगी हूँ । यह शक्ति अब मुझको उत्पन्न हुई है कि आकाशमार्ग को आऊँ और जाऊँ; योग-धारणा से आकाश पर उड़ने की भी शक्ति हुई है और सिद्धमार्ग की धारणा से सिद्धों के मार्ग में भी आती जाती हूँ, परन्तु अर्थ कुछ सिद्ध न हुआ, क्योंकि पाने योग्य आत्मपद नहीं प्राप्त हुआ, जिसके पाने में कोई दुःख न रहे । अब मुझे निर्वाण की इच्छा हुई है ।

मैंने सिद्धों के गण, देवता, विद्याधर और ज्ञानियों के बहुत स्थान देखे हैं; परन्तु जहाँ गई, वहाँ सब तुम्हारी ही स्तुति करते हैं कि वशिष्ठजी आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान को निवृत्त करते हैं । जैसे बड़ा मेघ बरसता है, परन्तु जब वायु चलता है, तब मेघ को दूर करता है, वैसे ही तुम्हारे वचन अज्ञान को दूर करते हैं । जब ऐसे मैंने तुम्हारी स्तुति सुनी, तब मैंने इस सृष्टि में आने का अभ्यास किया और धारणा के अभ्यास से तुम्हारी सृष्टि में आई हूँ । इससे हे मुनीश्वर ! मेरी और मेरे भर्त्ता की शान्ति के लिए आत्मज्ञान का उपदेश करो । मेरा भर्त्ता, जो मन को स्थिर करने का यत्न करता है, उसको तुम ऐसा उपदेश करो कि शीघ्र ही स्थिर हो और आत्मज्ञान को पावै । और मुझको भी आत्मज्ञान का उपदेश करो । हे भगवन् ! तुम माया से पार मुझको दीखते हो, इस कारण मैं तुम्हारी शरण आई हूँ । मैं स्त्री बुद्धि मे तुम्हारे निकट नहीं आई, शिष्यभाव को लेकर आई हूँ और मैं जानती हूँ कि मेरा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है, क्योंकि जो कोई महापुरुष की शरण आता है तो निष्फल नहीं जाता, बल्कि सब प्रयोजन पूर्ण होता है । जैसी किसी की कामना

५५८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

के दो ध्रुव हैं। काल इस चक्र को फेरता है। सो फेरता-फेरता नाशरूप जो काल है, वह कल्प के अन्त में उस चक्र के मुख में जा समाता है।

हे मुनीश्वर ! परमात्मा अनन्त है, उसका कोई अन्त नहीं जान सकता। जब संवेदन जगता है तब जीव जानता है कि यह जगत् ईश्वर की सत्ता से है और जब फुरने से रहित होता है, तब जाना नहीं जाता कि जगत् कहाँ गया। हे मुनीश्वर ! तुम चलो और मेरी सृष्टि का विलास देखो। तुम तो जगत् के विलास से पार हुए हो और यद्यपि तुमको इच्छा नहीं है तो भी कृपा करके उस शिला में हमारी सृष्टि देखो। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार कहकर वह आकाशमार्ग में मुझे ले चली—जैसे गन्ध को वायु ले जाता है। तब मैं और वह दोनों आकाशमार्ग में उड़े और भूताकाश में चिरकाल तक उड़ते गये। तब हमको लोकालोक पर्वत देख पड़ा। उसके निकट जाकर उसके शिखर देखे कि बहुत ऊँचे गये हैं और बड़े मेघ उस पर विचरते हैं। शिखर ऐसे सुन्दर हैं, मानो क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा निकला है। वहाँ जाकर मैंने महासुन्दर सुवर्ण की एक शिला देखी। उसके निकट गया तो मैंने कहा, हे देवि ! वह तो शिला पड़ी है, तुम्हारी सृष्टि कहाँ है ? इसमें पृथ्वी, द्वीप की मर्यादा, जिसका आवरण चौहेंफेर समुद्र होता है, और उन पर की दसमहस योजनपर्यन्त सुवर्ण की पृथ्वी, पर्वत, सप्तलोक, आकाश, दशोंदिशा, तारामण्डल, रात्रि-दिन के प्रकाश सूर्य, चन्द्रमा और भूतों का संचार, देवगण, विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, योगेश्वर, वरुण, कुबेर, जगत् की उत्पत्ति प्रलय का संचार, पाताल की भूमिका, मण्डलेश्वर, न्याय करनेवाले, मरुस्थल की भूमिका, नन्दनवन आदिक, दैत्यों के विरोधी देवता आदि कहाँ हैं ? यह तो एक शिला मात्र है।

हे राम ! जब मैंने आश्चर्य को प्राप्त होकर ऐसे कहा, तब विद्याधरी बोली—हे भगवन् ! मुझको तो प्रत्यक्ष इस शिला में अपनी सृष्टि दिखती है—जैसे शुद्ध आईने में अपना मुख दिखता है, वैसे ही मुझको अपनी सृष्टि इस शिला में प्रत्यक्ष दिखती है—जैसी मर्यादा देश

