योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
विचारता रहता है, परन्तु आत्मपद को नहीं प्राप्त हुआ । वह मन को स्थिर करने का उपाय करता है, परन्तु अब तक उसका मन स्थिर नहीं हुआ । सब एषणाओं से रहित होकर वह शास्त्र को विचारता रहता है पर आत्मा का साक्षात्कार उसे नहीं हुआ । मुझको भी वैराग्य उपजा है । अब हम दोनों वैराग्य से सम्पन्न हुए हैं और परमपद पाने की इच्छा हुई है । शरीर हमको नीरस हो गया है—जैसे शरत्काल की बेल नीरस होती है—इस कारण मैं योग की धारणा करने लगी हूँ । यह शक्ति अब मुझको उत्पन्न हुई है कि आकाशमार्ग को आऊँ और जाऊँ; योग-धारणा से आकाश पर उड़ने की भी शक्ति हुई है और सिद्धमार्ग की धारणा से सिद्धों के मार्ग में भी आती जाती हूँ, परन्तु अर्थ कुछ सिद्ध न हुआ, क्योंकि पाने योग्य आत्मपद नहीं प्राप्त हुआ, जिसके पाने में कोई दुःख न रहे । अब मुझे निर्वाण की इच्छा हुई है ।
मैंने सिद्धों के गण, देवता, विद्याधर और ज्ञानियों के बहुत स्थान देखे हैं; परन्तु जहाँ गई, वहाँ सब तुम्हारी ही स्तुति करते हैं कि वशिष्ठजी आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान को निवृत्त करते हैं । जैसे बड़ा मेघ बरसता है, परन्तु जब वायु चलता है, तब मेघ को दूर करता है, वैसे ही तुम्हारे वचन अज्ञान को दूर करते हैं । जब ऐसे मैंने तुम्हारी स्तुति सुनी, तब मैंने इस सृष्टि में आने का अभ्यास किया और धारणा के अभ्यास से तुम्हारी सृष्टि में आई हूँ । इससे हे मुनीश्वर ! मेरी और मेरे भर्त्ता की शान्ति के लिए आत्मज्ञान का उपदेश करो । मेरा भर्त्ता, जो मन को स्थिर करने का यत्न करता है, उसको तुम ऐसा उपदेश करो कि शीघ्र ही स्थिर हो और आत्मज्ञान को पावै । और मुझको भी आत्मज्ञान का उपदेश करो । हे भगवन् ! तुम माया से पार मुझको दीखते हो, इस कारण मैं तुम्हारी शरण आई हूँ । मैं स्त्री बुद्धि मे तुम्हारे निकट नहीं आई, शिष्यभाव को लेकर आई हूँ और मैं जानती हूँ कि मेरा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है, क्योंकि जो कोई महापुरुष की शरण आता है तो निष्फल नहीं जाता, बल्कि सब प्रयोजन पूर्ण होता है । जैसी किसी की कामना