योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण *
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बोध ही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! जैसे स्वप्न में ग्रह-चक्र फिरता दिखता है, वैसे ही सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, नदी, वरुण, कुबेर आदि जगत् जो भ्रम से दृष्टिगोचर होता है सो कुछ बना नहीं—चैतन्य का किञ्चन ही ऐसे भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में किञ्चन जलाभास होता है, वैसे ही जहाँ आत्मसत्ता है, वहाँ जगत् दिखता है, सब पदार्थ आत्मसत्ता से ही भासित होते हैं, ब्रह्मसत्ता सबमें अनुस्यूत है, इससे सब ओर सृष्टि बसती है। जैसे इस शिला में हमारी सृष्टि में जो कुछ पदार्थ दिखते हैं और इनमें सृष्टि बसती है, सो परिच्छिन्न दृष्टि से नहीं दिखती, पर जब अन्तर्वाहक दृष्टि से देखिये, तब प्रतीत होती है। घटों में, मठों में और पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश आदि स्थानों में सृष्टि है, पर बना कुछ नहीं। जैसे जहाँ समुद्र है वहाँ तरङ्ग भी होते हैं, परन्तु समुद्र से भिन्न तरङ्ग नहीं—वही रूप हैं, वैसे ही यह जगत् उपजा नहीं और न लीन होता है; ज्यों का त्यों आत्मसमुद्र अपने आप में स्थित है।
जगत् संकल्प से फुरता है, और संकल्प ही अहरूपी किञ्चनमात्र उदय हुआ। जैसे कमल से सुगन्ध लेकर तरियाँ निकलती हैं, वैसे ही मूल से देवी जगतरूपी सुगन्ध को लेकर उदय हुई है, परन्तु वास्तव जगत् कुछ बना नहीं, केवल संकल्प से बने की नाईं भासित होता है। हे मुनीश्वर ! वास्तव में न कोई संकल्प है और न प्रलय, ज्यों का त्यों ब्रह्म अपने स्वभाव में स्थित है। जैसे आकाश में आकाश और समुद्र में समुद्र स्थित है, वैसे ही ब्रह्म में ब्रह्म स्थित है। हे मुनीश्वर ! यह जगत् न सत्य है और न असत्य; आत्मा में न यह उदय हुआ और न अस्त होवेगा। जैसे आकाश में नीलता न सत्य है, न असत्य, वैसे ही ब्रह्म में जगत् न सत्य है और न असत्य। मैं उस ब्रह्म का किञ्चन ब्रह्मा हूँ, और यह जगत् मेरे संकल्प से उत्पन्न हुआ है। अब मैं संकल्प को निर्वाण करता हूँ। जब संकल्प निर्वाण होगा, तब जैसे कमल का नाश होने पर सुगन्ध का अभाव हो जाता है, वैसे ही जगत् का अभाव हो जायगा। मुझसे इच्छा फुरी थी, उस वासना में जगत् है। अब मैं इसका निर्वाण करता हूँ।