योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ५८५
कि यह महारुद्र है, क्योंकि इनके हाथ में त्रिशूल है, तीन नेत्र और पाँच मुख हैं। यह जानकर मैंने उन्हें प्रणाम किया। राम ने पूछा, हे भगवन्! उनका भयानक रूप क्या था और रुद्र किसको कहते हैं? उनका बड़ा आकार, दस भुजा, पञ्च मुख और तीन नेत्र क्या थे और हाथ में त्रिशूल क्या था? क्या वह किसी के भेजे आये थे? उन्होंने क्या किया और कहाँ गये? वह अकेले थे अथवा उनके साथ कोई और था? वह श्याम-वर्ण क्यों थे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! विषम विष परिच्छिन्न जो अहंकार है, वह त्यागने योग्य है, और समष्टि अहंकार सेवन करने के योग्य है। सब आत्मा प्रतीति का नाम समष्टि अहंकार है। उसी का नाम रुद्र है। कृष्णवर्ण इसलिए था कि वह आकाशरूप है। जैसे आकाश में नीलापन है, वैसे ही उसमें कृष्णता थी सब जीव जो अपने अहंकार को त्यागकर निर्वाण हुए, उनकी समष्टि होकर रुद्ररूप प्रकट हुई, इसी से वह उग्र था। पञ्चमुख ज्ञान इन्द्रियों की समष्टि थी और दस भुजा कर्म इन्द्रियों की समष्टि थी। राजस, तामस और सात्त्विक तीन गुण तीनों नेत्र थे अथवा भूत, भविष्यत्, वर्तमान, या ऋग्, यजुः, साम ये तीनों वेद नेत्र थे। अथवा मन, बुद्धि और चित्त तीनों नेत्र थे। ॐकार की तीन मात्रा उनके नेत्र और आकाश वपु था। त्रिलोकी-रूपी हाथ में त्रिशूल था। चित्संवित् से वह फुरा था, इसमें उसी का भेजा आया था और फिर उसी में लीन होगा। वह केवल आकाश-रूप था। जो कुछ उसने किया, वह भी सुनो। हे राम! ऐसा वह रुद्र था मानों आकाश को पंख लगे हों। उसने अपने नेत्र प्राणों को मींचा तो सब जल उसके मुख में प्रवेश करने लगे। जैसे नदी समुद्र में प्रवेश करती है, वैसे ही सब जल रुद्र में लीन हुए। जैसे बड़वाग्नि समुद्र को पी लेती है, वैसे ही उस रुद्र ने एक मुहूर्त में सब जल पान कर लिया। कहीं जल का अंश भी न देखने को रह गया। जैसे अन्धकार को सूर्य सोख लेता है या जैसे अज्ञानी का अज्ञान सन्त के संग से नष्ट हो जाता है, वैसे ही उसने जल को पान कर लिया। तब केवल शुद्ध आकाश हो गया। न कहीं पृथ्वी दिखती; न अग्नि, न वायु, कोई तत्त्व