भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 572

५७२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ

सब समुद्र के मुख में आ पड़े और मत्स्य उनको भक्षण कर गये । तरङ्ग आपस में टकराने लगे, जैसे मतवाले हाथी शब्द करते हैं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे शताधिकाष्टाशीतितमःसर्गः ॥ १८८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस विराटरूप ब्रह्मा ने, जिसकी देह सम्पूर्ण जगत् था, अपने श्वास को खींचा, तब नक्षत्र-चक्र को घुमाने-वाला वायु अपनी मर्यादा त्यागकर क्षोभ करने लगा, और वे चक्र नष्ट होने लगे; क्योंकि वे ब्रह्मा के संकल्प में थे । किसी की सामर्थ्य नहीं कि उनको रक्खे । तेजोमय देवता जो पवन के आधार थे, पवन के निकलने से निराधार होकर समुद्र में गिरने लगे और जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं, वैसे ही गिरने लगे । जैसे संकल्प का नाश होने पर संकल्प का वृक्ष गिरता है और जैसे पका फल समय पर वृक्ष से गिरता है, वैसे ही सब गिरने लगे । सुमेरु की कन्दरा गिरी । पवन का बड़ा क्षोभ और शब्द हुआ । जैसे पवन में तृण घूमता है, वैसे ही आकाश में पवन घूमने लगा । देवताओं का घर सुमेरु पर्वत भी गिर पड़ा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! संकल्परूप जो ब्रह्मा था, वह तो विराट् आत्मा है और सब जगत् उसकी देह है । अब बताइये, भूमण्डल, पाताल और स्वर्ग-लोक उसके कौन अङ्ग हैं और संकल्परूप कैसे अङ्ग होते हैं ? संकल्प तो आकाशरूप होता है और जगत् प्रत्यक्ष पिण्डाकार दिखता है ? जो जिसमें उपजता है, वह वैसा ही होता है, तो यह जगत् ब्रह्मा के अङ्ग कैसे है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस जगत् में पहले केवल चिन्मात्र था और उसमें जगत् न सत्य था, न असत्य; केवल आत्मसत्तामात्र अपने आपमें स्थित था, जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है और एक और दो शब्द से रहित है । तब केवल चिन्मात्र का किञ्चन अहं होकर स्थित हुआ है । उसका दृश्य से सम्बन्ध हुआ और उसके अनुभव ग्रहण से जो निश्चय हुआ, उसका नाम बुद्धि है । जब मनन हुआ, उसका नाम मन है । उस मन के फुरने से जगत् दृश्य हुआ है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो वेद्य है, वही ब्रह्मा कहलाता है । उसके फुरने पर फिर