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५५६

देशान्तर की मुझको भासित होती है, इसका संस्कार मेरे हृदय में है, इसी से मुझको प्रत्यक्ष भासित है। तुम्हारे हृदय में इसका संस्कार नहीं है, इसी से तुमको नहीं भासित होती। तुम्हारी सृष्टि की अपेक्षा यह शिला पड़ी है और तुमको शिला का निश्चय है, इस कारण तुमको इसमें जगत् नहीं दीखता। हे भगवन् ! जिसका अभ्यास होता है, वह पदार्थ अवश्य प्राप्त होता है और वही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! गुरु शिष्य को उपदेश करता है, पर उपदेशमात्र से इष्ट की प्राप्ति नहीं होती। जब उसका अभ्यास करे, तब इष्ट की प्राप्ति होती है। हे मुनीश्वर ! ऐसा न्याय और सिद्धता कोई नहीं, जो अभ्यास करने से न मिले, ऐसी कला कोई नहीं, जो अभ्यास करने से न प्राप्त हो और ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो अभ्यास की प्रबलता से सिद्ध न हो। जो थककर छोड़े नहीं तो अवश्य सिद्ध होते हैं। हे मुनीश्वर ! जो कुछ सिद्ध होता दिखता है, सो सब अभ्यास से होता है। प्रथम जब मैं तुम्हारे साथ आई थी, तब मुझको भी शिला में सृष्टि नहीं दीखी थी, क्योंकि यह सृष्टि अन्तवाहक शरीर में स्थित है। तुम्हारे साथ द्वैतरूपी कथा के कहने से अन्तवाहक शरीर मुझको भूल गया था, इससे विश्व की चर्चा और तुम्हारी सृष्टि की चर्चा करके मुझको वह स्पष्ट नहीं भासित होती। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही तुम्हारी सृष्टि के संकल्प से मुझको भी अपनी सृष्टि नहीं दिखती, परन्तु चिरकाल जो अभ्यास किया है, इससे फिर भासित होती है, क्योंकि जो दृढ़ अभ्यास होता है, उसकी जय होती है। हे मुनीश्वर, चिन्मात्र पद में फुरने से आदि जीवों के शरीर अन्तवाहक हुए हैं, अर्थात् आकाशरूप शरीर थे। जब उनमें प्रमाद से दृढ़ अभ्यास हुआ, तब आधिभौतिक होकर दिखने लगे। जब फिर भावना उलटकर योग की धारणा से अभ्यास होता है, तब आधिभौतिकता क्षीण हो जाती है और अन्तवाहकता प्रकट होती है। उससे जीव आकाश में पक्षी की नाईं उड़ता फिरता है। इससे तुम देखो कि अभ्यास के बल से सब कुछ सिद्ध होता है।

५६० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

हे मुनीश्वर ! अज्ञान से मनुष्यों को अहंकाररूपी पिशाच लगा है, सो दृढ़ स्थित हुआ है। जब शास्त्र के वचनों में दृढ़ अभ्यास होता है, तब वह क्षीण हो जाता है। हे मुनीश्वर ! तुम देखो, जिस किसी को इष्ट की प्राप्ति होती है सो अभ्यास के बल में होती है। जो अज्ञानी होता है और ब्रह्म का अभ्यास करता है सो ज्ञानी होता है। पर्वत बड़ा है, परन्तु अभ्यास में कोई उसे चूर्ण किया चाहे तो वह चूर्ण हो जाता है। सम्पूर्ण वृक्ष का खा लेना कठिन है, परन्तु अभ्यास करके शनैः शनैः घुन उसे खा जाता है। आप भी छोटा है, परन्तु जो वस्तु पाना कठिन हो, वह उसे अभ्यास से सुगम हो जाती है। जैसे चिन्तामणि और कल्पतरु के निकट जाकर जिस पदार्थ की इच्छा करो वह सिद्ध होता है, वैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि और कल्पतरु में जीव जिस पदार्थ का अभ्यास करता है, वह सिद्ध होता है और—अभ्यासरूपी भूमिका फल देती है। बालक अवस्था से जो अभ्यास होता है, वही वृद्धावस्था तक रहता है। हे मुनीश्वर ! जो बान्धव नहीं होता और निकट रहता है तो निकट के अभ्यास से बान्धव हो जाता है, परन्तु बान्धव जो विदेश में रहता है तो अभ्यास की क्षीणता से वह अबान्धव हो जाता है। हे मुनीश्वर ! विष भी अमृत की भावना करने में अभ्यास के द्वारा अमृत हो जाता है। जो मिष्टान्न में कटुक भावना होती है तो वह कटु लगता है और कटु में मिष्टान्न की भावना कीजिये तो वह मिष्टान्न लगता है—जैसे किसी को नीम और किसी को मिष्टान्न प्रिय है।

हे मुनीश्वर ! जो कुछ सिद्ध होता है, वह अभ्यास के बल में सिद्ध होता है। जो पुण्य किया होता है तो पाप के अभ्यास से नष्ट हो जाता है और पाप का पुण्य के अभ्यास से नाश होता है। माता भी अमाता हो जाती है। अर्थ के अनर्थ हो जाते हैं। मित्र अमित्र हो जाता है और भाग्य अभाग्य हो जाता है। निदान सब पदार्थ चल हो जाते हैं, परन्तु अभ्यास का नाश कदाचित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जो पदार्थ निकट पड़ा होता है और साधक इन्द्रियाँ भी विद्यमान होती हैं, तो भी वह अभ्यास के बिना नहीं प्राप्त होता। जहाँ अभ्यासरूपी

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५६१

सूर्य उदय होता है, वहाँ इष्ट की प्राप्ति होती है। अज्ञानरूपी विशूचिका रोग ब्रह्मचर्चा के अभ्यास से नष्ट हो जाता है। हे मुनीश्वर! संसार-रूपी समुद्र आदि-अन्त से रहित है, पर आत्मअभ्यासरूपी नौका द्वारा जीव उसे तर जाता है—जो अभ्यास को न त्यागोगे तो अवश्य तरोगे। हे मुनीश्वर! जो पदार्थ उदय हो, उसके अभाव की भावना कीजिये तो अस्त हो जाता है, और जो अस्त हो, पर उसके उदय होने की भावना कीजिये तो वह उदय होता है। जैसे सिद्ध के शाप से प्रत्यक्ष प्राप्त पदार्थ नष्ट हो जाता है और वरदान से अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति होती है। हे मुनीश्वर! जो पुरुष शास्त्र से इष्ट पदार्थ को सुनता है और उसका अभ्यास नहीं करता, उसे मनुष्यों में नीच जानो। उसको इष्ट पदार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होती। जैसे वन्ध्या के पुत्र नहीं होता, वैसे ही उसको इष्ट पदार्थ की सिद्धि नहीं होती। हे मुनीश्वर! जो आत्मरूपी इष्ट को त्यागकर और किसी पदार्थ की वाञ्छा करता है, वह अनिष्ट के बाद अनिष्ट पाकर एक नरक से दूसरे नरक को भोगता है। हे मुनीश्वर! जिसको अभ्यास का भी अभ्यास प्राप्त हुआ है, उसको शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होती है। जीव अभ्यास के बल से इष्ट को पाता है—जैसे प्रकाश से पदार्थ देखिये कि वह पड़ा है। तो उसका नाम अभ्यास है और उसके निमित्त यत्न करना अभ्यास का अभ्यास है। जब यत्न और अभ्यास करते हैं, तब पदार्थ को पाते हैं। बारम्बार चिन्तन करने का नाम अभ्यास है। जब ऐसा अभ्यास हो, तब इष्ट पदार्थ की प्राप्ति होती है—अन्यथा नहीं होती। हे मुनीश्वर! चौदह प्रकार के भूतजात हैं, जैसा-जैसा किसी को अभ्यास है उसके बल से वैसा ही वैसा वह सिद्ध होता है। अभ्यासरूपी सूर्य के प्रकाश से जीव अपने इष्ट पदार्थ पाता है। अभ्यास के बल से भय निवृत्त होता है और पृथ्वी, पर्वत, वन, कन्दरा में निर्भय होकर जीव विचरता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चाशीतितमसर्गः ॥ १५ ॥

विद्याधरी बोली, हे मुनीश्वर! सब पदार्थ निरन्तर अभ्यास से सिद्ध

५६२ ❇ योगवाशिष्ट ❇

होते हैं । तुम्हारा शिला में दृढ़ निश्चय है, इससे तुमको शिला ही दिखती है और मुझको इसमें सृष्टि दिखती है । जब तुम्हारा संकल्प भी मेरे संकल्प के साथ मिले, तब तुमको भी यह जगत् भासित हो । यह जगत् जो स्थित है सो मेरे अन्तवाहक में है । आदि-वपु सबका अन्त-वाहक है । अतः अन्तवाहक में सबकी एकता है-जैसे समुद्र में सब तरङ्गों की एकता होती है । हे मुनीश्वर ! जब तुम धारणा का अभ्यास करके शुद्ध बुद्धि को प्राप्त होगे, तब तुमको इस शिला में सृष्टि भासित होगी । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब उसने इस प्रकार मुझसे शुद्ध युक्ति कही, तब मैंने पद्मासन लगाकर सब विषय त्याग दिये और कथा के क्षोभ का भी त्यागकर अपने आधिभौतिक का भी त्याग किया । तब निरन्तर शुद्ध बोध का अभ्यास करने से मुझमें बोध का अनुभव उदय हुआ । जैसे मेघ के अभाव से शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही कलना से रहित मुझमें शुद्ध बोध का अनुभव उदय हुआ, जो उदय और अस्त से रहित परम शान्तरूप है । उसमें वह शिला मुझको आकाशरूप देख पड़ी और शिलातत्त्व में केवल बोधमात्र दृष्टिगोचर हुई । पृथ्वी आदि तत्त्व कोई मुझको नजर न आये, केवल अद्वैत आकाश आत्मतत्त्वमात्र अपना रूप ही दृष्टिगोचर हुआ पर जब बोधमात्र से अन्तवाहकरूप होकर स्पन्दन फुरा, तब अन्तवाहक से उस शिला में सृष्टि भासित होने लगी । जैसे मनोराज्य की सृष्टि होती है और बोध से भिन्न-भिन्न नहीं होती, वैसे ही वह सृष्टि मुझको दिखी और शिला का रूप प्रतीत हुई । जैसे स्वप्न के गृह में शिला दिखे तो वह अनुभव ही शिला और गृहरूप होकर भाषित होता है, कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही वह शिला देख पड़ी ।

हे राम ! जैसे मैंने आकाशरूप वह शिला देखी, वैसे ही सब जगत् चिदाकाशरूप है, कुछ द्वैत नहीं बना । सर्वदा आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है, पर आत्मा के अज्ञान से द्वैत भासित होता है-जैसे कोई पुरुष स्वप्न में अपना सिर कटा देखे और रुदन करे, पर जागकर अपने को ज्यों का त्यों देखता है, वैसे ही जब तक जीव अज्ञाननिद्रा में सोता है,

