योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
५७२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
सब समुद्र के मुख में आ पड़े और मत्स्य उनको भक्षण कर गये । तरङ्ग आपस में टकराने लगे, जैसे मतवाले हाथी शब्द करते हैं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे शताधिकाष्टाशीतितमःसर्गः ॥ १८८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस विराटरूप ब्रह्मा ने, जिसकी देह सम्पूर्ण जगत् था, अपने श्वास को खींचा, तब नक्षत्र-चक्र को घुमाने-वाला वायु अपनी मर्यादा त्यागकर क्षोभ करने लगा, और वे चक्र नष्ट होने लगे; क्योंकि वे ब्रह्मा के संकल्प में थे । किसी की सामर्थ्य नहीं कि उनको रक्खे । तेजोमय देवता जो पवन के आधार थे, पवन के निकलने से निराधार होकर समुद्र में गिरने लगे और जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं, वैसे ही गिरने लगे । जैसे संकल्प का नाश होने पर संकल्प का वृक्ष गिरता है और जैसे पका फल समय पर वृक्ष से गिरता है, वैसे ही सब गिरने लगे । सुमेरु की कन्दरा गिरी । पवन का बड़ा क्षोभ और शब्द हुआ । जैसे पवन में तृण घूमता है, वैसे ही आकाश में पवन घूमने लगा । देवताओं का घर सुमेरु पर्वत भी गिर पड़ा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! संकल्परूप जो ब्रह्मा था, वह तो विराट् आत्मा है और सब जगत् उसकी देह है । अब बताइये, भूमण्डल, पाताल और स्वर्ग-लोक उसके कौन अङ्ग हैं और संकल्परूप कैसे अङ्ग होते हैं ? संकल्प तो आकाशरूप होता है और जगत् प्रत्यक्ष पिण्डाकार दिखता है ? जो जिसमें उपजता है, वह वैसा ही होता है, तो यह जगत् ब्रह्मा के अङ्ग कैसे है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस जगत् में पहले केवल चिन्मात्र था और उसमें जगत् न सत्य था, न असत्य; केवल आत्मसत्तामात्र अपने आपमें स्थित था, जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है और एक और दो शब्द से रहित है । तब केवल चिन्मात्र का किञ्चन अहं होकर स्थित हुआ है । उसका दृश्य से सम्बन्ध हुआ और उसके अनुभव ग्रहण से जो निश्चय हुआ, उसका नाम बुद्धि है । जब मनन हुआ, उसका नाम मन है । उस मन के फुरने से जगत् दृश्य हुआ है । हे राम ! शुद्ध चिन्मात्र में जो वेद्य है, वही ब्रह्मा कहलाता है । उसके फुरने पर फिर
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ५७३
जगत् हुआ है। उस संकल्परूप जगत् का वह विराट् है, परन्तु आकाश-रूप है, और कुछ नहीं बना। यह जो आकारसहित जगत् दिखता है, सो भ्रम से। पर सब संकल्प आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में जगत् दिखता है सो सब आकाशरूप होता है, परन्तु निद्रादोष से पिण्डाकार भासित होता है और आत्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। हे राम ! अहं जो फुरा है, वह मिथ्या है, अज्ञान से दृढ़ स्थित हुआ है, और असम्यग्दर्शी को दृढ़ भासित होता है। सो केवल संकल्पमात्र है, और कुछ नहीं बना। इससे जितना जगत् भासता है, सो सब चिदाकाश है। एक और द्वैतकल्पना सब शब्दों से रहित आत्मत्वमात्र है। मैं और तुम शब्द कोई नहीं। यह जगत् उनका किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा का आभास जगत् है। संकल्प की दृढ़ता से यह दृश्य दिखता है, पर वास्तव में है नहीं। जैसे संकल्परूप गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर होते हैं, वैसे ही यह जगत् है।
हे राम ! जिस प्रकार मैंने जगत् का वर्णन किया है, उसे जो पुरुष मेरे कहे के अनुसार ज्यों का त्यों धारण करे तो उसकी वासना नष्ट हो जावे और पूर्ववत् आत्मा ज्यों का त्यों भासित हो। तब जैसे जगत् के आदि में आत्मत्वमात्र था, वैसे ही भासित होगा; क्योंकि और कुछ हुआ नहीं, केवल आत्मत्वमात्र ज्यों का त्यों स्थित है। जो आत्मा ही है तो समवायकारण और निमित्तकारण कैसे हों ? जगत् का उदय और नाश होना असत्य है, और अद्वैत और अनन्त कहना भी ठीक नहीं। जब सब शब्दों का अभाव होता है, तब परम चिदाकाश अनुभवसत्ता ही शेष रहती है। इसी का नाम मोक्ष है। हे राम ! मुझको तो अब भी संवित्सत्ता ही भासित होती है। मैं शुद्ध हूँ; सब कल्पना से रहित और चिदाकाश हूँ। मुझमें जो वशिष्ठ अहं फुरा है, वह फुरा नहीं, फुरे की नाईं लगता है और आत्मा का ही किञ्चन है; हुआ कुछ नहीं। इससे तुम भी इसी प्रकार जागकर निर्वासनिक हो जाओ और अपने प्रकृत आचार को करो अथवा न करो, जो इच्छा हो सो करो, परन्तु करने और न करने का संकल्प मत करो और परम मौन में स्थित हो रहो।
५७२ ❁ योगवासिष्ठ ❁
ज्ञानवान् को यही अनुभव होता है, इसमें तुम भी ऐसे ही समझो।
इति श्री० यो० निर्वाणप्रकरणे नवमशताधिकनवाशीतितमस्सर्गः॥ १८६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! बन्धनमोक्ष जगत्-बुद्धि न सत् है और न असत्। उदय भी नहीं हुआ और अस्त भी नहीं होता। केवल ज्यों का त्यों आत्मा स्थित है। ऐसे आपने मुझको उपदेश किया है। इसलिए मैंने जाना है कि आत्मा में जगत् न उपजता है और न मिटता है, पर तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को सुनता हुआ भी मैं तृप्त नहीं होता और अमृत की नाईं पान करता हूँ। जगत् सत्-असत् से रहित सन्मात्र है, उसको मैंने जाना है। अब यह कहिये कि संसार भ्रम कैसे उपजता है और उसका अनुभव कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ तुमको स्थावर-जङ्गम जगत् सब प्रकार देशकाल-संयुक्त दीखता है, उसके नाश का नाम महाप्रलय है। