योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५६२ ❇ योगवाशिष्ट ❇
होते हैं । तुम्हारा शिला में दृढ़ निश्चय है, इससे तुमको शिला ही दिखती है और मुझको इसमें सृष्टि दिखती है । जब तुम्हारा संकल्प भी मेरे संकल्प के साथ मिले, तब तुमको भी यह जगत् भासित हो । यह जगत् जो स्थित है सो मेरे अन्तवाहक में है । आदि-वपु सबका अन्त-वाहक है । अतः अन्तवाहक में सबकी एकता है-जैसे समुद्र में सब तरङ्गों की एकता होती है । हे मुनीश्वर ! जब तुम धारणा का अभ्यास करके शुद्ध बुद्धि को प्राप्त होगे, तब तुमको इस शिला में सृष्टि भासित होगी । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब उसने इस प्रकार मुझसे शुद्ध युक्ति कही, तब मैंने पद्मासन लगाकर सब विषय त्याग दिये और कथा के क्षोभ का भी त्यागकर अपने आधिभौतिक का भी त्याग किया । तब निरन्तर शुद्ध बोध का अभ्यास करने से मुझमें बोध का अनुभव उदय हुआ । जैसे मेघ के अभाव से शरत्काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही कलना से रहित मुझमें शुद्ध बोध का अनुभव उदय हुआ, जो उदय और अस्त से रहित परम शान्तरूप है । उसमें वह शिला मुझको आकाशरूप देख पड़ी और शिलातत्त्व में केवल बोधमात्र दृष्टिगोचर हुई । पृथ्वी आदि तत्त्व कोई मुझको नजर न आये, केवल अद्वैत आकाश आत्मतत्त्वमात्र अपना रूप ही दृष्टिगोचर हुआ पर जब बोधमात्र से अन्तवाहकरूप होकर स्पन्दन फुरा, तब अन्तवाहक से उस शिला में सृष्टि भासित होने लगी । जैसे मनोराज्य की सृष्टि होती है और बोध से भिन्न-भिन्न नहीं होती, वैसे ही वह सृष्टि मुझको दिखी और शिला का रूप प्रतीत हुई । जैसे स्वप्न के गृह में शिला दिखे तो वह अनुभव ही शिला और गृहरूप होकर भाषित होता है, कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही वह शिला देख पड़ी ।
हे राम ! जैसे मैंने आकाशरूप वह शिला देखी, वैसे ही सब जगत् चिदाकाशरूप है, कुछ द्वैत नहीं बना । सर्वदा आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है, पर आत्मा के अज्ञान से द्वैत भासित होता है-जैसे कोई पुरुष स्वप्न में अपना सिर कटा देखे और रुदन करे, पर जागकर अपने को ज्यों का त्यों देखता है, वैसे ही जब तक जीव अज्ञाननिद्रा में सोता है,