योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३४ | * योगवाशिष्ठ *
है। और आकाश की बात क्या कहनी है। शिलाकोष में सृष्टि बसती है और आकाशरूप है, अर्थात् कुछ हुई नहीं। हे राम! पृथ्वी में ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। अणु-अणु में सृष्टि है और सब ओर से बसती है, परन्तु परमार्थ से कुछ नहीं बना, केवल आत्मरूप है और सब सृष्टि शब्दमात्र है। जैसे यह सृष्टि भासती है, वैसे ही वह भी है। जो यह शब्दमात्र है तो वह भी शब्दमात्र है और जो यह सत्य भासती है तो वह भी सत्य भासती है।
हे रामजी! ऐसा कोई जल का कण नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। सभी में सृष्टि है और यह आश्चर्य देखो कि इसके बिना कुछ नहीं। ऐसा कोई अग्नि और वायु का कण नहीं, जिसमें सृष्टि न हो। सबमें सृष्टि है और वह आकाशरूप है, कुछ बना नहीं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें सदा ज्यों की त्यों स्थित है। हे राम! आकाश में ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें सृष्टि न हो, परन्तु कुछ उपजी नहीं। ऐसा ब्रह्म अणु कोई नहीं, जहाँ सृष्टि न हो, परन्तु स्वरूप में कुछ हुई नहीं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें सदा स्थित है। हे राम! ऐसा अणु कोई नहीं, जिसमें ब्रह्मसत्ता नहीं, और ऐसा कोई चित्अणु नहीं, जिसमें सृष्टि नहीं। पर जैसे किसी ने अग्नि कही और किसी ने उष्णता कही तो उसमें भेद कोई नहीं, वैसे ही कोई ब्रह्म कहते हैं और कोई जगत कहते हैं। शब्द दो हैं, परन्तु वस्तु एक ही है। जगत ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही जगत है, कुछ भेद नहीं। जैसे बहते जल का शब्द होता है, पर उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता, वैसे ही जगत मुझको कुछ पदार्थ नहीं भासित होता है, क्योंकि दूसरी कोई वस्तु बनी नहीं। मैं, तुम और यह जगत्, सुमेरु आदि पर्वत, देवता, किन्नर, दैत्य, नाग इत्यादि सब जगत निर्वाणस्वरूप हैं—आत्म-तत्त्व में कुछ नहीं बना। ये बोलते-चालते जो जीव भासते हैं, उसे स्वप्न की नाईं जानो। जैसे कोई पुरुष सोया हो और स्वप्न में उसे नाना प्रकार के युद्ध होते या यन्त्र बजते और चेष्टा होती दिखाई दें, पर जो उसके निकट जाग्रत पुरुष बैठा हो, उसको कुछ नहीं भासित