योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५७७
यह त्रिलोकी एक चितअणु में स्थित है और इसका विराट् पुरुष ऐसा है, जिसका आदि, अन्त और मध्य नहीं देख पड़ता, तौ भी एक चावल के समान भी नहीं है ।
हे रामचन्द्र ! यह जगत् और जगत् के भोग विस्तीर्ण दिखते हैं, पर जैसे स्वप्न के पर्वत जाग्रत् के एक अणु के समान नहीं, वैसे ही विचाररूपी तराजू से तोलिये तो परमार्थसत्ता में इनकी कुछ सत्यता नहीं देख पड़ती; परन्तु आत्मसत्ता से कुछ भिन्न नहीं हुआ, आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । इसी का नाम स्वायम्भुव मनु और विराट् है, और इसी को जगत् कहते हैं । जगत् और विराट् में कुछ भेद नहीं—वास्तव में आकाशरूप है । सनातन भी इसी को कहते हैं । रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, पवन, मेघ, पर्वत, जल आदि जितने भूत हैं, वे उसका शरीर हैं । हे राम ! इसका आदि शरीर जो चिन्मात्ररूप है, उसमें चेतनता से अपना अणु भी देह देखता है—जैसे तेज का कणका होता है । उस तेज-अणु से चेतनता—और क्रम से अपना बड़ा शरीर जगत्-रूप देखता है । जैसे स्वप्न में कोई पुरुष अपने को पर्वत देखे, वैसे ही वह अपने को विराट् रूप देखता है । जैसे पवन के दो रूप हैं—चलता है तो भी पवन है और नहीं चलता तो भी पवन है—वैसे ही जब चित्त फुरता है, तब भी ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है और जब चित्त नहीं फुरता, तब भी ज्यों की त्यों है । परन्तु जब स्पन्दन फुरता है, तब विराट् रूप होकर स्थित होता है, और जब चित्त नहीं फुरता, तब अद्वैतसत्ता भासित होती है और सदा अद्वैत ही विराट्स्वरूप है । हे राम ! इस दृष्टि से उसके सिर और पैर नहीं दिखते । जितनी ब्रह्माण्ड की पृथ्वी है, वह उसका मांस है । सब समुद्र उसका रुधिर है । नदी नाड़ी है । दशों दिशा वक्षःस्थल है । तारागण रोमावली हैं । सुमेरु आदिक अँगुलियाँ हैं । सूर्यादिक तेज पित्त हैं । चन्द्रमा कफ है । पवन प्राणवायु है । सम्पूर्ण जगत्जाल उसका शरीर है । ब्रह्मा हृदय है, सो आकाशरूप है, पर संकल्प से नानारूप भासित होता है, स्वरूप में कुछ बना नहीं । आकाश आदिक सब जगत् चिदाकाशरूप और अपने आप ही में स्थित है ।
इति श्री० नि० विरादात्मवर्णनन्नाम शताधिकनावेनामसर्गः॥ १४०॥