भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

५३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

गया और अग्नि के स्थान लाँघकर महाआकाश में गया, जहाँ इन्द्रियों की रोकना भी न था, क्यों इन्द्रियों के विषय कोई दृष्टि में न आते थे। केवल एक आकाश ही आकाश दिखता था और वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी मागों का अभाव था। हे राम! निदान में उस स्थान में गया, जहाँ भूत स्वप्न में भी न दिखते थे और सिद्धों की भी गति न थी। वहाँ मैंने संकल्प की एक कुटी रची और उसके साथ फूल और पत्तों से पूर्ण कल्पवृक्ष रचे और उसके एक ओर मैंने छिद्र रक्खा। मेरा तो सूक्ष्म संकल्प था, इसलिए सब प्रत्यक्ष प्रकट हुआ। उस कुटी को रचकर उसमें मैंने प्रवेश किया और संकल्प किया कि एक वर्ष पर्यन्त में समाधि में रहूँगा और उसके उपरान्त समाधि से उतरूँगा। ऐसे विचारकर मैंने पद्मासन बाँधा और समाधि म स्थित होकर परमशान्ति में एक वर्ष पर्यन्त स्थित हुआ, जहाँ कोई क्षोभ न था। जब वर्ष व्यतीत हुआ, तब वह भावी समाधि के उतरने की थी इसलिए वह संकल्प हुआ। जैसे पृथ्वी में बोया हुआ बीज काल पाकर अंकुर उगता है, वैसे ही वह संकल्प मन में उगा। प्रथम जैसे सूखा वृक्ष वसन्तऋतु में हरा हो आता है, वैसे ही प्राण फुरे। फिर जैसे वसन्तऋतु में फूल खिलते हैं, वैसे ही ज्ञान-इन्द्रियां खिलकर विकसित हुईं और फिर स्पन्दन जो अहंकाररूपी पिशाच है, वह फुरा कि मैं वशिष्ठ हूँ। फिर उसकी इच्छारूपी स्त्री फुरी। हे राम! वह वर्ष मुझको ऐसे व्यतीत हुआ, जैसे पलक का खोलना होता है। काल भी बहुत प्रकार से व्यतीत होता है। किसी को थोड़ा ही बहुत हो जाता है और किसी को बहुत थोड़ा हो जाता है। जब सुख होता है, तब बहुत काल भी थोड़ा लगता है और जब दुःख होता है, तब थोड़ा काल भी बहुत हो जाता है। हे राम! इस समाधि का जो मैंने वर्णन किया, यह शक्ति सब जीवों में है, परन्तु सिद्ध नहीं होती, क्योंकि नानाप्रकार की वासना से अन्तःकरण मलिन रहता है। जब अन्तःकरण शुद्ध हो, तब जैसा संकल्प करे वैसा ही सिद्ध होता है। पर मलिन अन्तःकरणवाले का संकल्प सिद्ध नहीं होता।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीवशिष्ठसमाधि वर्णनं नाम षट्शताधिकसप्ततितमस्सर्गः ॥ १७६ ॥