निर्वाण प्रकरण५६३

तब तक जगत-भ्रम नहीं मिटता। जब स्वरूप में जागकर देखेगा, तब सब भ्रम मिट जावेगा और केवल अपना ही रूप भासित होगा। हे राम! यह आश्चर्य देखो कि जो वस्तु सत्यरूप है, वह असत् की नाईं भासित होती है। आत्मा सदा सत्यरूप है, पर अज्ञान से नहीं भासित होता और जो असत्यरूप है वह सत् की नाईं भासित होता है। शरीरादिक दृश्य असतरूप हैं, वे सत्य से होकर भासित होते हैं। हे रामचन्द्र! आत्मा सदा प्रत्यक्ष है और शरीरादिक परोक्ष हैं, पर अज्ञान से शरीरादिक प्रत्यक्ष लगते हैं, और आत्मपद परोक्ष लगता है। हे राम! आत्मा सदा प्रत्यक्ष है और इस लोक अथवा परलोक की क्रिया जो सिद्ध होती है, वह सम्पूर्ण आत्मसत्ता से ही सिद्ध होती है। प्रत्यक्ष प्रमाण आत्मसत्ता से ही भासित होता है—आदि प्रत्यक्ष आत्मा ही है और सब कुछ आत्मा के पीछे जाना जाता है। जो पुरुष कहते हैं कि आत्मा योग और मन से प्रत्यक्ष होता है, वे मूर्ख हैं; आत्मा सदा प्रत्यक्ष है और प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी आत्मा से ही सिद्ध होते हैं। माया इसी का नाम है कि सदा अपरोक्ष वस्तु आत्मा को परोक्ष जानना और शरीरादिक असत्य को सत्य मानना। हे राम! जितने जीव हैं उनका वास्तव रूप ब्रह्म ही है। उनमें आदि फुरना अन्तवाहक रूप हुआ है। उनके अनन्तर आधिभौतिक भासित होने लगा है। लोग भ्रम से आधिभौतिक को अपना रूप जानते हैं। पर जो सदा निर्विकार, निराकार, निर्गुण स्वरूप अपना रूप अनुभव है, उसको कोई नहीं जानता। सब जीवों का आदि शरीर अन्तवाहक है। वह शुद्ध आत्मा का किञ्चन केवल आकाशरूप है। और कुछ बना नहीं संकल्प करके आधिभौतिकता दृढ़ हुई। मिथ्या भ्रान्ति से भासित होती है। जैसे स्वप्न में आधिभौतिक शरीर भासित होता है, वैसे ही जाग्रत् में आधिभौतिक शरीर भासित होता है। अन्तवाहक अविनाशी है—इस लोक और परलोक में इसका नाश नहीं होता। वास्तव में बोधस्वरूप से भिन्न कुछ नहीं, भ्रम से आधिभौतिक दिखता है।

जैसे सूर्य की किरणों में जल, सीपी में रूपा, रस्सी में सर्प और

५६४ ❈ योगवाशिष्ठ ❈

आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही भ्रम में अपने में आधि- भौतिक शरीर भासित होता है। हे राम! यह आश्चर्य है कि सत्य वस्तु असत्य लगती है, और जो असत्य वस्तु है वह सत्य लगती है। इसका कारण अविचार है। यह मोह का माहात्म्य है कि सब का आदि जो प्रत्यक्ष आत्मा है, उसको लोग अप्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जगत् को प्रत्यक्ष जानते हैं। हे राम! यह जगत् भ्रम में भासित होता है और स्वप्न की नाईं मिथ्या है। जिन पदार्थों को लोग सुखरूप मानते हैं, वे दुःख के कारण हैं; क्योंकि उनका परिणाम दुःख है। इनमें प्रथम क्षण- सुख लगता है और फिर उनके वियोग से दुःख होता है, इसी कारण इनका नाम आपातरमणीय है—इनको पाकर शान्तिमान् कोई नहीं होता। जैसे मृगतृष्णा का क्षणसुख होता है और फिर उनके वियोग से दुःख होता है; क्योंकि उस जल को पाकर कोई तृप्त नहीं होता, वैसे ही विषय के सुखों से कोई तृप्त नहीं होता। जो उनमें लगते हैं, वे मूर्ख हैं। जो अत्युत्तम सुख है, वह अनुभव से प्रकाशित होता है। उसको त्यागकर विषय के सुख में जो लगते हैं वे मूर्ख हैं; वे शुद्ध आकाशरूप अनात्मरूप में जगत् देखते हैं। हे राम! जगत् जाल हुए की नाईं भासते हैं तो भी हुए नहीं—जैसे स्थाणु में पुरुष दिखता है तो भी हुआ नहीं, और जैसे सुवर्ण में भूषण दिखते हैं, वैसे ही यह जगत् प्रत्यक्ष दिखता है, पर कुछ नहीं है। हे राम! प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं है, तब अनुमानादिक प्रमाण कहाँ से सत्य हों? जैसे विम नदी में हाथी बह जाते हैं, उनमें रुई के बहने में क्या आश्चर्य है, वैसे ही प्रत्यक्ष प्रमाण के विषय जगत् को जब असत्य माना तब अनुमानप्रमाण से क्या वह सत होता है?

हे राम! केवल बोधमात्र में जगत् कुछ बना नहीं। हमको तो सदा ऐसे ही लगता है। पर अज्ञानी को जगत् भासित होता है—जैसे किसी पुरुष को स्वप्न में पर्वत देख पड़ते हैं और जाग्रत् पुरुष को नहीं दिखते, वैसे ही अज्ञानी को यह जगत् दिखता है, पर हमको तो आकाश, समुद्र, पर्वत, सब केवल बोधमात्र लगते हैं। जैसे कथा के

