भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 559

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५५६

देशान्तर की मुझको भासित होती है, इसका संस्कार मेरे हृदय में है, इसी से मुझको प्रत्यक्ष भासित है। तुम्हारे हृदय में इसका संस्कार नहीं है, इसी से तुमको नहीं भासित होती। तुम्हारी सृष्टि की अपेक्षा यह शिला पड़ी है और तुमको शिला का निश्चय है, इस कारण तुमको इसमें जगत् नहीं दीखता। हे भगवन् ! जिसका अभ्यास होता है, वह पदार्थ अवश्य प्राप्त होता है और वही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! गुरु शिष्य को उपदेश करता है, पर उपदेशमात्र से इष्ट की प्राप्ति नहीं होती। जब उसका अभ्यास करे, तब इष्ट की प्राप्ति होती है। हे मुनीश्वर ! ऐसा न्याय और सिद्धता कोई नहीं, जो अभ्यास करने से न मिले, ऐसी कला कोई नहीं, जो अभ्यास करने से न प्राप्त हो और ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो अभ्यास की प्रबलता से सिद्ध न हो। जो थककर छोड़े नहीं तो अवश्य सिद्ध होते हैं। हे मुनीश्वर ! जो कुछ सिद्ध होता दिखता है, सो सब अभ्यास से होता है। प्रथम जब मैं तुम्हारे साथ आई थी, तब मुझको भी शिला में सृष्टि नहीं दीखी थी, क्योंकि यह सृष्टि अन्तवाहक शरीर में स्थित है। तुम्हारे साथ द्वैतरूपी कथा के कहने से अन्तवाहक शरीर मुझको भूल गया था, इससे विश्व की चर्चा और तुम्हारी सृष्टि की चर्चा करके मुझको वह स्पष्ट नहीं भासित होती। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही तुम्हारी सृष्टि के संकल्प से मुझको भी अपनी सृष्टि नहीं दिखती, परन्तु चिरकाल जो अभ्यास किया है, इससे फिर भासित होती है, क्योंकि जो दृढ़ अभ्यास होता है, उसकी जय होती है। हे मुनीश्वर, चिन्मात्र पद में फुरने से आदि जीवों के शरीर अन्तवाहक हुए हैं, अर्थात् आकाशरूप शरीर थे। जब उनमें प्रमाद से दृढ़ अभ्यास हुआ, तब आधिभौतिक होकर दिखने लगे। जब फिर भावना उलटकर योग की धारणा से अभ्यास होता है, तब आधिभौतिकता क्षीण हो जाती है और अन्तवाहकता प्रकट होती है। उससे जीव आकाश में पक्षी की नाईं उड़ता फिरता है। इससे तुम देखो कि अभ्यास के बल से सब कुछ सिद्ध होता है।