योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५६१
सूर्य उदय होता है, वहाँ इष्ट की प्राप्ति होती है। अज्ञानरूपी विशूचिका रोग ब्रह्मचर्चा के अभ्यास से नष्ट हो जाता है। हे मुनीश्वर! संसार-रूपी समुद्र आदि-अन्त से रहित है, पर आत्मअभ्यासरूपी नौका द्वारा जीव उसे तर जाता है—जो अभ्यास को न त्यागोगे तो अवश्य तरोगे। हे मुनीश्वर! जो पदार्थ उदय हो, उसके अभाव की भावना कीजिये तो अस्त हो जाता है, और जो अस्त हो, पर उसके उदय होने की भावना कीजिये तो वह उदय होता है। जैसे सिद्ध के शाप से प्रत्यक्ष प्राप्त पदार्थ नष्ट हो जाता है और वरदान से अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति होती है। हे मुनीश्वर! जो पुरुष शास्त्र से इष्ट पदार्थ को सुनता है और उसका अभ्यास नहीं करता, उसे मनुष्यों में नीच जानो। उसको इष्ट पदार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होती। जैसे वन्ध्या के पुत्र नहीं होता, वैसे ही उसको इष्ट पदार्थ की सिद्धि नहीं होती। हे मुनीश्वर! जो आत्मरूपी इष्ट को त्यागकर और किसी पदार्थ की वाञ्छा करता है, वह अनिष्ट के बाद अनिष्ट पाकर एक नरक से दूसरे नरक को भोगता है। हे मुनीश्वर! जिसको अभ्यास का भी अभ्यास प्राप्त हुआ है, उसको शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होती है। जीव अभ्यास के बल से इष्ट को पाता है—जैसे प्रकाश से पदार्थ देखिये कि वह पड़ा है। तो उसका नाम अभ्यास है और उसके निमित्त यत्न करना अभ्यास का अभ्यास है। जब यत्न और अभ्यास करते हैं, तब पदार्थ को पाते हैं। बारम्बार चिन्तन करने का नाम अभ्यास है। जब ऐसा अभ्यास हो, तब इष्ट पदार्थ की प्राप्ति होती है—अन्यथा नहीं होती। हे मुनीश्वर! चौदह प्रकार के भूतजात हैं, जैसा-जैसा किसी को अभ्यास है उसके बल से वैसा ही वैसा वह सिद्ध होता है। अभ्यासरूपी सूर्य के प्रकाश से जीव अपने इष्ट पदार्थ पाता है। अभ्यास के बल से भय निवृत्त होता है और पृथ्वी, पर्वत, वन, कन्दरा में निर्भय होकर जीव विचरता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चाशीतितमसर्गः ॥ १५ ॥
विद्याधरी बोली, हे मुनीश्वर! सब पदार्थ निरन्तर अभ्यास से सिद्ध