योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५७० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
जब इच्छा निर्वाण होगी, तब जगत् का भी स्वाभाविक अभाव हो जायगा। तुम्हारा शरीर संकल्प से भासित होता है, इससे तुम अपनी सृष्टि में जाओ। ऐसा न हो कि तुम्हारा शरीर भी यहाँ निर्वाण हो जावे। हे राम! इस प्रकार वह मुझसे कहकर फिर देवी से बोले, हे देवि! अब तू निर्वाण हो और अपने आपमें बोध आदिक को भी लीन कर।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शुकान्तरवशिष्ठब्रह्मसंवाद- वर्णनन्नाम शताधिकसप्तशीतितमस्सर्गः ॥१७७॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर ब्रह्मा ने पद्मासन लगाया और सब जनों के साथ 'अकार', 'उकार', 'मकार' को छोड़कर अर्धमात्रा में स्थित हुए। तब उनकी मूर्ति ऐसी दिखने लगी, जैसे कागज पर मूर्ति लिखी होती है। उन्हें सम्पूर्ण जगत्जाल का ज्ञान भूल गया। देवी भी उसी प्रकार पद्मासन बाँधकर ब्रह्माजी के निश्चय में लीन हो जाने लगी। जब ब्रह्माजी निर्वेदनरूप ब्रह्म में लीन होने लगे उस समय जितने उपद्रव थे, सब उदय हुए। मनुष्य पाप करने लगे। स्त्रियाँ दुराचारिणी हो गईं। सब जीवों ने धर्म को त्याग दिया। कामी पुरुष बहुत हुए जो परनारियों के साथ भोग करते थे और पुरुष स्त्रियाँ किसी की शङ्का न करती थीं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष बढ़ गये और शास्त्र की मर्यादा त्यागकर लोग अनीश्वरवादी हुए। वर्षा बन्द हो गई और कुहरा पड़ने लगा। दुष्काल पड़ा। दुष्टजन धनपात्र होने लगे। धर्मात्मा आपदा भोगने लगे। चोर चोरी करने लगे। राजा मद्यपान करने लगे। जीवों को बड़े दुःख प्राप्त होने लगे, वे तीनों तापों से जलने लगे। राजाओं ने न्याय को त्याग दिया। निदान जो पाप आचार थे, वे उदय हुए और धर्म छिप गया। अज्ञानी राज्य करते; पण्डित ज्ञानी टहल करते, दुर्जनों की मानपूजा होती; सत् पण्डितों का निरादर होता; जीवों के समूह इकट्ठे हुए और पृथ्वी ने अपनी सत्ता को त्याग दिया क्योंकि पृथ्वी ब्रह्मा के संकल्प में थी। जब उन्होंने अपना संकल्प खींचा, तब वह निर्जीव हो गई और चेतनता निकल गई। जो स्थान मृतकों के विचरने के थे, वे खाईं की