योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 571, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५७१
नाईं हो गये । भूत नष्ट हो गये और पृथ्वी भी नष्ट होने लगी । पर्वत काँपने लगे, भूचाल और हाहाकार शब्द होने लगे । जैसे शरत्काल में बेल सूख कर जर्जर हो जाती है, वैसे ही पृथ्वी जर्जर हुई, क्योंकि चेतनता रूप शरीरों का और सब जगत् का कारण ब्रह्मा है । ज्यों-ज्यों संकल्परूपी चेतनता क्षीण होती गई, त्यों-त्यों पृथ्वी जर्जर होती गई ।
जैसे किसी पुरुष का अर्धाङ्ग मारा जाता है, तब वह अङ्ग शव-सा हो जाता है और फुरना उसमें नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्मा की संकल्परूप चेतनता पृथ्वी से निकलती जाती थी, इस कारण पृथ्वी दुःखी हुई । धूल उड़ने लगी और नगर नष्ट होने लगे । इस प्रकार उपद्रव हुए, क्योंकि पृथ्वी के नाश का समय निकट आ गया था । समुद्र जो अपनी मर्यादा में स्थित थे, उन्होंने भी अपनी मर्यादा त्याग दी । जैसे कामी पुरुष मद्यपान कर अपनी मर्यादा को छोड़ देता है, वैसे ही समुद्र उछले, किनारे गिर गये और पर्वत कन्दरा से निकलकर पृथ्वी का नाश करने लगे । राजा और नगरवासी भागने लगे और उनके पीछे तीव्र वेग से जल चलने लगा; बड़े पर्वत गिरने लगे और चक्र की नाईं घूमने लगे । समुद्र की लहरों से पर्वत गिरते और उड़ते थे । लहरें उछलकर पाताल को गईं और पाताल का नाश होने लगा । बड़े रत्नों के पर्वत जब गिरे, तब रत्नों की ऐसी चमक हुई, जैसी तारामण्डल की होती है । इसी प्रकार बड़ा क्षोभ होने लगा और तरङ्ग उछलकर सूर्य-चन्द्रमा के मण्डल को जाने लगे । उनका प्रकाश जाता रहा । बड़वाग्नि प्रकट हुई, तब वरुण, कुबेर आदि देवताओं के वाहन डरे । जल के वेग से पर्वत नृत्य करने लगे—मानों पर्वतों के पंख लगे हैं । स्वर्ग के कल्पतरु समुद्र में गिर पड़े । चिन्तामणि, सिद्ध और गन्धर्व भी गिरने लगे । समुद्र इकट्ठे हो गये । जैसे गङ्गा, यमुना और सरस्वती एकत्र होती हैं, वैसे ही समुद्र भी मिलकर शब्द करने लगे । उनमें से ऐसे मच्छ निकले जिनकी पूँछों के लगने से पर्वत उड़ जावें । कन्दरा में जो हाथी थे, वे चिघारने लगे और सूर्य, चन्द्रमा तारागण क्षोभ को प्राप्त होकर समुद्र में गिरने लगे । हे राम ! इस प्रकार प्रलय के क्षोभ से जितने लोकपाल थे, वे