योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जैसे आकाश में और आकाश ही, वैसे ही यह आकाश अनहोते भ्रम से उदय हुए हैं और मरु की नाईं भासते हैं। जैसे मरुस्थल में भ्रम से नदी दिखती है, वैसे ही अविचार से संकल्प की दृढ़ता से पाञ्चभौतिक आकार भासित होते हैं। उनमें अहं प्रत्यय होने से जीव देखता है कि यह मेरा सिर है; ये मेरे चरण हैं; यह अमुक देश है इत्यादि। यह जीव शब्द-अर्थ और नाना प्रकार का जगत् और भाव-अभाव ग्रहण करता है और कहता है कि यह देश है, यह काल है, यह क्रिया है और यह पदार्थ है। हे राम! जब इस प्रकार जगत् के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब चित्त विषयों की ओर दौड़ता है और रागद्वेष को ग्रहण करता है। जो कुछ देहादिक भूत फुरने से भासते हैं, वे केवल संकल्पमात्र हैं और संकल्प की दृढ़ता से दृढ़ हुए हैं। हे राम! इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार कीट और पतंग भी उत्पन्न हुए हैं, परन्तु प्रमाद-अप्रमाद का भेद है। जो अप्रमादी हैं, वे सदा आनन्दरूप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। उनको यह जगत् और यह जगत् अपना ही रूप प्रतीत होता है। और जो प्रमादी हैं, वे तुच्छ और सदा दुःखी हैं, पर वास्तव में परमात्मतत्त्व से भिन्न कुछ हुआ नहीं। जैसे आकाश अपनी शून्यता में नित्य स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। सबका बीज, त्रिलोकीरूप बूँद का मेघ, कारण का कारण, काल में नीति और क्रिया में क्रिया वही है। आदि-विराट् पुरुष का शरीर भी नहीं और हम तुम भी नहीं-केवल चिदाकाश-रूप है। अब भी इनका शरीर आकाशरूप है और आत्मसत्ता भिन्न अवस्था को नहीं प्राप्त हुई-केवल आकाशरूप है। स्वप्न में युद्ध होते और मेघ गरजते इत्यादि शब्द-अर्थ भासित होते हैं, सो वे केवल आकाशरूप हैं, बना कुछ नहीं, परन्तु निद्रादोष से भासते हैं और मनुष्य जब जागता है, तब जानता है कि हुआ कुछ न था-आकाश रूप है, वैसे ही जो पुरुष अनादि अविद्या में जागा है, उसको जगत् आकाशरूप भासित होता है। हे राम! बहुत योजन पर्यन्त विराट् पुरुष का देह है, तो भी वह ब्रह्म आकाश के सूक्ष्म अणु में स्थित है।