भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 532

५३२ 💥 योगवाशिष्ठ 💥

मानिये और जब दूसरा चन्द्रमा ही नहीं तो उसका कारण कैसे मानिये ?

हे राम ! ब्रह्म आकाश, अद्वैत, शुद्ध, फुरने से रहित, अच्युत और अविनाशी है, वह कारण कार्य कैसे हो ? हे राम ! पृथ्वी आदिक तत्त्व अविद्यमान हैं, पर भ्रम से भासते हैं। केवल शुद्ध आत्मा अपने रूप में स्थित है। जो तुम कहो कि अविद्यमान हैं, तो भासते क्यों हैं, तो उसका उत्तर यह है कि जैसे स्वप्न में अनहोती सृष्टि भासती है, वैसे ही यह जगत् भी अनहोता भासता है। जैसे भ्रम में आकाश में वृक्ष अनहोते भासते हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं और संकल्पनगर रच लीजे तो चेष्टा भी होती है, परन्तु इसका स्वरूप संकल्पमात्र है, वास्तव में अर्थाकार कुछ नहीं होता और अपने काल में सत्य भासता है, पर जब संकल्प का लय होता है तब उसका भी अभाव हो जाता है—इससे आकाश वृक्ष की नाईं हुआ है। जैसे आकाश के वृक्ष भावना से भासते हैं, वैसे ही यह जगत् संकल्पमात्र है। स्वरूप में कुछ नहीं है, जो विचार करके देखिये तो इसका अभाव हो जाता है। हे राम ! शुद्ध आत्मतत्त्व अपने आपमें स्थित है, वही जगत् का आकार हो दिखता है—दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे स्वप्न में जितने पदार्थ दिखते हैं, वे सब अनुभवरूप हैं, वैसे ही जगत् भी ब्रह्मरूप है। हे राम ! हमको सदा वही भासता है तो अहंकार कहाँ हो ? न में अहंकार हूँ और न मेरा अहंकार है। केवल आकाश में अहंकार कहाँ हो ? हे राम ! न में हूँ और न मुझ में कुछ फुरना है; अथवा सब आत्मसत्ता में ही हूँ तो भी अहंकार न हुआ। हे राम ! हमारा अहंकार ऐसा है, जैसे अग्नि की मूर्ति लिखी होती तो उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता दृश्यमात्र होती है, वैसे ही ज्ञानी का अहंकार देखने भर को है। उसे कर्तृत्व या भोक्तृत्व नहीं होता और वे अपने स्वभाव में स्थित हैं। सब ज्ञानवानों का एक ही निश्चय है कि ब्रह्म ही है और अहंकार का अभाव है। अहंकार न आगे था, न अब है और न फिर होगा—भ्रम से अहंकार शब्द जाना जाता है।

हे राम ! जब ऐसे जानोगे, तब अहंकार नष्ट हो जायगा। जैसे शरदकाल में मेघ देखने भर को वर्षा से रहित होता है, वैसे ही ज्ञानी का