योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 533, कुल 1734 में से
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अहंकार देखने भर को होता है। और की बुद्धि में भासता है, परन्तु ज्ञानी के निश्चय में असंभव है; क्योंकि उसका अहंप्रत्यय आत्मा में रहता है और परिच्छिन्न अहंकार का अभाव हो जाता है जब अहंकार नष्ट होता है, तब अविद्या का भी नाश हो जाता है और यही अज्ञान का नाश है—ये तीनों पर्याय हैं। हे राम! अपने स्वभाव में स्थित रहो और प्रकृत आचार करो; हृदय से शिलाकोषवत् हो रहो और बाहर इन्द्रियों की सब क्रियाएँ हों; अपने निश्चय को गुप्त रखो और सब इन्द्रियों को इस प्रकार धारण करो, जैसे आकाश सबको धारण कर रहा है; अन्तर में शिला के जठरवत् रहो । तब देखने भर को तुम में भी अहंकार दृष्ट होगा । जैसे अग्नि की मूर्ति लिखी दृष्टि में आती है, वैसे ही तुम में अहंकार दृष्ट होगा, परन्तु अर्थाकार न होगा । केवल ब्रह्मसत्ता ही भासेगी, और कुछ न भासेगा ।
इति श्रीयो० नि० विदितवेदाहंकारव० नामश० सप्तसप्ततिमस्सर्गः ॥७७॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है कि तुमने अहंकार के त्याग से परम सत्य की प्राप्ति का उपदेश किया है । यह परम दशा है और राग-द्वेष मल से रहित, निर्मल, उत्तम, अविनाशी और आदि-अन्त से रहित है । यह दशा तुमने परमविभुता के लिए कही है । हे भगवन्! सर्वदा, सब प्रकार सब वस्तुएँ वही ब्रह्मसत्ता है और समरूपसत्ता के अनुभव से परम निर्मल है तो शिलाख्यान किस निमित्त कहा है सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह तो सबम, सर्वदा और सबसे रहित है, पर उसके बोध के लिए मैंने तुम से शिलाख्यान का दृष्टान्त कहा है । हे राम! ऐसा स्थान कोई नहीं, जहाँ सृष्टि न हो । सब स्थानों में सृष्टि है, पर आदि से कुछ नहीं बना और सर्वदा सृष्टि बसती है—शिला के कोष में भी अनेक सृष्टि है । जैसे आकाश में शून्यत्ता है, वैसे ही शिलाकोष में भी सृष्टि है । श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! जो सबमें सृष्टि बसती है तो आकाशरूप क्यों न हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यही मैं भी तुमसे कहता हूँ कि जो कुछ सृष्टि है वह सब आकाशरूप है। स्वरूप में सृष्टि उपजी ही नहीं, सर्वदा आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित