योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जैसे बीज से अंकुर निकलता है, वैसे ही संकल्प के फुरने से देश, काल, द्रव्य, द्रष्टा दर्शन और दृश्य होता है। वास्तव में हुआ कुछ नहीं। आत्मा सदा अपने स्वभाव में स्थित है, परन्तु संकल्प मे हुए की नाईं भासित होता है। जहाँ चित्अणु भासित हो, वह देश है। जिस समय भासित हो, वह काल है। जो भान हो, वह क्रिया हुई। भान का ग्रहण द्रव्य है और देखने को जो वृत्ति दौड़ती है, वह नेत्र होकर स्थित हुई है। जिसको देखते हैं, वह भी शून्य है और देखनेवाले भी शून्य हैं। सब असत् है-कुछ बना नहीं। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने में स्थित है। संकल्प द्वारा सब कुछ बनता जाता है। चित्अणु जो भासित हुआ, वह दृश्यरूप होकर स्थित हुआ है। जब चित्अणु में स्वरूप की वृत्ति फुरती है, तब चक्षु इन्द्रिय स्थित होती है। जब सुनने की वृत्ति फुरती है, तब श्रोत इन्द्रिय स्थित होती है। जब स्पर्श की वृत्ति फुरती है, तब त्वक् इन्द्रिय स्थित होती है। जब सुगन्ध लेने की वृत्ति फुरती है, तब नामिका इन्द्रिय स्थित होती है। और जब रस लेने की इच्छा होती है, तब जिह्वा इन्द्रिय स्वाद लेती है। हे राम ! प्रथम यह चित्अणु नाम से रहित फुरा है। सम्पूर्ण जगत् भी तद्रूप ही था और अब भी वही केवल आकाशरूप है। संकल्प से अपने में पिण्डघन देखकर शरीर और इन्द्रियाँ देखीं, अनादि सत्स्वरूप चित्अणु इन्द्रियों के संयोग से पदार्थों को ग्रहण करता है। स्पन्दनरूप जो वृत्ति फुरी, उसी का नाम मन हुआ। जब निश्चयात्मक बुद्धि होकर स्थित हुई, तब चित्अणु में यह निश्चय हुआ कि मैं द्रष्टा हूँ-यही अहंकार हुआ। जब अहंकार से चित्अणु का संयोग हुआ, तब अपने में देशकाल का परिच्छेद देखा। आगे दृश्य और पूर्व उत्तरकाल देखा कि इस देश में बैठा हूँ और यह कर्म मैंने किया है-यह विषम अहंकार हुआ। निदान देश, काल, क्रिया, द्रव्य के अर्थ को भिन्न-भिन्न ग्रहण करता है और आकाश होकर आकाश को ग्रहण करता है।
हे राम ! आदि स्फुरण से चित्अणु में प्रथम अन्तवाहक शरीर हुआ। फिर संकल्प के दृढ़ अभ्यास से आधिभौतिक भासित होने लगा।