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र भी लीन हो जाते हैं। उसके पीछे जो शेष रहता है, वह स्वच्छ, अज, अनादि, केवल आत्मतत्त्वमात्र है—उसमें वाणी की गति नहीं। वह केवल अपने आपमें स्थित और परम सूक्ष्म है, जिसमें आकाश भी स्थूल है। जैसे सुमेरुपर्वत के आगे राई का दाना सूक्ष्म है, वैसे ही आकाश से भी आत्मा सूक्ष्म है और संवेदन से रहित चिन्मात्र है। उसमें अहं किञ्चन होकर फुरा है। आत्मा सदा निर्विकल्प और समुद्र-सदृश, देशकाल के भ्रम से रहित और केवल चैतन्यघन अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में अपने भाव को लेकर जीव स्थित होता है, वैसे ही आत्मा अपने भाव को लेकर चेतन किञ्चन होता है। उसी का नाम ब्रह्मा है, और वह भी चिद्रूप है। हे राम ! चित्अणु जो अपने भाव को लेकर उदय हुआ है, उसने चैत्यनाम दृश्य को देखा। इससे उसका अनुभव मिथ्या हुआ। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरण देखता है, सो वह अनुभव मिथ्या है; वैसे ही चित्अणु दृष्टि से दृश्य को देखता है। यह मिथ्यादृष्टि है। चित्अणु अपने स्वरूप को देखता है, सो केवल निराकाररूप है, परन्तु अहंरूप बीज दृढ़ होता है, उससे अपने आपसे निकल संकल्प से दृश्य को देखता है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
५७५
जैसे बीज से अंकुर निकलता है, वैसे ही संकल्प के फुरने से देश, काल, द्रव्य, द्रष्टा दर्शन और दृश्य होता है। वास्तव में हुआ कुछ नहीं। आत्मा सदा अपने स्वभाव में स्थित है, परन्तु संकल्प मे हुए की नाईं भासित होता है। जहाँ चित्अणु भासित हो, वह देश है। जिस समय भासित हो, वह काल है। जो भान हो, वह क्रिया हुई। भान का ग्रहण द्रव्य है और देखने को जो वृत्ति दौड़ती है, वह नेत्र होकर स्थित हुई है। जिसको देखते हैं, वह भी शून्य है और देखनेवाले भी शून्य हैं। सब असत् है-कुछ बना नहीं। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने में स्थित है। संकल्प द्वारा सब कुछ बनता जाता है। चित्अणु जो भासित हुआ, वह दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है। जब चित्अणु में स्वरूप की वृत्ति फुरती है, तब चक्षु इन्द्रिय स्थित होती है। जब सुनने की वृत्ति फुरती है, तब श्रोत इन्द्रिय स्थित होती है। जब स्पर्श की वृत्ति फुरती है, तब त्वक् इन्द्रिय स्थित होती है। जब सुगन्ध लेने की वृत्ति फुरती है, तब नामिका इन्द्रिय स्थित होती है। और जब रस लेने की इच्छा होती है, तब जिह्वा इन्द्रिय स्वाद लेती है। हे राम ! प्रथम यह चित्अणु नाम से रहित फुरा है। सम्पूर्ण जगत् भी तद्रूप ही था और अब भी वही केवल आकाशरूप है। संकल्प से अपने में पिण्डघन देखकर शरीर और इन्द्रियाँ देखीं, अनादि सत्स्वरूप चित्अणु इन्द्रियों के संयोग से पदार्थों को ग्रहण करता है। स्पन्दनरूप जो वृत्ति फुरी, उसी का नाम मन हुआ। जब निश्चयात्मक बुद्धि होकर स्थित हुई, तब चित्अणु में यह निश्चय हुआ कि मैं द्रष्टा हूँ-यही अहंकार हुआ। जब अहंकार से चित्अणु का संयोग हुआ, तब अपने में देशकाल का परिच्छेद देखा। आगे दृश्य और पूर्व उत्तरकाल देखा कि इस देश में बैठा हूँ और यह कर्म मैंने किया है-यह विषम अहंकार हुआ। निदान देश, काल, क्रिया, द्रव्य के अर्थ को भिन्न-भिन्न ग्रहण करता है और आकाश होकर आकाश को ग्रहण करता है।
हे राम ! आदि स्फुरण से चित्अणु में प्रथम अन्तवाहक शरीर हुआ। फिर संकल्प के दृढ़ अभ्यास से आधिभौतिक भासित होने लगा।
५७६ ❊ योगवासिष्ठ ❊
जैसे आकाश में और आकाश ही, वैसे ही यह आकाश अनहोते भ्रम से उदय हुए हैं और मरु की नाईं भासते हैं। जैसे मरुस्थल में भ्रम से नदी दिखती है, वैसे ही अविचार से संकल्प की दृढ़ता से पाञ्चभौतिक आकार भासित होते हैं। उनमें अहं प्रत्यय होने से जीव देखता है कि यह मेरा सिर है; ये मेरे चरण हैं; यह अमुक देश है इत्यादि। यह जीव शब्द-अर्थ और नाना प्रकार का जगत् और भाव-अभाव ग्रहण करता है और कहता है कि यह देश है, यह काल है, यह क्रिया है और यह पदार्थ है। हे राम! जब इस प्रकार जगत् के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब चित्त विषयों की ओर दौड़ता है और रागद्वेष को ग्रहण करता है। जो कुछ देहादिक भूत फुरने से भासते हैं, वे केवल संकल्पमात्र हैं और संकल्प की दृढ़ता से दृढ़ हुए हैं। हे राम! इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार कीट और पतंग भी उत्पन्न हुए हैं, परन्तु प्रमाद-अप्रमाद का भेद है। जो अप्रमादी हैं, वे सदा आनन्दरूप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। उनको यह जगत् और यह जगत् अपना ही रूप प्रतीत होता है। और जो प्रमादी हैं, वे तुच्छ और सदा दुःखी हैं, पर वास्तव में परमात्मतत्त्व से भिन्न कुछ हुआ नहीं। जैसे आकाश अपनी शून्यता में नित्य स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। सबका बीज, त्रिलोकीरूप बूँद का मेघ, कारण का कारण, काल में नीति और क्रिया में क्रिया वही है। आदि-विराट् पुरुष का शरीर भी नहीं और हम तुम भी नहीं-केवल चिदाकाश-रूप है। अब भी इनका शरीर आकाशरूप है और आत्मसत्ता भिन्न अवस्था को नहीं प्राप्त हुई-केवल आकाशरूप है। स्वप्न में युद्ध होते और मेघ गरजते इत्यादि शब्द-अर्थ भासित होते हैं, सो वे केवल आकाशरूप हैं, बना कुछ नहीं, परन्तु निद्रादोष से भासते हैं और मनुष्य जब जागता है, तब जानता है कि हुआ कुछ न था-आकाश रूप है, वैसे ही जो पुरुष अनादि अविद्या में जागा है, उसको जगत् आकाशरूप भासित होता है। हे राम! बहुत योजन पर्यन्त विराट् पुरुष का देह है, तो भी वह ब्रह्म आकाश के सूक्ष्म अणु में स्थित है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५७७
