भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 531

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ५३१

राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम तो निर्वाणस्वरूप हो, तुमको अहं- काररूपी पिशाच कैसे हुआ—यह मेरा संशय दूर कीजिये ! वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी जब तक शरीर का सम्बन्ध है, तब तक अहंकार दूर नहीं होता । जैसे जहाँ आधार होता है, वहाँ आधेय भी होता है और जहाँ आधेय होता है वहाँ आधार भी होता है, वैसे ही जहाँ देह होती है, वहाँ अहंकार भी होता है, और जहाँ अहंकार होता है, वहाँ देह भी होती है । हे राम ! अहंकार बिना शरीर नहीं रहता, पर उस अहंकार को अज्ञानरूपी बालक ने कल्पना की है । पर ज्ञानी का अहंकार नष्ट हो जाता है । हे राम ! यह अहंकार अविद्या ने उपजाया है । जो वास्तव में मिथ्या हो और भामित हो, वह अविद्या है । और जब अविद्या ही मिथ्या है, तो उसका कार्य अहंकार कैसे सत् हो ? यह केवल मिथ्या भ्रम से उदय हुआ है । जैसे भ्रम से वृक्ष में वैताल भामता है, वैसे ही भ्रम से अहंकाररूपी वैताल उदय हुआ है और इसका कारण अविचार सिद्ध है । विचार करने से इसका अभाव हो जाता है । जहाँ विचार होता है, वहाँ अविद्या नहीं रहती । जैसे जहाँ दीपक होता है, वहाँ अन्धकार नहीं रहता, क्योंकि दीपक के जलाने से अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे ही विचार के उदय होने पर अविद्या का अभाव हो जाता है । जो वस्तु विचार करने से न रहे, उसे मिथ्या जानिये और जो आप ही मिथ्या है तो उसका कार्य कैसे सत्य हो ? इससे अहंकार को मिथ्या जानो ।

हे राम ! जैसे आकाश के वृक्ष का कारण कोई नहीं, वैसे ही अहंकार- का कारण कोई नहीं । मन सहित जाँ बाः इन्द्रियाँ हैं, शुद्ध आत्मा उनका विषय नहीं; क्योंकि वे साकार और दृश्य हैं । साकार का कारण निराकार आत्मा कैसे हो ? जो आकार हैं वे सब मिथ्या हैं; जो बीज होता है, उसमे अंकुर उत्पन्न होता है, तब जाना जाता है कि बीज से अंकुर उत्पन्न है; परन्तु बीज ही न हो तो उसका कार्य अंकुर कैसे उत्पन्न हो ? वैसे जगत् का कारण संवेदन ही न हो तो जगत् कैसे हो । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा हो तो उसका कारण भी

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