योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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कहीं न दिखता---एक आकाश ही दिखता जैसा उज्ज्वल मोती होता है वैसा ही उज्ज्वल आकाश दिखता था, और चारों तत्त्व न दिखता था। एक तो अधोभाग दिखता; दूसरे मध्य भाग आकाश, सो रुद्र ही दिखता; तीसरे ऊर्ध्वभाग देख पड़ता और चौथे चिदाकाश देख पड़ता जो सर्वात्मा है। और कुछ न देख पड़ता। हे राम! वह रुद्र भी आकाश-रूप था और उसका कोई आकार न था। केवल भ्रन्ति में आकार भासित होता था। जैसे भ्रम में आकाश में नीलापन और तरुवर और स्वप्न में भ्रम में आकार भासते हैं, वैसे ही रुद्र का आकार देख पड़ा; पर आत्मा आकाश से भिन्न न था। जैसे भ्रम में चिदाकाश में शून्याकाश भासता है, वैसे ही रुद्र का शरीर भासित हुआ। वह रुद्र सर्वात्मा था और आकाश होकर जो भासित हुआ, वह किञ्चन था। हे राम! आकाश में रुद्र निराधार दिखता था। जैसे मेघ निराधार होते हैं, वैसे ही वह निराधार दिखता था। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! इस ब्रह्माण्ड के ऊपर और उसके ऊपर क्या है, सो कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो ब्रह्माण्ड का आकाश है, उस पर दस गुना जल है। जल के ऊपर दस गुना अग्नि है। उसके ऊपर दसगुना वायु है। उसके ऊपर दसगुना आकाश है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! ये तत्त्व जो तुमने वर्णन किये, सो किसके ऊपर हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये तत्त्व पृथ्वी के ऊपर स्थित हैं। जैसे माता की गोद में बालक आ बैठता है, वैसे ही ये तत्त्व पृथ्वी पर हैं और पृथ्वी भागों के आश्रय में है। राम ने पूछा, हे भगवन्! पृथ्वी आदि तत्त्वों सहित निराधार ब्रह्माण्ड किसके आश्रय से स्थित हुआ है। उनका चलना और ठहरना कैसे होता है और वे नष्ट कैसे होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमही कहो कि आकाश में मेघ किसके आश्रय होते हैं? सूर्य और चन्द्रमा किसके आश्रय होते हैं? जैसे ये संकल्प के आश्रित हैं, वैसे ही ब्रह्माण्ड भी संकल्प के आश्रित है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प ही के आश्रित है और संकल्प आत्मा के आश्रित है, वैसे ही यह जगत और तत्त्व भी आत्मसत्ता के