भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 565

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६५

अर्थ श्रोता के हृदय में होते हैं, और जिसने नहीं सुनी, उसके हृदय में नहीं होते, वैसे ही मेरे सिद्धान्त को ज्ञानवान जानते हैं; अज्ञानी नहीं जान सकते। हे राम! जितना कुछ आधिभौतिक जगत् दिखता है वह अप्रत्यक्ष है और आत्मा सदा प्रत्यक्ष है। जो इस लोक अथवा परलोक का अर्थ है वह अनुभव से सिद्ध होता है; क्योंकि सबका आदि अनुभव प्रत्यक्ष है। उसको त्यागकर जो देहादिक दृश्य को अपना रूप जानते हैं और इन्हीं को प्रत्यक्ष जानते हैं, वे मूर्ख पशु और पत्थर से हैं और सूखे तृण की नांई तुच्छ हैं। जैसे भ्रमण से पर्वत आदि पदार्थ घूमते लगते हैं, वैसे ही अज्ञानी को आधिभौतिक भासित होते हैं। हे राम! यह सब जगत् परोक्ष है; क्योंकि इन्द्रियों से प्रत्यक्ष होता है। जो नेत्र होते हैं तो रूप दिखता है और जो नेत्र न हों तो न दिखे, इसी प्रकार सब इन्द्रियों के विषय हैं। जो हों तो दिखें, नहीं तो न दिखें। आत्मा सदा प्रत्यक्ष है। उसके देखने में किसी और की अपेक्षा नहीं। हे राम! जो इन्द्रियों से सिद्ध हो वह असत् है। जो जगत् ही असत् हुआ तो उसके पदार्थ कैसे सत् हों? इससे इस जगत् की सत्यता छोड़कर शुद्धबोध में स्थित होओ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रत्यक्षप्रमाणजगन्निराकरणं नाम शताधिकषड्षष्टितमस्सर्गः ॥ १६६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब मैं उस शिला को बोधदृष्टि से देखता, तब वह मुझको ब्रह्मरूप लगती और जब संकल्पदृष्टि से देखता, तब पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, पर्वत, लोक, लोकपाल, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, पातालसंयुक्त जगत् दिखता। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही आत्मारूपी आदर्श में जगत् दिखता है। तब देवी ने शिला में प्रवेश किया और मैं भी संकल्परूपी शरीर से उसके साथ चला गया। हम दोनों जगत् के व्यवहार को लाँघते गये और जहाँ परमेष्ठी ब्रह्मा का स्थान था, वहाँ जा बैठे। तब देवी ने कहा, हे भगवन्! तुम परमेष्ठी से ऐसे कहना कि मुझको यह ले आई है और यह पूछना कि इसको जो तुमने विवाह के निमित्त उपजाया था तो फिर क्यों इसका त्याग