भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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५७२ ❁ योगवासिष्ठ ❁

ज्ञानवान् को यही अनुभव होता है, इसमें तुम भी ऐसे ही समझो।

इति श्री० यो० निर्वाणप्रकरणे नवमशताधिकनवाशीतितमस्सर्गः॥ १८६ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! बन्धनमोक्ष जगत्-बुद्धि न सत् है और न असत्। उदय भी नहीं हुआ और अस्त भी नहीं होता। केवल ज्यों का त्यों आत्मा स्थित है। ऐसे आपने मुझको उपदेश किया है। इसलिए मैंने जाना है कि आत्मा में जगत् न उपजता है और न मिटता है, पर तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को सुनता हुआ भी मैं तृप्त नहीं होता और अमृत की नाईं पान करता हूँ। जगत् सत्-असत् से रहित सन्मात्र है, उसको मैंने जाना है। अब यह कहिये कि संसार भ्रम कैसे उपजता है और उसका अनुभव कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ तुमको स्थावर-जङ्गम जगत् सब प्रकार देशकाल-संयुक्त दीखता है, उसके नाश का नाम महाप्रलय है। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र भी लीन हो जाते हैं। उसके पीछे जो शेष रहता है, वह स्वच्छ, अज, अनादि, केवल आत्मतत्त्वमात्र है—उसमें वाणी की गति नहीं। वह केवल अपने आपमें स्थित और परम सूक्ष्म है, जिसमें आकाश भी स्थूल है। जैसे सुमेरुपर्वत के आगे राई का दाना सूक्ष्म है, वैसे ही आकाश से भी आत्मा सूक्ष्म है और संवेदन से रहित चिन्मात्र है। उसमें अहं किञ्चन होकर फुरा है। आत्मा सदा निर्विकल्प और समुद्र-सदृश, देशकाल के भ्रम से रहित और केवल चैतन्यघन अपने आपमें स्थित है। जैसे स्वप्न में अपने भाव को लेकर जीव स्थित होता है, वैसे ही आत्मा अपने भाव को लेकर चेतन किञ्चन होता है। उसी का नाम ब्रह्मा है, और वह भी चिद्रूप है। हे राम ! चित्अणु जो अपने भाव को लेकर उदय हुआ है, उसने चैत्यनाम दृश्य को देखा। इससे उसका अनुभव मिथ्या हुआ। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरण देखता है, सो वह अनुभव मिथ्या है; वैसे ही चित्अणु दृष्टि से दृश्य को देखता है। यह मिथ्यादृष्टि है। चित्अणु अपने स्वरूप को देखता है, सो केवल निराकाररूप है, परन्तु अहंरूप बीज दृढ़ होता है, उससे अपने आपसे निकल संकल्प से दृश्य को देखता है।