यह त्रिलोकी एक चितअणु में स्थित है और इसका विराट् पुरुष ऐसा है, जिसका आदि, अन्त और मध्य नहीं देख पड़ता, तौ भी एक चावल के समान भी नहीं है ।
हे रामचन्द्र ! यह जगत् और जगत् के भोग विस्तीर्ण दिखते हैं, पर जैसे स्वप्न के पर्वत जाग्रत् के एक अणु के समान नहीं, वैसे ही विचाररूपी तराजू से तोलिये तो परमार्थसत्ता में इनकी कुछ सत्यता नहीं देख पड़ती; परन्तु आत्मसत्ता से कुछ भिन्न नहीं हुआ, आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । इसी का नाम स्वायम्भुव मनु और विराट् है, और इसी को जगत् कहते हैं । जगत् और विराट् में कुछ भेद नहीं—वास्तव में आकाशरूप है । सनातन भी इसी को कहते हैं । रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, पवन, मेघ, पर्वत, जल आदि जितने भूत हैं, वे उसका शरीर हैं । हे राम ! इसका आदि शरीर जो चिन्मात्ररूप है, उसमें चेतनता से अपना अणु भी देह देखता है—जैसे तेज का कणका होता है । उस तेज-अणु से चेतनता—और क्रम से अपना बड़ा शरीर जगत्-रूप देखता है । जैसे स्वप्न में कोई पुरुष अपने को पर्वत देखे, वैसे ही वह अपने को विराट् रूप देखता है । जैसे पवन के दो रूप हैं—चलता है तो भी पवन है और नहीं चलता तो भी पवन है—वैसे ही जब चित्त फुरता है, तब भी ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है और जब चित्त नहीं फुरता, तब भी ज्यों की त्यों है । परन्तु जब स्पन्दन फुरता है, तब विराट् रूप होकर स्थित होता है, और जब चित्त नहीं फुरता, तब अद्वैतसत्ता भासित होती है और सदा अद्वैत ही विराट्स्वरूप है । हे राम ! इस दृष्टि से उसके सिर और पैर नहीं दिखते । जितनी ब्रह्माण्ड की पृथ्वी है, वह उसका मांस है । सब समुद्र उसका रुधिर है । नदी नाड़ी है । दशों दिशा वक्षःस्थल है । तारागण रोमावली हैं । सुमेरु आदिक अँगुलियाँ हैं । सूर्यादिक तेज पित्त हैं । चन्द्रमा कफ है । पवन प्राणवायु है । सम्पूर्ण जगत्जाल उसका शरीर है । ब्रह्मा हृदय है, सो आकाशरूप है, पर संकल्प से नानारूप भासित होता है, स्वरूप में कुछ बना नहीं । आकाश आदिक सब जगत् चिदाकाशरूप और अपने आप ही में स्थित है ।
इति श्री० नि० विरादात्मवर्णनन्नाम शताधिकनावेनामसर्गः॥ १४०॥
५७८ ✲ योगवाशिष्ठ ✲
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आदि विराट् ब्रह्मा है । उसका आदि-अन्त नहीं । यह जगत् उसका छोटा शरीर है । उसी चैतन्य वपु का किञ्चन ब्रह्मरूप हुआ है । उसके विस्तार का क्रम सुनो—उस ब्रह्मा ने जिसका वपु संकल्पमात्र है, अपने संकल्प से एक अण्ड रचा और उसको तोड़-फोड़ डाला । ऊर्ध्वभाग ऊपर गया और नीचे का भाग नीचे गया । पाताल ब्रह्मा का चरण हुआ । ऊर्ध्व सिर हुआ । मध्य आकाश उदर हुआ । दशों दिशा वक्षःस्थल, हाथ सुमेरु आदिक पर्वत, मांस पृथ्वी, समुद्र और सब नदियाँ नाड़ी, जल रुधिर, प्राण अपान वायु पवन, हिमालय पर्वत कफ, सब तेज पित्त, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र, तारागण स्थूल लार है । लार प्राण के बल से निकलती है—जैसे ताराचक्र को पवन फेरता है । ऊर्ध्व-लोक उसकी शिखा है । मनुष्य, पशु और पक्षी रोम हैं । सब भूतों की चेष्टा उसका व्यवहार है । पर्वत उसकी अस्थि, ब्रह्मलोक उसका मुख और सब जगत् उस विराट् का वपु है । रामजी बोले, हे भगवन् ! यह जो आपने संकल्परूप ब्रह्मा और जगत् उनका वपु कहा, इसे तो मानता हूँ; परन्तु यह जगत् जो उसी का शरीर हुआ; फिर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा कैसे बैठता है और अपने शरीर से भिन्न होकर कैसे स्थित होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? जो तुम ध्यान लगाकर बैठो और अपनी मूर्ति अपने हृदय में रच कर स्थित हो तो बन जाय । जैसे मनुष्य को स्वप्न आता है और उसमें जगत् भासित होता है सो सब अपना स्वरूप है । परन्तु अपनी मूर्ति रखकर और को देखता है । वैसे ही ब्रह्मा का एक शरीर ब्रह्मलोक में भी होता है । ब्रह्मा और जीव में इतना भेद है कि जीव भी अपनी स्वप्नसृष्टि का विराट् है, परन्तु उसको प्रमाद से नहीं भासित होती और ब्रह्मा सदा आत्मदर्शी है उसको सब जगत् अपना शरीर भासित होता है ।
हे राम ! देवता, सिद्ध, ऋषीश्वर और विद्याधर उस विराट् पुरुष की ग्रीवा में स्थित हैं । भूत, प्रेत, पिशाच सब उस विराट् पुरुष के मल से उपजे हैं और कीट की नाईं उदर में स्थित हैं । सब स्थावर-जङ्गम जगत् संकल्प से रचा हुआ विराट् में स्थित है—सब उसी के अङ्ग हैं ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७६
जो जगत् है तो विराट् भी है, और जगत् नहीं तो विराट् भी नहीं । जगत्, ब्रह्म और विराट् तीनों पर्याय हैं । इससे सम्पूर्ण जगत् विराट् का शरीर है । निराकार क्या और आकार क्या—सब भीतर बाहर विराट् का शरीर है । जैसे भीतर-बाहर आकाश में भेद नहीं, वैसे ही विराट् आत्मा में भेद नहीं । जैसे पवन के चलने और ठहरने में भेद नहीं वैसे ही विराट् और आत्मा में भेद नहीं है । जैसे चलना और ठहरना दोनों पवन के रूप हैं, वैसे ही साकार-निराकार सब विराट् का शरीर है । हे राम ! इस प्रकार जगत् हुआ है, सो कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं भानित होता है । जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं है, और हुए की नाईं लगता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता में जगत् उपजे की नाईं जान पड़ता है । पर उपजा कुछ नहीं—केवल अपने आपमें स्थित है । वह शिला की नाईं स्थित है, अर्थात तुम्हारा संकल्प-विकल्प और चैतन्यरूप चैत्य से रहित चिन्मात्रस्वरूप है—इससे कलना को त्याग-कर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।
