योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५५८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
के दो ध्रुव हैं। काल इस चक्र को फेरता है। सो फेरता-फेरता नाशरूप जो काल है, वह कल्प के अन्त में उस चक्र के मुख में जा समाता है।
हे मुनीश्वर ! परमात्मा अनन्त है, उसका कोई अन्त नहीं जान सकता। जब संवेदन जगता है तब जीव जानता है कि यह जगत् ईश्वर की सत्ता से है और जब फुरने से रहित होता है, तब जाना नहीं जाता कि जगत् कहाँ गया। हे मुनीश्वर ! तुम चलो और मेरी सृष्टि का विलास देखो। तुम तो जगत् के विलास से पार हुए हो और यद्यपि तुमको इच्छा नहीं है तो भी कृपा करके उस शिला में हमारी सृष्टि देखो। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार कहकर वह आकाशमार्ग में मुझे ले चली—जैसे गन्ध को वायु ले जाता है। तब मैं और वह दोनों आकाशमार्ग में उड़े और भूताकाश में चिरकाल तक उड़ते गये। तब हमको लोकालोक पर्वत देख पड़ा। उसके निकट जाकर उसके शिखर देखे कि बहुत ऊँचे गये हैं और बड़े मेघ उस पर विचरते हैं। शिखर ऐसे सुन्दर हैं, मानो क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा निकला है। वहाँ जाकर मैंने महासुन्दर सुवर्ण की एक शिला देखी। उसके निकट गया तो मैंने कहा, हे देवि ! वह तो शिला पड़ी है, तुम्हारी सृष्टि कहाँ है ? इसमें पृथ्वी, द्वीप की मर्यादा, जिसका आवरण चौहेंफेर समुद्र होता है, और उन पर की दसमहस योजनपर्यन्त सुवर्ण की पृथ्वी, पर्वत, सप्तलोक, आकाश, दशोंदिशा, तारामण्डल, रात्रि-दिन के प्रकाश सूर्य, चन्द्रमा और भूतों का संचार, देवगण, विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, योगेश्वर, वरुण, कुबेर, जगत् की उत्पत्ति प्रलय का संचार, पाताल की भूमिका, मण्डलेश्वर, न्याय करनेवाले, मरुस्थल की भूमिका, नन्दनवन आदिक, दैत्यों के विरोधी देवता आदि कहाँ हैं ? यह तो एक शिला मात्र है।
हे राम ! जब मैंने आश्चर्य को प्राप्त होकर ऐसे कहा, तब विद्याधरी बोली—हे भगवन् ! मुझको तो प्रत्यक्ष इस शिला में अपनी सृष्टि दिखती है—जैसे शुद्ध आईने में अपना मुख दिखता है, वैसे ही मुझको अपनी सृष्टि इस शिला में प्रत्यक्ष दिखती है—जैसी मर्यादा देश