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६५

अर्थ श्रोता के हृदय में होते हैं, और जिसने नहीं सुनी, उसके हृदय में नहीं होते, वैसे ही मेरे सिद्धान्त को ज्ञानवान जानते हैं; अज्ञानी नहीं जान सकते। हे राम! जितना कुछ आधिभौतिक जगत् दिखता है वह अप्रत्यक्ष है और आत्मा सदा प्रत्यक्ष है। जो इस लोक अथवा परलोक का अर्थ है वह अनुभव से सिद्ध होता है; क्योंकि सबका आदि अनुभव प्रत्यक्ष है। उसको त्यागकर जो देहादिक दृश्य को अपना रूप जानते हैं और इन्हीं को प्रत्यक्ष जानते हैं, वे मूर्ख पशु और पत्थर से हैं और सूखे तृण की नांई तुच्छ हैं। जैसे भ्रमण से पर्वत आदि पदार्थ घूमते लगते हैं, वैसे ही अज्ञानी को आधिभौतिक भासित होते हैं। हे राम! यह सब जगत् परोक्ष है; क्योंकि इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होता है। जो नेत्र होते हैं तो रूप दिखता है और जो नेत्र न हों तो न दिखे, इसी प्रकार सब इन्द्रियों के विषय हैं। जो हों तो दिखें, नहीं तो न दिखें। आत्मा सदा प्रत्यक्ष है। उसके देखने में किसी और की अपेक्षा नहीं। हे राम! जो इन्द्रियों से सिद्ध हो वह असत् है। जो जगत् ही असत् हुआ तो उसके पदार्थ कैसे सत् हों? इससे इस जगत् की सत्यता छोड़कर शुद्धबोध में स्थित होओ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रत्यक्षप्रमाणजगन्निराकरणं नाम शताधिकषड्षष्टितमस्सर्गः ॥ १६६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब मैं उस शिला को बोधदृष्टि से देखता, तब वह मुझको ब्रह्मरूप लगती और जब संकल्पदृष्टि से देखता, तब पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, पर्वत, लोक, लोकपाल, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, पातालसंयुक्त जगत् दिखता। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही आत्मारूपी आदर्श में जगत् दिखता है। तब देवी ने शिला में प्रवेश किया और मैं भी संकल्परूपी शरीर से उसके साथ चला गया। हम दोनों जगत् के व्यवहार को लाँघते गये और जहाँ परमेष्ठी ब्रह्मा का स्थान था, वहाँ जा बैठे। तब देवी ने कहा, हे भगवन्! तुम परमेष्ठी से ऐसे कहना कि मुझको यह ले आई है और यह पूछना कि इसको जो तुमने विवाह के निमित्त उपजाया था तो फिर क्यों इसका त्याग

५६६ ✷ योगवाशिष्ठ ✷

किया ? हे मुनीश्वर ! उसने मुझको विवाह के अर्थ उत्पन्न किया था, पर जब मैं बड़ी हुई तब उसने मेरा त्याग किया है। उसको वैराग्य उपजा है और उसे देखकर अब मुझको भी वैराग्य उपजा है। इसी से मैं परम-पद की इच्छा रखती हूँ, जहाँ न द्रष्टा है, न दृश्य है, और न शून्य है, केवल शान्तरूप है, और जो सर्ग के आदि और महाकल्प के अन्त में रहता है उसमें स्थित होने की इच्छा है, जिसमें स्थित होने पर पहाड़ की भी निश्चल समाधि हो जाती है। ऐसे परमपद का उपदेश करो। हे राम ! इस प्रकार कहकर वह भर्त्ता के जगाने के लिए निकट जाकर बोली, हे नाथ ! तुम जागो; तुम्हारे गृह में दूसरे सृष्टि के ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठमुनि आये हैं। तुम उठकर इनका अर्ध्यपाद्य से पूजन करो; क्योंकि गृह में अतिथि आये हैं। महापुरुष केवल पूजा से ही प्रसन्न होते हैं।

हे राम ! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब ब्रह्माजी समाधि से उठे और उनके प्राण देह और नाड़ियों में आकर स्थित हुए। जैसे वसन्त ऋतु से सब वृक्षों में रस हो आता है, वैसे ही उनकी दसों इन्द्रियों और चारों अन्तःकरण में शनैःशनैः करके प्राण स्थित हुए और सब इन्द्रियाँ खिल आईं। तब उन्होंने मुझको और देवी को अपने सम्मुख देखा और ज्ञान में ॐकार का उच्चारण करके सिंहासन पर बैठे। ब्रह्माजी के जागने से बड़ा शब्द होने लगा और विद्याधर, गन्धर्व, ऋषि मुनि आकर प्रणाम करके स्तुति और ध्वनि से वेद पाठ करने लगे। ब्रह्मा बोले हे ऋषि ! कुशल तो है ? तुम इतनी दूर से क्यों आये हो ? तुम तो सार असार को जाननेवाले हो। जैसे हाथ में बेल का फल होता है, वैसे ही तुमको सम्पूर्ण ज्ञान है, बल्कि तुम ज्ञान के समुद्र हो। ऐसे कहकर उन्होंने अपने निकट आसन दिया और नेत्रों से आज्ञा की कि इस पर विश्राम करो। हे राम ! जब इस प्रकार उन्होंने मुझसे कहा, तब मैं प्रणाम करके उनके निकट जा बैठा और एक मुहूर्तपर्यन्त देवता, सिद्ध और ऋषियों के प्रणाम होते रहे।

उसके अनन्तर जब विद्याधर और देवता सब चले गये, तब मैंने कहा, हे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों के ज्ञाता ईश्वर परमेष्ठी ! तुम ऊँचे