इति श्री० नि० विराटशरीरवर्णनंनामशताधिकैकनवतितमस्सर्गः ॥ १६१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम प्रलय का प्रसंग फिर सुनो । मैं ब्रह्म-पुरी में ब्रह्मा के पास बैठा था । जब मैंने नेत्र खोलकर देखा कि मध्याह्न का समय है और दूसरा सूर्य पश्चिम दिशा में उदय हुआ है, उसका बड़ा प्रकाश है—मानो सम्पूर्ण तेज इकट्ठा हुआ है या बड़वाग्नि की नाईं प्रकाश हुआ है और बिजली की नाईं स्थित हुआ है उसको देखकर मैं विस्मित हुआ । देख ही रहा था कि एक ओर सूर्य उदय हुआ । फिर उत्तर दिशा की ओर और सूर्य उदय हुआ । इसी प्रकार प्रथम के अलावा दस सूर्य आकाश में और प्रकट हुए । बड़वाग्नि समुद्र से प्रकट हुई । उसमें एक सूर्य निकला । सब द्वादश सूर्य इकट्ठे होकर विश्व को तपाने लगे । हे राम ! प्रलय के तीन नेत्र उदय हुए—एक नेत्र सूर्य, दूसरा नेत्र बड़वाग्नि और तीसरा नेत्र बिजली । वे तीनों विश्व को जलाने लगे । दिशा सब लाल हो गईं । अटट्-अटट् शब्द होने लगे । नगर, बन, कन्दरा, पृथ्वी जलने लगीं । देवताओं
५८० ✵ योगवाशिष्ट ✵
के स्थान जल जलकर गिरने लगे। पर्वत जलकर श्याम हो गये। ज्वाला के कण निकलकर पाताल को गये। वह भी जल गया। समुद्र जलकर सूख गये और हिमालय पर्वत के बर्फ का जल होकर जलने लगा—जैसे दुर्जनों से संगकर साधु का हृदय तृप्त होता है। जब इसी प्रकार बड़ी अग्नि प्रज्वलित हुई, तब मुझको भी तपन आने लगी और मैं वहाँ से दौड़कर नीचे जाकर स्थित हुआ। वहाँ मैंने देखा कि अस्ता- चल पर्वत जलता हुआ उदयाचल पर्वत के पास आ पड़ा। मन्दराचल और सुमेरु पर्वत जलकर गिरने लगे और अग्नि की ज्वाला ऊँचे उठकर भड़भड़ शब्द करने लगी।
हे राम ! इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व जलने लगा। बड़ा क्षोभ हुआ और जहाँ कुछ रस था सो सब सूख गया। हे राम ! जिसको अज्ञानी रस कहते हैं, वह सब विरस है। परन्तु अपने-अपने काल में सब रस- संयुक्त दिखते हैं। उस समय में मुझको सब ऐसे लगे, जैसे जली हुई बेल होती है। हे राम ! इस प्रकार मैंने सब विश्व जलता देखा, परन्तु ज्ञान से जिसका अज्ञान नष्ट हुआ था, वह सुखी दिखता था और सब अग्नि में जलते देख पड़ते थे और बड़े भयानक शब्द होते थे। शिव का जो कैलास पर्वत है, उसके निकट जब अग्नि आई, तब सदाशिव ने अपने नेत्र से अग्नि प्रकट की, जिससे बड़ा क्षोभ हुआ और ब्रह्माण्ड जलने लगा। तब महापवन चला जिससे बड़े पर्वत उड़ने लगे—जैसे तृण उड़ते हैं। जो स्थान जले थे, उनकी आँधी होकर वृक्षों के स्थान भी उड़ने लगे। निदान बड़ा क्षोभ प्रकट हुआ और इन्द्रियादिक देवता अपने स्थान को त्यागकर ब्रह्मलोक में चले गये। बड़े मेघ, जो जल से पूर्ण थे, सूखकर जलने लगे। कल्परूपी पुतली नृत्य करने लगी। जले स्थानों में जो धुआँ निकलता था, वह उसके केश थे और प्रलय का शब्द उसका बोलना था। बड़ा पवन चलने लगा, पर्वत जलकर उड़ने लगे और सुमेरु आदिक पर्वत तृणों की नाईं उड़ते थे। निदान जीवों को बड़ा कष्ट हुआ, जो कहा नहीं जाता।
इति० नि० जगद्ब्रह्मप्रलयवर्णनन्नामशताधिकद्विनवतितमस्सर्गः ॥ १६२ ॥
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८१
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अग्नि से सब स्थान जल गये, तब उसके उपरान्त पुष्कल मेघ गर्जकर वर्षने लगे । प्रथम मूसल सी, फिर खंभा सी धारा वर्षी । फिर नदी की नाईं और फिर महानद् की नाईं मेघ बरसने लगे, जिनका गङ्गा यमुना नदी लहरें थीं । उनमे सब स्थान शीतल हो गये—जैसे तीनों तापों से जला हुआ अज्ञानी सन्तों के संग से शीतल होता है । हे राम ! फिर ऐसा जल बढ़ा, जिससे सुमेरु आदि पर्वत नृत्य करने लगे । जैसे समुद्र में झाग होते हैं, वैसे ही हो गये, अथवा ऐसे जान पड़ते थे, जैसे जलचर होते हैं । हे राम ! ऐसा जल बढ़ा कि कहा नहीं जाता । बड़े-बड़े स्थान और देवता, सिद्ध, गन्धर्व बहे जाते थे । जिनको अज्ञानी परमार्थ जानकर सेवन करते हैं, वे भी बहते देख पड़े । जैसे कोई पुरुष कष्टक के अन्धे कूप में गिरके दुःख पावे, वैसे ही वे दीखे, पर मुझको सब ब्रह्म ही देख पड़ता था । पर जब संकल्प की ओर देखता, तब महाप्रलय दीखता और मेघ गर्जते घटा होकर दिखाई देते थे । निदान ब्रह्मलोक तक जल चढ़ गया और मैं देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजलमयवर्णनं नाम शताधिकत्रिनवतितमसर्गः ॥ १६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस ब्रह्मा का जगत् जलमय हो गया और मुझे जल से भिन्न कुछ न देख पड़ा, सब शून्य ही देख पड़ा । ऊपर, नीचे और मध्य दिशा भी न दिखती थी । न कोई तत्त्व, न कोई पर्वत, न कोई देवता, न पशु और न पक्षी देख पड़ते थे । तब मैंने ब्रह्मपुरी को देखा कि इसकी क्या दशा है । फिर जैसे प्रातःकाल का सूर्य अपनी ज्योति को फैलाता है, वैसे ही मैंने ब्रह्मपुरी को दृष्टि फैलाकर देखा । तब ब्रह्माजी मुझको परम समाधि में देख पड़े, और भी जो जीवन्मुक्त ब्रह्मा के सभासद थे, वे भी सब पद्मासन से परमसमाधि लगाये बैठे थे । जैसे पत्थर की मूर्ति हो, वैसे ही सब परमसमाधि में अचल स्थित थे । उनमें संवेदन का फुरना नहीं था । चारों वेद मूर्ति धारण किये और बृहस्पति, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम, चन्द्रमा, अग्नि, देवता इत्यादि ऋषीश्वर मुनीश्वर
