भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 568

५६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे मुनीश्वर ! यह मेरी मूर्तिरूप वासनाशक्ति है । पहले मैंने इसको उत्पन्न करके इस जगत्-जाल को रचा, पर अब मुझको निर्विकल्प निर्वाणपद की इच्छा हुई है, इससे मैंने इसका त्याग किया है । अब इसका भी वैराग्य उपजा है, उस कारण बोधरूप तुम्हारी शरण में आई हूँ । हे मुनीश्वर ! यह जगत् विलास संकल्प से हुआ है; वास्तव में कुछ हुआ नहीं; परमात्मतत्त्व ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है । मैं, तुम, मेरा, तेरा इत्यादिक शब्द समुद्र के तरङ्ग की नाईं हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर शब्द करते हैं और फिर लीन हो जाते हैं, वैसे ही हमारा तुम्हारा बोलना और मिलाप होना है । हे मुनीश्वर ! वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई लीन होता है जैसे तरङ्ग जलरूप है-भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है-भिन्न कुछ नहीं । इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि सब वही हैं । हे मुनीश्वर ! मैं चिदाकाश हूँ और चिदाकाश में स्थित हूँ । यह ब्रह्मशक्ति है, जिसने जगत् रचा है । यह भी अजर और अमर है । न कभी उपजी है और न इसका नाश होगा । शुद्ध आत्मा किञ्चन द्वारा जगत् होकर भासित होता है जैसे सूर्य की किरणें जल होकर भासित होती हैं, परन्तु जल कुछ हुआ नहीं, वैसे ही सब आत्मा ही है; विश्व कुछ हुआ नहीं । हे मुनीश्वर ! जगत्जाल होकर आत्मा ही दिखता है, पर जगत् के उदय अस्त होने से आत्मा में कुछ क्षोभ नहीं होता; वह ज्यों का त्यों एकरस स्थित है । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और लीन होते हैं, परन्तु समुद्र ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही जगत् कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं लगता है । जैसे दृढ़ता से जल ओला हो जाता है, वैसे ही चिन्मात्र में चैतन्य में पिण्डाकार भासित होता है, परन्तु उपजा कुछ नहीं ।

हे मुनीश्वर ! यह जो शिला है, जिसमें हमारी सृष्टि है, सो केवल चिद्घनरूप है । तुम्हारी दृष्टि में यह शिला है और हम चैतन्य घन हैं । चैतन्य आकाश आत्मा ही शिला होकर भासित होती है । जैसे स्वप्न में सब सृष्टि जाग्रतरूप दिखती है वह बोधरूप है-बोध ही जगत् सा भासित होता है, वैसे ही यह जगत् और शिलारूप होकर