निर्वाण प्रकरण५६७

आसन पर विराजमान हो और साक्षात् ब्रह्मज्ञान के समुद्र हो यह तुम्हारी शक्ति देवी है, जिसको तुमने भार्या बनाने के लिए उत्पन्न किया था और फिर उसे विरस जानकर त्याग दिया । तुम्हारे वैराग्य से इसको भी वैराग्य उपजा है । इसलिए यह मुझको यहाँ ले आई है कि तुम परमात्मतत्त्व की वाणी से हमको उपदेश करो । सो इसमें इसका क्या अभिप्राय है ? ब्रह्मा बोले, हे मुनीश्वर ! मैं शान्त, अजर-अमररूप हूँ और मुझमें उदय-अस्त कदापि नहीं होता । मैं परम आकाशरूप हूँ और अपने आपमें स्थित हूँ । न मेरी कोई स्त्री है और न मैंने किसी को उत्पन्न किया है, तथापि जो वृत्तान्त हुआ है, वह मैं कहता हूँ, क्योंकि महापुरुष के सामने ज्यों का त्यों कहना चाहिए । हे मुनीश्वर ! आदि शुद्ध चिदात्मा चिन्मात्र पद है । उसका किञ्चन जो अहं होकर फुरा है, उसका नाम आदि ब्रह्मा है । वही मैं हूँ, जैसे अविष्यत् सृष्टि का हो-मतलब यह कि मैं संकल्प-रूप द्रष्टा और संकल्परूप हूँ-पर वास्तव में आकाशरूप सदा निरावरण हूँ और अपने आप ही में मेरी अहंप्रतीति है । उसमें आदि जो संकल्प का फुरना हुआ है, उसमें जगत्-भ्रम रचा है और उस जगत्भ्रम में मर्यादा हुई है । संकल्प की अधिष्ठात्री जो ब्रह्मशक्ति है, वह भी शुद्ध है । हे मुनीश्वर, उस मर्यादा को युगों की सहस्र चौकड़ी बीती हैं-अब कलियुग है । कल्प और महाकल्प की मर्यादा पूरी हुई है, इससे मुझको परम चिदाकाश में स्थित होने की इच्छा हुई है और इसी से इसको नीरस जानकर मैंने त्याग किया है । जब इसका त्याग करूँगा, तब निर्वाणपद को प्राप्त होऊँगा, क्योंकि यह मेरी इच्छा वासनारूप है । वासना का त्याग हो तो निर्वाणपद प्राप्त हो । यह जो शुद्ध चित्तकला है, इसने धारणा का अभ्यास किया था, इससे इसमें अन्तवाहक शक्ति प्राप्त हुई है । अन्तवाहक शक्ति से यह आकाश में उपजी है और संसार से विरक्त हुई है । आकाशमार्ग में इसको तुम्हारी सृष्टि दिखी और परमपद पाने की इच्छा से इसको तुम्हारी संगति प्राप्त हुई-इससे तुम्हारी शरण आई है और तुमको ले आई है । जो श्रेष्ठ हैं वे बड़ों की शरण जाते हैं । यह अपने कल्याण के लिए तुमको ले आई है ।

५६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे मुनीश्वर ! यह मेरी मूर्तिरूप वासनाशक्ति है । पहले मैंने इसको उत्पन्न करके इस जगत्-जाल को रचा, पर अब मुझको निर्विकल्प निर्वाणपद की इच्छा हुई है, इससे मैंने इसका त्याग किया है । अब इसका भी वैराग्य उपजा है, उस कारण बोधरूप तुम्हारी शरण में आई हूँ । हे मुनीश्वर ! यह जगत् विलास संकल्प से हुआ है; वास्तव में कुछ हुआ नहीं; परमात्मतत्त्व ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है । मैं, तुम, मेरा, तेरा इत्यादिक शब्द समुद्र के तरङ्ग की नाईं हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर शब्द करते हैं और फिर लीन हो जाते हैं, वैसे ही हमारा तुम्हारा बोलना और मिलाप होना है । हे मुनीश्वर ! वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई लीन होता है जैसे तरङ्ग जलरूप है-भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है-भिन्न कुछ नहीं । इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सब वही हैं । हे मुनीश्वर ! मैं चिदाकाश हूँ और चिदाकाश में स्थित हूँ । यह ब्रह्मशक्ति है, जिसने जगत् रचा है । यह भी अजर और अमर है । न कभी उपजी है और न इसका नाश होगा । शुद्ध आत्मा किञ्चन द्वारा जगत् होकर भासित होता है जैसे सूर्य की किरणें जल होकर भासित होती हैं, परन्तु जल कुछ हुआ नहीं, वैसे ही सब आत्मा ही है; विश्व कुछ हुआ नहीं । हे मुनीश्वर ! जगत्जाल होकर आत्मा ही दिखता है, पर जगत् के उदय अस्त होने से आत्मा में कुछ क्षोभ नहीं होता; वह ज्यों का त्यों एकरस स्थित है । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और लीन होते हैं, परन्तु समुद्र ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही जगत् कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं लगता है । जैसे दृढ़ता से जल ओला हो जाता है, वैसे ही चिन्मात्र में चैतन्य में पिण्डाकार भासित होता है, परन्तु उपजा कुछ नहीं ।

हे मुनीश्वर ! यह जो शिला है, जिसमें हमारी सृष्टि है, सो केवल चिद्घनरूप है । तुम्हारी दृष्टि में यह शिला है और हम चैतन्य घन हैं । चैतन्य आकाश आत्मा ही शिला होकर भासित होती है । जैसे स्वप्न में सब सृष्टि जाग्रतरूप दिखती है वह बोधरूप है-बोध ही जगत् सा भासित होता है, वैसे ही यह जगत् और शिलारूप होकर