५८२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
आदि सब जीवन्मुक्तों को मैंने ध्यान में स्थित देखा। द्वादश सूर्य भी जो विश्व को तपाते थे, वे पद्मासन लगाकर समाधि में स्थित थे। एक मुहूर्त तक मैंने इसी प्रकार देखा। जब एक मुहूर्त बीता, तब सूर्य के सिवा सब अन्तर्धान हो गये। जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने में विद्यमान होती है और जागने से उसकी अभावना हो जाती है, वैसे ही मेरे देखते-देखते ब्रह्मपुरी शून्य वन की नाईं उजाड़ हो गई। जैसे राजपातन में मार्गप्रलय हो जाते हैं, वैसे प्रलय हो गया।
हे राम ! जैसे स्वप्न में मेघ गर्जते दिखते हैं, और यह दृष्टान्त तो बालक भी जानते हैं कि प्रत्यक्ष अनुभव को छिपाते हैं, वे मूर्ख हैं। मैं अनुभव से भी जानता हूँ, स्मृति भी होती है और सुना भी है कि जब तक निद्रा है, तब तक स्वप्न की सृष्टि दिखती है और जागने पर उसका अभाव होता है, वैसे ही जब तक ब्रह्मा की वासना थी, तब तक सृष्टि थी, जब वासना क्षय हुई, तब सृष्टि कहाँ रही ? जब वासना नष्ट होती है, तब आन्तर्वाहक आधिभौतिक शरीर नहीं रहते। हे राम ! जब शुद्धमात्र पद में चित्तशक्ति स्फूरती है, तब पिण्डाकार होकर भासित होती है। और जबतक वह शरीर है, तबतक संसार उपजता है और नष्ट भी होता है। वैसे ही ब्रह्मा की सुषुप्ति में जगत् लीन हो जाता है और जाग्रत में उत्पन्न होता है; क्योंकि ब्रह्मा के शरीर का सुषुप्ति में लीन होना ही प्रलय है। यदि कहिये कि इस शरीर के नाश का नाम महाप्रलय हो तो ऐसा नहीं है; क्योंकि मृतक हुए शरीर का नाश होता है और फिर लोक भासित होता है। और जो कहिये कि जैसे वह परलोक भ्रममात्र है, वैसे ही यह भी भ्रान्तिमात्र है, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुति, स्मृति और पुराण सब कहते हैं कि महाप्रलय में कुछ नहीं रहता, केवल आत्मसत्ता ही रहती है। और जो कहिये कि परलोक भ्रान्तिमात्र है, इसका नाश होना क्या है तो श्रुति और शास्त्र का कहना व्यर्थ होता है और जो उनका कहना व्यर्थ हो तो उनके कहने से ब्रह्माकार वृत्ति किसी की उत्पन्न न हो। जो तुम कहो कि जैसे अङ्गवाला अङ्ग को सिकोड़ लेता है, वैसे ही स्थूल भूत
- निर्वाण प्रकरण * ५८३
सिमट कर अपने सूक्ष्मकारण में जाकर लीन होते हैं, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सूक्ष्मभूत के रहने महाप्रलय नहीं होता । और जो तुम कहो कि संवेदन जो अज्ञान है, जिसमें अहं फुरता है, उसका नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि मूर्च्छा में जीव को अज्ञान होता है, परंतु फिर सृष्टि भासित होती है और मृत्यु होती है । सो मृत्यु वही मूर्च्छा है । पर उसमें भी फिर पाञ्च-भौतिक शरीर भासित होता है और आगे जगत् भासित होता है । इसमें इसका नाम भी महाप्रलय नहीं । जो तुम कहो कि जबतक यह पाञ्च-भौतिक शरीर है, तबतक जगत् है और इसका अभाव होने पर महाप्रलय होता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जब शरीर को जीव छोड़ता है और उसकी क्रिया नहीं होती तो वह पिशाच होता है ।
इस शरीर का जब नीरूप होना है और मनुष्य शव हो जाता है, तब क्षत्रिय-ब्राह्मण की संज्ञा नहीं रहती । इससे तुम देखो कि केवल देह का नाश भी महाप्रलय नहीं है और प्रमाद से विपर्यय का नाम भी महाप्रलय नहीं है । महाप्रलय उसको कहते हैं, जिसमें सबका अभाव हो जाय । और सबका अभाव तब होता है, जब वासना का क्षय हो जाता है । इसलिए वासना के क्षय को ज्ञानी लोग निर्वाण कहते हैं । जैसे जबतक निद्रा है, तब तक स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत में स्वप्न के जगत् का अभाव हो जाता है, वैसे ही जबतक वासना है, तबतक जगत् है, जब वासना का क्षय होता है, तब जगत् का अभाव होता है । हे राम ! वासना भी फुरती नहीं, आभासमात्र है । जो तुम कहो कि आमता क्यों है ? तो जो कुछ भासित होता है, वह सर्व अपने भाव में आप स्थित है । हे राम ! उत्थान होने का नाम बन्धन है और उत्थान के मिटने का नाम मोक्ष है । हे राम ! नेत्र के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, पर मुक्त होने में कुछ यत्न नहीं । जो वृत्ति बहिर्मुख हुई तो बन्धन हुआ और वृत्ति अन्तर्मुख हुई तो मुक्त हुआ । इसमें क्या यत्न है । इसलिए सुषुप्त की नाईं निर्वासनिक हो जाओ । जब अहंसंवेदन फुरता है, तब मिथ्या जगत् सत्य सा भासित होता है । आगे तुम्हारी जो
५८४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
इच्छा हो सो करेंगे। पर जब अहं उत्थान से रहित होंगे, तब निर्वाण- पद को प्राप्त होंगे। जहाँ एक और दो की कोई कल्पना नहीं, उस परमशान्त निर्विकल्प पद को प्राप्त होंगे। इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥६४॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निदान वे ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये— जैसे तेल बिना दीपक बुझ जाता है। ब्रह्माजी जब ब्रह्मपद में निर्वाण हुए और द्वादश सूर्य फिर ब्रह्मपुरी को जलाने लगे और सम्पूर्ण ब्रह्म- पुरी जल गई, तब वे सूर्य भी ब्रह्मा की नाईं पद्मासन लगाकर स्थित हुए। जैसे तेल बिना दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही वे सूर्य भी निर्वाण को प्राप्त हो गये। हे राम ! जब द्वादश सूर्य निर्वाण हो गये, तब समुद्र उमड़े और उन्होंने ब्रह्मपुरी को ढक लिया। जैसे रात्रि में अन्धकार नगर को ढक लेता है, वैसे ही ब्रह्मपुरी को उन्होंने आच्छा- दित किया। बड़े तरङ्ग उछले और पुष्करमेघ भी तरङ्गों से छेदे गये और जलरूप हो गये। हे राम ! तब एक पुरुष आकाश से निकला मुझको देख पड़ा, जो महाभयानक श्यामवर्ण उग्र आकार था। उसने सबको ढक लिया। वह कृष्णमूर्ति ऐसा था, मानों कल्पपर्यन्त की रात इकट्ठा होकर उसके रूप में स्थित हुई हो। उसके मुख से ज्वाला निक- लती थी। उसके शरीर में बड़ा प्रकाश या मानों कोटि सूर्य हों, या बिजली का प्रकाश इकट्ठा हुआ हो। उसके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं और तीन नेत्र थे—मानों तीनों सूर्य चमक रहे थे। उसके हाथ में त्रिशूल था और आकाश की नाईं उसकी मूर्ति थी।
