योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५६३
तब तक जगत-भ्रम नहीं मिटता। जब स्वरूप में जागकर देखेगा, तब सब भ्रम मिट जावेगा और केवल अपना ही रूप भासित होगा। हे राम! यह आश्चर्य देखो कि जो वस्तु सत्यरूप है, वह असत् की नाईं भासित होती है। आत्मा सदा सत्यरूप है, पर अज्ञान से नहीं भासित होता और जो असत्यरूप है वह सत् की नाईं भासित होता है। शरीरादिक दृश्य असतरूप हैं, वे सत्य से होकर भासित होते हैं। हे रामचन्द्र! आत्मा सदा प्रत्यक्ष है और शरीरादिक परोक्ष हैं, पर अज्ञान से शरीरादिक प्रत्यक्ष लगते हैं, और आत्मपद परोक्ष लगता है। हे राम! आत्मा सदा प्रत्यक्ष है और इस लोक अथवा परलोक की क्रिया जो सिद्ध होती है, वह सम्पूर्ण आत्मसत्ता से ही सिद्ध होती है। प्रत्यक्ष प्रमाण आत्मसत्ता से ही भासित होता है—आदि प्रत्यक्ष आत्मा ही है और सब कुछ आत्मा के पीछे जाना जाता है। जो पुरुष कहते हैं कि आत्मा योग और मन से प्रत्यक्ष होता है, वे मूर्ख हैं; आत्मा सदा प्रत्यक्ष है और प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी आत्मा से ही सिद्ध होते हैं। माया इसी का नाम है कि सदा अपरोक्ष वस्तु आत्मा को परोक्ष जानना और शरीरादिक असत्य को सत्य मानना। हे राम! जितने जीव हैं उनका वास्तव रूप ब्रह्म ही है। उनमें आदि फुरना अन्तवाहक रूप हुआ है। उनके अनन्तर आधिभौतिक भासित होने लगा है। लोग भ्रम से आधिभौतिक को अपना रूप जानते हैं। पर जो सदा निर्विकार, निराकार, निर्गुण स्वरूप अपना रूप अनुभव है, उसको कोई नहीं जानता। सब जीवों का आदि शरीर अन्तवाहक है। वह शुद्ध आत्मा का किञ्चन केवल आकाशरूप है। और कुछ बना नहीं संकल्प करके आधिभौतिकता दृढ़ हुई। मिथ्या भ्रान्ति से भासित होती है। जैसे स्वप्न में आधिभौतिक शरीर भासित होता है, वैसे ही जाग्रत् में आधिभौतिक शरीर भासित होता है। अन्तवाहक अविनाशी है—इस लोक और परलोक में इसका नाश नहीं होता। वास्तव में बोधस्वरूप से भिन्न कुछ नहीं, भ्रम से आधिभौतिक दिखता है।
जैसे सूर्य की किरणों में जल, सीपी में रूपा, रस्सी में सर्प और