भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

५६६ ✷ योगवाशिष्ठ ✷

किया ? हे मुनीश्वर ! उसने मुझको विवाह के अर्थ उत्पन्न किया था, पर जब मैं बड़ी हुई तब उसने मेरा त्याग किया है। उसको वैराग्य उपजा है और उसे देखकर अब मुझको भी वैराग्य उपजा है। इसी से मैं परम-पद की इच्छा रखती हूँ, जहाँ न द्रष्टा है, न दृश्य है, और न शून्य है, केवल शान्तरूप है, और जो सर्ग के आदि और महाकल्प के अन्त में रहता है उसमें स्थित होने की इच्छा है, जिसमें स्थित होने पर पहाड़ की भी निश्चल समाधि हो जाती है। ऐसे परमपद का उपदेश करो। हे राम ! इस प्रकार कहकर वह भर्त्ता के जगाने के लिए निकट जाकर बोली, हे नाथ ! तुम जागो; तुम्हारे गृह में दूसरे सृष्टि के ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठमुनि आये हैं। तुम उठकर इनका अर्ध्यपाद्य से पूजन करो; क्योंकि गृह में अतिथि आये हैं। महापुरुष केवल पूजा से ही प्रसन्न होते हैं।

हे राम ! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब ब्रह्माजी समाधि से उठे और उनके प्राण देह और नाड़ियों में आकर स्थित हुए। जैसे वसन्त ऋतु से सब वृक्षों में रस हो आता है, वैसे ही उनकी दसों इन्द्रियों और चारों अन्तःकरण में शनैःशनैः करके प्राण स्थित हुए और सब इन्द्रियाँ खिल आईं। तब उन्होंने मुझको और देवी को अपने सम्मुख देखा और ज्ञान में ॐकार का उच्चारण करके सिंहासन पर बैठे। ब्रह्माजी के जागने से बड़ा शब्द होने लगा और विद्याधर, गन्धर्व, ऋषि मुनि आकर प्रणाम करके स्तुति और ध्वनि से वेद पाठ करने लगे। ब्रह्मा बोले हे ऋषि ! कुशल तो है ? तुम इतनी दूर से क्यों आये हो ? तुम तो सार असार को जाननेवाले हो। जैसे हाथ में बेल का फल होता है, वैसे ही तुमको सम्पूर्ण ज्ञान है, बल्कि तुम ज्ञान के समुद्र हो। ऐसे कहकर उन्होंने अपने निकट आसन दिया और नेत्रों से आज्ञा की कि इस पर विश्राम करो। हे राम ! जब इस प्रकार उन्होंने मुझसे कहा, तब मैं प्रणाम करके उनके निकट जा बैठा और एक मुहूर्तपर्यन्त देवता, सिद्ध और ऋषियों के प्रणाम होते रहे।

उसके अनन्तर जब विद्याधर और देवता सब चले गये, तब मैंने कहा, हे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों के ज्ञाता ईश्वर परमेष्ठी ! तुम ऊँचे