जैसे क्षीरसमुद्र के मथने को भुजा बड़ी करके विष्णु ने शरीर धारण किया था और क्षीरसमुद्र को क्षुब्ध किया था, वैसे ही नासिका की साँस से वह समुद्र को क्षुब्ध कर रहा था। जैसे आकाश का बड़ा आकार है, वैसा ही स्वरूप उसने धारण किया—मानों प्रलयकाल के समुद्र मूर्ति धर के स्थित हुए हों, अथवा मानों सब अहंकार की समष्टि वह था, अथवा महाप्रलय की बड़वाग्नि की मूर्ति स्थित था, या प्रलयकाल के मेघ मूर्ति धरके स्थित हुए थे। हे राम ! मैंने जाना
✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ५८५
कि यह महारुद्र है, क्योंकि इनके हाथ में त्रिशूल है, तीन नेत्र और पाँच मुख हैं। यह जानकर मैंने उन्हें प्रणाम किया। राम ने पूछा, हे भगवन्! उनका भयानक रूप क्या था और रुद्र किसको कहते हैं? उनका बड़ा आकार, दस भुजा, पञ्च मुख और तीन नेत्र क्या थे और हाथ में त्रिशूल क्या था? क्या वह किसी के भेजे आये थे? उन्होंने क्या किया और कहाँ गये? वह अकेले थे अथवा उनके साथ कोई और था? वह श्याम-वर्ण क्यों थे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! विषम विष परिच्छिन्न जो अहंकार है, वह त्यागने योग्य है, और समष्टि अहंकार सेवन करने के योग्य है। सब आत्मा प्रतीति का नाम समष्टि अहंकार है। उसी का नाम रुद्र है। कृष्णवर्ण इसलिए था कि वह आकाशरूप है। जैसे आकाश में नीलापन है, वैसे ही उसमें कृष्णता थी सब जीव जो अपने अहंकार को त्यागकर निर्वाण हुए, उनकी समष्टि होकर रुद्ररूप प्रकट हुई, इसी से वह उग्र था। पञ्चमुख ज्ञान इन्द्रियों की समष्टि थी और दस भुजा कर्म इन्द्रियों की समष्टि थी। राजस, तामस और सात्त्विक तीन गुण तीनों नेत्र थे अथवा भूत, भविष्यत्, वर्तमान, या ऋग्, यजुः, साम ये तीनों वेद नेत्र थे। अथवा मन, बुद्धि और चित्त तीनों नेत्र थे। ॐकार की तीन मात्रा उनके नेत्र और आकाश वपु था। त्रिलोकी-रूपी हाथ में त्रिशूल था। चित्संवित् से वह फुरा था, इसमें उसी का भेजा आया था और फिर उसी में लीन होगा। वह केवल आकाश-रूप था। जो कुछ उसने किया, वह भी सुनो। हे राम! ऐसा वह रुद्र था मानों आकाश को पंख लगे हों। उसने अपने नेत्र प्राणों को मींचा तो सब जल उसके मुख में प्रवेश करने लगे। जैसे नदी समुद्र में प्रवेश करती है, वैसे ही सब जल रुद्र में लीन हुए। जैसे बड़वाग्नि समुद्र को पी लेती है, वैसे ही उस रुद्र ने एक मुहूर्त में सब जल पान कर लिया। कहीं जल का अंश भी न देखने को रह गया। जैसे अन्धकार को सूर्य सोख लेता है या जैसे अज्ञानी का अज्ञान सन्त के संग से नष्ट हो जाता है, वैसे ही उसने जल को पान कर लिया। तब केवल शुद्ध आकाश हो गया। न कहीं पृथ्वी दिखती; न अग्नि, न वायु, कोई तत्त्व
५८६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
कहीं न दिखता---एक आकाश ही दिखता जैसा उज्ज्वल मोती होता है वैसा ही उज्ज्वल आकाश दिखता था, और चारों तत्त्व न दिखता था। एक तो अधोभाग दिखता; दूसरे मध्य भाग आकाश, सो रुद्र ही दिखता; तीसरे ऊर्ध्वभाग देख पड़ता और चौथे चिदाकाश देख पड़ता जो सर्वात्मा है। और कुछ न देख पड़ता। हे राम! वह रुद्र भी आकाश-रूप था और उसका कोई आकार न था। केवल भ्रन्ति में आकार भासित होता था। जैसे भ्रम में आकाश में नीलापन और तरुवर और स्वप्न में भ्रम में आकार भासते हैं, वैसे ही रुद्र का आकार देख पड़ा; पर आत्मा आकाश से भिन्न न था। जैसे भ्रम में चिदाकाश में शून्याकाश भासता है, वैसे ही रुद्र का शरीर भासित हुआ। वह रुद्र सर्वात्मा था और आकाश होकर जो भासित हुआ, वह किञ्चन था। हे राम! आकाश में रुद्र निराधार दिखता था। जैसे मेघ निराधार होते हैं, वैसे ही वह निराधार दिखता था। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! इस ब्रह्माण्ड के ऊपर और उसके ऊपर क्या है, सो कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो ब्रह्माण्ड का आकाश है, उस पर दस गुना जल है। जल के ऊपर दस गुना अग्नि है। उसके ऊपर दसगुना वायु है। उसके ऊपर दसगुना आकाश है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! ये तत्त्व जो तुमने वर्णन किये, सो किसके ऊपर हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये तत्त्व पृथ्वी के ऊपर स्थित हैं। जैसे माता की गोद में बालक आ बैठता है, वैसे ही ये तत्त्व पृथ्वी पर हैं और पृथ्वी भागों के आश्रय में है। राम ने पूछा, हे भगवन्! पृथ्वी आदि तत्त्वों सहित निराधार ब्रह्माण्ड किसके आश्रय से स्थित हुआ है। उनका चलना और ठहरना कैसे होता है और वे नष्ट कैसे होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमही कहो कि आकाश में मेघ किसके आश्रय होते हैं? सूर्य और चन्द्रमा किसके आश्रय होते हैं? जैसे ये संकल्प के आश्रित हैं, वैसे ही ब्रह्माण्ड भी संकल्प के आश्रित है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प ही के आश्रित है और संकल्प आत्मा के आश्रित है, वैसे ही यह जगत और तत्त्व भी आत्मसत्ता के
