भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ५७३

जगत् हुआ है। उस संकल्परूप जगत् का वह विराट् है, परन्तु आकाश-रूप है, और कुछ नहीं बना। यह जो आकारसहित जगत् दिखता है, सो भ्रम से। पर सब संकल्प आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में जगत् दिखता है सो सब आकाशरूप होता है, परन्तु निद्रादोष से पिण्डाकार भासित होता है और आत्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। हे राम ! अहं जो फुरा है, वह मिथ्या है, अज्ञान से दृढ़ स्थित हुआ है, और असम्यग्दर्शी को दृढ़ भासित होता है। सो केवल संकल्पमात्र है, और कुछ नहीं बना। इससे जितना जगत् भासता है, सो सब चिदाकाश है। एक और द्वैतकल्पना सब शब्दों से रहित आत्मत्वमात्र है। मैं और तुम शब्द कोई नहीं। यह जगत् उनका किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा का आभास जगत् है। संकल्प की दृढ़ता से यह दृश्य दिखता है, पर वास्तव में है नहीं। जैसे संकल्परूप गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर होते हैं, वैसे ही यह जगत् है।

हे राम ! जिस प्रकार मैंने जगत् का वर्णन किया है, उसे जो पुरुष मेरे कहे के अनुसार ज्यों का त्यों धारण करे तो उसकी वासना नष्ट हो जावे और पूर्ववत् आत्मा ज्यों का त्यों भासित हो। तब जैसे जगत् के आदि में आत्मत्वमात्र था, वैसे ही भासित होगा; क्योंकि और कुछ हुआ नहीं, केवल आत्मत्वमात्र ज्यों का त्यों स्थित है। जो आत्मा ही है तो समवायकारण और निमित्तकारण कैसे हों ? जगत् का उदय और नाश होना असत्य है, और अद्वैत और अनन्त कहना भी ठीक नहीं। जब सब शब्दों का अभाव होता है, तब परम चिदाकाश अनुभवसत्ता ही शेष रहती है। इसी का नाम मोक्ष है। हे राम ! मुझको तो अब भी संवित्सत्ता ही भासित होती है। मैं शुद्ध हूँ; सब कल्पना से रहित और चिदाकाश हूँ। मुझमें जो वशिष्ठ अहं फुरा है, वह फुरा नहीं, फुरे की नाईं लगता है और आत्मा का ही किञ्चन है; हुआ कुछ नहीं। इससे तुम भी इसी प्रकार जागकर निर्वासनिक हो जाओ और अपने प्रकृत आचार को करो अथवा न करो, जो इच्छा हो सो करो, परन्तु करने और न करने का संकल्प मत करो और परम मौन में स्थित हो रहो।