भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 584

५८४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

इच्छा हो सो करेंगे। पर जब अहं उत्थान से रहित होंगे, तब निर्वाण- पद को प्राप्त होंगे। जहाँ एक और दो की कोई कल्पना नहीं, उस परमशान्त निर्विकल्प पद को प्राप्त होंगे। इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥६४॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निदान वे ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये— जैसे तेल बिना दीपक बुझ जाता है। ब्रह्माजी जब ब्रह्मपद में निर्वाण हुए और द्वादश सूर्य फिर ब्रह्मपुरी को जलाने लगे और सम्पूर्ण ब्रह्म- पुरी जल गई, तब वे सूर्य भी ब्रह्मा की नाईं पद्मासन लगाकर स्थित हुए। जैसे तेल बिना दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही वे सूर्य भी निर्वाण को प्राप्त हो गये। हे राम ! जब द्वादश सूर्य निर्वाण हो गये, तब समुद्र उमड़े और उन्होंने ब्रह्मपुरी को ढक लिया। जैसे रात्रि में अन्धकार नगर को ढक लेता है, वैसे ही ब्रह्मपुरी को उन्होंने आच्छा- दित किया। बड़े तरङ्ग उछले और पुष्करमेघ भी तरङ्गों से छेदे गये और जलरूप हो गये। हे राम ! तब एक पुरुष आकाश से निकला मुझको देख पड़ा, जो महाभयानक श्यामवर्ण उग्र आकार था। उसने सबको ढक लिया। वह कृष्णमूर्ति ऐसा था, मानों कल्पपर्यन्त की रात इकट्ठा होकर उसके रूप में स्थित हुई हो। उसके मुख से ज्वाला निक- लती थी। उसके शरीर में बड़ा प्रकाश या मानों कोटि सूर्य हों, या बिजली का प्रकाश इकट्ठा हुआ हो। उसके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं और तीन नेत्र थे—मानों तीनों सूर्य चमक रहे थे। उसके हाथ में त्रिशूल था और आकाश की नाईं उसकी मूर्ति थी।

जैसे क्षीरसमुद्र के मथने को भुजा बड़ी करके विष्णु ने शरीर धारण किया था और क्षीरसमुद्र को क्षुब्ध किया था, वैसे ही नासिका की साँस से वह समुद्र को क्षुब्ध कर रहा था। जैसे आकाश का बड़ा आकार है, वैसा ही स्वरूप उसने धारण किया—मानों प्रलयकाल के समुद्र मूर्ति धर के स्थित हुए हों, अथवा मानों सब अहंकार की समष्टि वह था, अथवा महाप्रलय की बड़वाग्नि की मूर्ति स्थित था, या प्रलयकाल के मेघ मूर्ति धरके स्थित हुए थे। हे राम ! मैंने जाना