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आश्रित स्थित है। इनका ठहरना और गिरना भी आत्मा के आश्रित है। जैसे आदि चित्त का स्पन्दन होकर नीति हुई है, वैसे ही है। इस प्रकार इसका गिरना है, इस प्रकार ठहरना है, इस प्रकार इसका नाश होना और इस प्रकार रहना है। वास्तव में परम स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं—केवल भ्रममात्र है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है और चित्संवित् ही जगत् के आकार से भासित होता है। जैसे आकाश में नीलिमा प्रतीत होती है, वैसे ही आत्मा में जगत् की प्रतीत है और जैसे तलवार में श्यामता झलकती है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में मोती दिखते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है और मिथ्या जगतों की संख्या कीजिये तो नहीं गिने जा सकते। जैसे सूर्य की किरणों का आभास और रेत के कणों की संख्या नहीं होती, वैसे ही जगतों की संख्या नहीं होती। पर वास्तव में कुछ बना नहीं—सब अजातजात है। जैसे स्वप्न में अनहोती सृष्टि भासती है, वैसे ही यह जगत् भासता है, इससे दृश्य को मिथ्या जानकर जगत् की वासना त्यागो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादनं नाम शताधिकपञ्चनवतितमस्सर्गः ॥ १६५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! उस रुद्र का तो मैंने बड़ा भयानक रूप देखा था। उसके नेत्र बड़े तेज से पूर्ण थे—चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि ये तीनों उसके नेत्र थे और वह महाभयानक था—मानों प्रलय के समुद्र साक्षात् स्थित हैं। रुण्डों की माला उसके कण्ठ में थी और उसकी परछाहीं बड़ी और श्याम पड़ती थी। उसको देखकर मैं आश्चर्यचकित हुआ कि यहाँ सूर्य और अग्नि भी नहीं और किसी का प्रकाश भी नहीं है, तब यह परछाहीं किस प्रकार है और क्या है? ऐसे में देखता ही था कि वह परछाहीं नृत्य करने लगी। उससे एक स्त्री निकली, जिसका शरीर दुर्बल आकार बड़ा ऊँचा और वर्ण कृष्ण था—मानों साक्षात् अँधेरी रात्रि है। उसके तीन नेत्र, बड़ी भुजा ऊँची ग्रीवा
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थी—मानो प्रलयकाल के मेघ मूर्ति धारण कर स्थित हुए हैं। उसके गले में रुद्राक्ष और रुण्डों की माला पड़ी हुई थी। वह विकराल स्वभाव की नारी हाथों में त्रिशूल, खड्ग, बाण, ध्वजा, ऊखल मूसल आदिक आयुध लिये थी। ऐसा भयानक आकार देखकर मैंने विचार किया कि यह काली भवानी है। उसको मैंने नमस्कार किया। जैसे अग्नि के जले हुए पर्वत के शिखर श्याम होते हैं, वैसे ही वह श्यामवर्ण थी। उसके मस्तक में तीसरा नेत्र बड़वाग्नि की नाईं तेज से युक्त निकला था। कभी उसकी दो भुजा दिखती, कभी सहस्रभुजा दिखती, कभी अनन्त भुजा हो जातीं, कभी एक ही भुजा दीखती और कभी कोई भुजा न देख पड़ती। कभी सिर पैर कोई न रहता, केवल एक बुत सी लगती और नृत्य करती थी।
ज्यों-ज्यों वह नृत्य करती, त्यों-त्यों उसका शरीर स्थूल देख पड़ता, मानों आकाश को भी ढक लिया है, और दसों दिशाओं ने आकाश को पूर्ण किये हैं। नख-शिख की सीमा कुछ न दिखती, ऐसा आकार बढ़ाया। जब वह भुजा को हिलाती, तब मानों आकाश को मापती थी। पाताल तक उसके चरण आकाश पर्यन्त सीस, पृथ्वी उसका उदर, सुमेरु आदि पर्वत नाभिस्थान और दशों दिशा भुजा थीं, मानों प्रलय काल की मूर्ति रचकर स्थित हुई है। बड़े पर्वत की कन्दरा सदृश उसकी नासिका थी। लोकालोक पर्वत हाड़ थे और कण्ठ में नदियों की माला थी, जो हिलती थीं। वरुण, कुबेर आदि देवताओं के सिर की माला उसके कण्ठ में थी। पवन नासिका के मार्ग से निकलता था, जिसमे सुमेरु आदि पर्वत तृणों की नाईं उड़े जाते थे। ब्रह्माण्ड की माला उसके गले में थी। हाथों में ब्रह्माण्डरूपी भूषण थे और कटि में ब्रह्माण्ड के घुँघरू और करधनी थी। जब वह नृत्य करती, तब सब ब्रह्माण्ड नृत्य करने लगता था। जैसे पवन से पत्ते नाचते हैं, वैसे ही सुमेरु आदि नृत्य करते थे। उसके एक-एक रोम में ब्रह्माण्ड थे। जैसे नागगण वायु के अधीन हैं। उसके कानों में धर्म-अधर्मरूपी मुद्रायें थीं। बड़े-बड़े कान और बड़ा मुख था, मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भक्षण कर लेगी।
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५८६
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष स्तन थे। उन स्तनों में चारों वेदों और शास्त्रों के अर्थरूपी दूध निकलता था। निदान जगत् की सब मर्यादा मुझको उसमें दिखाई दी। उसके नृत्य करने से ब्रह्माण्ड और अस्ताचल आदि पर्वत तृणों की नाईं नृत्य करते थे और सब कुछ उलटपलट होता दिखता था। उसके शरीर में नीचे आकाश ऊपर पृथ्वी थी। तारामण्डल सिद्ध, देवता, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नर, दैत्य, स्थावर, जङ्गम सब उस शरीर में दृष्टिगोचर होता था—मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों का आदर्श हो। भुजाओं के उछलने से चन्द्रमा की नाईं नखों का प्रकाश होता था। मन्दराचल, उदयाचल पर्वत कानों के भूषण से और हिमालय पर्वत बरफ के कण के समान दिखता था।
