भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 535

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५३५

होता, क्योंकि वना कुछ नहीं और उसको सब कुछ भासता है, वैसे ही ज्ञानी के हृदय में जगत् शून्य है और अज्ञानी को भ्रम से नाना प्रकार का दिखता है। इससे हे राम! इस जगत् को स्वप्नवत् जानकर प्राकृत आचार करो और हृदय में शिला की नाईं हो कि कुछ न फुरे। ब्रह्म और जगत् में रञ्च भी भेद नहीं। ब्रह्म ही जगत् और जगत् ही ब्रह्म है। जगत् का स्पष्ट अर्थ ब्रह्म से भिन्न नहीं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम शताधिकाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ १७८ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने आकाशकोष में कुटी बनाकर एक वर्ष की समाधि लगाई तो उसके अनन्तर जो वृत्तान्त हुआ सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैं समाधि मे जगा, तब आकाश में एक परम मनोहर वीणा की तान के सदृश अङ्गना का शब्द सुना। तब मैंने विचार किया कि मैं तो बहुत ऊँचे पर आया हूँ, जहाँ सिद्धों की भी गति नहीं और सिद्धों से भी तीन लाख योजन ऊँचा आया हूँ। यह शब्द कहाँ से आया ? ऐसे विचारकर मैं देखने लगा तो दशों दिशाओं में आकाश ही दीखा, परन्तु सृष्टि का कर्त्ता कोई न देख पड़े। तब मैंने विचार किया कि सृष्टि आकाश में होती है, इससे मैं आकाश ही हो जाऊँ और इस शब्द को जान पाऊँ कि किसका शब्द है। बल्कि आकाश को भी त्यागकर चिदाकाश हो जाऊँ, जहाँ भूताकाश भी कुटी सा भासता है, तब इसका भी अन्त भासेगा और जान लूँगा कि यह किसका शब्द होता है। ऐसे विचारकर मैंने निश्चय किया कि यह शरीर यहाँ रहे और नेत्र मूँदे रहें। तब पद्मासन लगाकर मैंने बाहर की इन्द्रियों को रोका और जो इन्द्रियों की वृत्ति शब्द आदि को ग्रहण करती थी, उसको भी रोक लिया। निदान भीतर-बाहर की सब वृत्तियों के साथ अहंवृत्ति त्यागकर मैं आकाशरूप हो गया। जैसे इस ब्रह्माण्ड में आकाश का अन्त नहीं मिलता, वैसे ही मैं इसको त्यागकर चिदाकाशरूप हो गया, जिसका संकल्प ही रूप है। उसको भी त्यागकर मैं बुद्धि-आकाश में आया। फिर उसको भी त्यागकर