* निर्वाण प्रकरण *

५६६

बोध ही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! जैसे स्वप्न में ग्रह-चक्र फिरता दिखता है, वैसे ही सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, नदी, वरुण, कुबेर आदि जगत् जो भ्रम से दृष्टिगोचर होता है सो कुछ बना नहीं—चैतन्य का किञ्चन ही ऐसे भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में किञ्चन जलाभास होता है, वैसे ही जहाँ आत्मसत्ता है, वहाँ जगत् दिखता है, सब पदार्थ आत्मसत्ता से ही भासित होते हैं, ब्रह्मसत्ता सबमें अनुस्यूत है, इससे सब ओर सृष्टि बसती है। जैसे इस शिला में हमारी सृष्टि में जो कुछ पदार्थ दिखते हैं और इनमें सृष्टि बसती है, सो परिच्छिन्न दृष्टि से नहीं दिखती, पर जब अन्तर्वाहक दृष्टि से देखिये, तब प्रतीत होती है। घटों में, मठों में और पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश आदि स्थानों में सृष्टि है, पर बना कुछ नहीं। जैसे जहाँ समुद्र है वहाँ तरङ्ग भी होते हैं, परन्तु समुद्र से भिन्न तरङ्ग नहीं—वही रूप हैं, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं और न लीन होता है; ज्यों का त्यों आत्मसमुद्र अपने आप में स्थित है।

जगत् संकल्प से फुरता है, और संकल्प ही अहरूपी किञ्चनमात्र उदय हुआ। जैसे कमल से सुगन्ध लेकर तरियाँ निकलती हैं, वैसे ही मूल से देवी जगतरूपी सुगन्ध को लेकर उदय हुई है, परन्तु वास्तव जगत् कुछ बना नहीं, केवल संकल्प से बने की नाईं भासित होता है। हे मुनीश्वर ! वास्तव में न कोई संकल्प है और न प्रलय, ज्यों का त्यों ब्रह्म अपने स्वभाव में स्थित है। जैसे आकाश में आकाश और समुद्र में समुद्र स्थित है, वैसे ही ब्रह्म में ब्रह्म स्थित है। हे मुनीश्वर ! यह जगत् न सत्य है और न असत्य; आत्मा में न यह उदय हुआ और न अस्त होवेगा। जैसे आकाश में नीलता न सत्य है, न असत्य, वैसे ही ब्रह्म में जगत् न सत्य है और न असत्य। मैं उस ब्रह्म का किञ्चन ब्रह्मा हूँ, और यह जगत् मेरे संकल्प से उत्पन्न हुआ है। अब मैं संकल्प को निर्वाण करता हूँ। जब संकल्प निर्वाण होगा, तब जैसे कमल का नाश होने पर सुगन्ध का अभाव हो जाता है, वैसे ही जगत् का अभाव हो जायगा। मुझसे इच्छा फुरी थी, उस वासना में जगत् है। अब मैं इसका निर्वाण करता हूँ।

५७० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जब इच्छा निर्वाण होगी, तब जगत् का भी स्वाभाविक अभाव हो जायगा। तुम्हारा शरीर संकल्प से भासित होता है, इससे तुम अपनी सृष्टि में जाओ। ऐसा न हो कि तुम्हारा शरीर भी यहाँ निर्वाण हो जावे। हे राम! इस प्रकार वह मुझसे कहकर फिर देवी से बोले, हे देवि! अब तू निर्वाण हो और अपने आपमें बोध आदिक को भी लीन कर।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शुकान्तरवशिष्ठब्रह्मसंवाद- वर्णनन्नाम शताधिकसप्तशीतितमस्सर्गः ॥१७७॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर ब्रह्मा ने पद्मासन लगाया और सब जनों के साथ 'अकार', 'उकार', 'मकार' को छोड़कर अर्धमात्रा में स्थित हुए। तब उनकी मूर्ति ऐसी दिखने लगी, जैसे कागज पर मूर्ति लिखी होती है। उन्हें सम्पूर्ण जगत्जाल का ज्ञान भूल गया। देवी भी उसी प्रकार पद्मासन बाँधकर ब्रह्माजी के निश्चय में लीन हो जाने लगी। जब ब्रह्माजी निर्वेदनरूप ब्रह्म में लीन होने लगे उस समय जितने उपद्रव थे, सब उदय हुए। मनुष्य पाप करने लगे। स्त्रियाँ दुराचारिणी हो गईं। सब जीवों ने धर्म को त्याग दिया। कामी पुरुष बहुत हुए जो परनारियों के साथ भोग करते थे और पुरुष स्त्रियाँ किसी की शङ्का न करती थीं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष बढ़ गये और शास्त्र की मर्यादा त्यागकर लोग अनीश्वरवादी हुए। वर्षा बन्द हो गई और कुहरा पड़ने लगा। दुष्काल पड़ा। दुष्टजन धनपात्र होने लगे। धर्मात्मा आपदा भोगने लगे। चोर चोरी करने लगे। राजा मद्यपान करने लगे। जीवों को बड़े दुःख प्राप्त होने लगे, वे तीनों तापों से जलने लगे। राजाओं ने न्याय को त्याग दिया। निदान जो पाप आचार थे, वे उदय हुए और धर्म छिप गया। अज्ञानी राज्य करते; पण्डित ज्ञानी टहल करते, दुर्जनों की मानपूजा होती; सत् पण्डितों का निरादर होता; जीवों के समूह इकट्ठे हुए और पृथ्वी ने अपनी सत्ता को त्याग दिया क्योंकि पृथ्वी ब्रह्मा के संकल्प में थी। जब उन्होंने अपना संकल्प खींचा, तब वह निर्जीव हो गई और चेतनता निकल गई। जो स्थान मृतकों के विचरने के थे, वे खाईं की

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५७१

नाईं हो गये । भूत नष्ट हो गये और पृथ्वी भी नष्ट होने लगी । पर्वत काँपने लगे, भूचाल और हाहाकार शब्द होने लगे । जैसे शरत्काल में बेल सूख कर जर्जर हो जाती है, वैसे ही पृथ्वी जर्जर हुई, क्योंकि चेतनता रूप शरीरों का और सब जगत् का कारण ब्रह्मा है । ज्यों-ज्यों संकल्परूपी चेतनता क्षीण होती गई, त्यों-त्यों पृथ्वी जर्जर होती गई ।

जैसे किसी पुरुष का अर्धाङ्ग मारा जाता है, तब वह अङ्ग शव-सा हो जाता है और फुरना उसमें नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्मा की संकल्परूप चेतनता पृथ्वी से निकलती जाती थी, इस कारण पृथ्वी दुःखी हुई । धूल उड़ने लगी और नगर नष्ट होने लगे । इस प्रकार उपद्रव हुए, क्योंकि पृथ्वी के नाश का समय निकट आ गया था । समुद्र जो अपनी मर्यादा में स्थित थे, उन्होंने भी अपनी मर्यादा त्याग दी । जैसे कामी पुरुष मद्यपान कर अपनी मर्यादा को छोड़ देता है, वैसे ही समुद्र उछले, किनारे गिर गये और पर्वत कन्दरा से निकलकर पृथ्वी का नाश करने लगे । राजा और नगरवासी भागने लगे और उनके पीछे तीव्र वेग से जल चलने लगा; बड़े पर्वत गिरने लगे और चक्र की नाईं घूमने लगे । समुद्र की लहरों से पर्वत गिरते और उड़ते थे । लहरें उछलकर पाताल को गईं और पाताल का नाश होने लगा । बड़े रत्नों के पर्वत जब गिरे, तब रत्नों की ऐसी चमक हुई, जैसी तारामण्डल की होती है । इसी प्रकार बड़ा क्षोभ होने लगा और तरङ्ग उछलकर सूर्य-चन्द्रमा के मण्डल को जाने लगे । उनका प्रकाश जाता रहा । बड़वाग्नि प्रकट हुई, तब वरुण, कुबेर आदि देवताओं के वाहन डरे । जल के वेग से पर्वत नृत्य करने लगे—मानों पर्वतों के पंख लगे हैं । स्वर्ग के कल्पतरु समुद्र में गिर पड़े । चिन्तामणि, सिद्ध और गन्धर्व भी गिरने लगे । समुद्र इकट्ठे हो गये । जैसे गङ्गा, यमुना और सरस्वती एकत्र होती हैं, वैसे ही समुद्र भी मिलकर शब्द करने लगे । उनमें से ऐसे मच्छ निकले जिनकी पूँछों के लगने से पर्वत उड़ जावें । कन्दरा में जो हाथी थे, वे चिघारने लगे और सूर्य, चन्द्रमा तारागण क्षोभ को प्राप्त होकर समुद्र में गिरने लगे । हे राम ! इस प्रकार प्रलय के क्षोभ से जितने लोकपाल थे, वे

५७२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ

सब समुद्र के मुख में आ पड़े और मत्स्य उनको भक्षण कर गये । तरङ्ग आपस में टकराने लगे, जैसे मतवाले हाथी शब्द करते हैं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे शताधिकाष्टाशीतितमःसर्गः ॥ १८८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस विराटरूप ब्रह्मा ने, जिसकी देह सम्पूर्ण जगत् था, अपने श्वास को खींचा, तब नक्षत्र-चक्र को घुमाने-वाला वायु अपनी मर्यादा त्यागकर क्षोभ करने लगा, और वे चक्र नष्ट होने लगे; क्योंकि वे ब्रह्मा के संकल्प में थे । किसी की सामर्थ्य नहीं कि उनको रक्खे । तेजोमय देवता जो पवन के आधार थे, पवन के निकलने से निराधार होकर समुद्र में गिरने लगे और जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं, वैसे ही गिरने लगे । जैसे संकल्प का नाश होने पर संकल्प का वृक्ष गिरता है और जैसे पका फल समय पर वृक्ष से गिरता है, वैसे ही सब गिरने लगे । सुमेरु की कन्दरा गिरी । पवन का बड़ा क्षोभ और शब्द हुआ । जैसे पवन में तृण घूमता है, वैसे ही आकाश में पवन घूमने लगा । देवताओं का घर सुमेरु पर्वत भी गिर पड़ा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! संकल्परूप जो ब्रह्मा था, वह तो विराट् आत्मा है और सब जगत् उसकी देह है । अब बताइये, भूमण्डल, पाताल और स्वर्ग-लोक उसके कौन अङ्ग हैं और संकल्परूप कैसे अङ्ग होते हैं ? संकल्प तो आकाशरूप होता है और जगत् प्रत्यक्ष पिण्डाकार दिखता है ? जो जिसमें उपजता है, वह वैसा ही होता है, तो यह जगत् ब्रह्मा के अङ्ग कैसे है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस जगत् में पहले केवल चिन्मात्र था और उसमें जगत् न सत्य था, न असत्य; केवल आत्मसत्तामात्र अपने आपमें स्थित था, जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है और एक और दो शब्द से रहित है । तब केवल चिन्मात्र का किञ्चन अहं होकर स्थित हुआ है । उसका दृश्य से सम्बन्ध हुआ और उसके अनुभव ग्रहण से जो निश्चय हुआ, उसका नाम बुद्धि है । जब मनन हुआ, उसका नाम मन है । उस मन के फुरने से जगत् दृश्य हुआ है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो वेद्य है, वही ब्रह्मा कहलाता है । उसके फुरने पर फिर