हे राम ! इस प्रकार उस देवी के शरीर में मुझको अनन्त सृष्टि दीखी। कहीं इकट्ठी और कहीं भिन्न-भिन्न, कहीं एक ही सी चेष्टा करे और कहीं भिन्न-भिन्न चेष्टा करे। मानों ब्रह्माण्डरूपी रत्नों का डब्बा है। हे राम ! जब मैं संकल्प-सहित देखता, तब मुझको सृष्टि दृष्टिगत होती और जब आत्मा की ओर देखता, तब केवल आत्मरूप ही दिखता और कुछ न दिखता। संकल्पदृष्टि से सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता देख पड़ता, पर ऐसी सामर्थ्य किसी की न दिखती कि नृत्य न करे। जगत् की उत्पत्ति, स्थित और प्रलय सब उसी में दिखते और सम्पूर्ण क्रिया उसी से होती दिखतीं। उसी में सिद्ध, देवता, गन्धर्व, अप्सरा विमान पर आरूढ़ फिरते और नक्षत्रों के चक्र फिरते—मानों ब्रह्माण्ड फिर उदय हुए हैं। जब मैं फिर आत्मदृष्टि से देखता, तब ब्रह्मस्वरूप भासता और संकल्पदृष्टि से जगत् भासित होता। वह चित्तकला, जो संकल्परूप है उसमें सभी दिखते। हे राम ! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब उसी में दृष्टिगत होते थे। जैसे मच्छर वायु से उड़ते हैं, वैसे ही अनन्त सृष्टि उसके शरीर में उड़ती दृष्टिगत होती। इससे मुझे महान् आश्चर्य हुआ। वह भैरव था और यह भैरवी उसकी शक्ति थी। दोनों मुझको विशालकाय देख पड़े। यह नित्य शक्ति सर्वात्मा थी और परमात्मा की क्रियाशक्ति सब विश्व को अपने
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आपमें जानती थी। जैसे समुद्र सब तरङ्गों को अपने में अपना रूप जानता है, वैसे ही सब ब्रह्माण्ड को वह अपने में अपना रूप जानती थी। वह तो सदाशिव से भी बड़े अहंकार को धारण किये थी, मानों सब ब्रह्माण्ड की माला कण्ठ में डाले है और यमादिक सब उसकी मर्यादा हैं।
हे राम! इस प्रकार मैंने रुद्र और काली भवानी को देखा। रुद्र के शिर पर जो जटा थी, वे मोर की पंख की नाईं थीं। काली को मैंने देखा कि नाना प्रकार के मृग उसके साथ हैं और वह डम-डम शब्द करती है। यह शब्द भी वह करती थी—"दिग्गंदिग्गं तुदिग्गं पंचमना वह संमंप्रलये नियतुयत्रिषंत्रो चीत्त्वं त्रीपलपलुमं पनुपं सुमंप मषमभिश्रु ही गुंहीगुंही उगुभियगुं दलुमददारी मीदातंदर्ता।" हे राम! इस प्रकार के शब्द करती हुई वह शमशानों में नृत्य करती थी। हे राम! ऐसी देवी तुम्हारी सहायक हो, जो सर्वशक्ति परमात्मा है और सब ब्रह्माण्ड उसके आश्रय है। क्षण में वह अंगुष्ठप्रमाण हो जाती थी और क्षण में बड़े दीर्घ आकार धारण करती थी। सब जगत् में जो क्रिया होती है, वे उसके आश्रय से होती है। कहीं उत्पत्ति होती है, कहीं युद्ध होते हैं। ऐसी नाना प्रकार की क्रिया उस देवी के आश्रय से होती हैं। जैसे आइने में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही उस देवी में क्रिया होती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देवीरुद्रोपाख्यानवर्णनन्नाम शताधिकषषण्णवतितमसर्गः ॥ १६६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो तुमने रुद्र और कालिका का वर्णन किया, सो वे कौन थे? महाप्रलय में तो कुछ नहीं रहता। उनके शरीर में तुमने सृष्टि कैसे देखी और महाप्रलय होकर उनके शरीर में सृष्टि ने कैसे प्रवेश किया? उस काली के हाथ में शस्त्र क्या थे? कहाँ से आई थी और कहाँ गई? उसका आकार क्या था? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई रुद्र है, न काली है, न कोई पुरुष है, न कोई स्त्री है, न कोई नपुंसक है, न पुरुष। मिलकर कुछ नहीं हुआ है। न ब्रह्माण्ड है और न पिण्ड है केवल चिदाकाश है और संकल्प से उपजे सब
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आकार भासित होते हैं। जैसे स्वप्न में आकार भासित होते हैं वैसे ही वे आकार भी भासित होते हैं। वास्तव में केवल चिदाकाश ज्यों का त्यों है। हे राम! आत्मपद अनन्त, चैतन्य, सत्य, प्रकाशरूप, अविनाशी और अपने आपमें स्थित है। रुद्रदेव का आकार जो दिखा था, सो वह चैतन्य आत्मा-ही ऐसे होकर भासित हुआ था-कोई और आकार न था। जैसे सुवर्ण ही भूषण होकर दिखता है, वैसे ही परमदेव चिदाकाश ऐसे होकर भासित हुआ था, क्योंकि वह चैतन्यस्वरूप है। जैसे मधुरता पौड़े का स्वरूप है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। हे राम! चैतन्यसत्ता अपने स्वरूप को नहीं त्यागती, आकार होकर भासित होती है और सदा अपने आपमें स्थित है। जैसे पौड़े के रस में मधुरता न हो तो उसको कोई रख नहीं सकता, वैसे ही आत्मसत्ता में चेतनता न हो तो उसे चैतन्य कोई न कहे। जो आत्मा चेतनता को त्यागे तो परिणामी हो और चैतन्य न कहावे; परन्तु वह तो सदा आप अपने स्वभाव में स्थित है और किसी और अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ। इसी से कहा कि जो कुछ भासित होता है, वह आत्मा का किञ्चन है।
हे राम! जैसे पौड़े के रस में मधुरता होती है, वैसे ही आत्मा में चेतनता है। चैतन्यमात्र में चेतनता लक्षण चेतनतारूप रहता है, इससे यह जगत् भावरूप है जो शुद्धचिन्मात्र में चित्त का उत्थान न होता तो जगद्भाव न लखाता। आत्मसत्ता दोनों अवस्थाओं में सदा ज्यों की त्यों है-जैसे वायु जब स्पन्दित होता है, तब उसका स्पर्शरूप लक्षण प्रतीत होता और जब निस्पन्द होता है, तब उसमें कोई शब्द नहीं प्रवेश कर सकता, पर वायु दोनों अवस्थाओं में तुल्य है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य में किसी शब्द का प्रवेश नहीं; पर चेतननाभाव में है और आत्मसत्ता सदा एकरस है-इसमें वास्तव में यह जगत् ही नहीं है। हे राम! आदि, मध्य, अन्त, जगत्, आकाश, कल्प, महाकल्प, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, जन्म, मरण, सत्, असत्, प्रकाश, अन्धकार, पण्डित, मूर्ख, ज्ञानी, अज्ञानी, नामरूप, कर्मरूप, अवलोक, मनस्कार,