योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है, तब तक सृष्टि है । जब सृष्टि का फुरना अपनी ओर आना है, तब सब सृष्टि एक आत्मरूप हो जाती है । आकाश, काल, दिशा, पदार्थ सब आत्मा है । आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । वह अपने आपमें स्थित है, जो अद्वैत चिन्मात्रपद है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनं नाम शताधिकद्विसप्ततितमसर्गः ॥ १७२ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! सब तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध कैसे हुआ ? काल में कालत्व, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दन कैसे हुआ है ? जड़ में जड़ता, भूतों में भूतता, संकल्प में स्पन्दन, सृष्टि में सृष्टित्व, मूर्ति में मूर्तित्व, भिन्न में भिन्नता और दृश्य में दृश्यता किससे हुई है, यह मुझसे कहिये, क्योंकि अर्ध-प्रबुद्ध का बोध के निमित्त कहना योग्य है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्म, विष्णु, रुद्र, ईश्वर आदिक सब प्रलयकाल में जिसमें लीन होते हैं, उसका नाम महाप्रलय है । हे राम ! ऐसा जो अनन्त आकाश है वह सम, शुद्ध, आदि-अन्त-मध्य से भी रहित, चैतन्यघन और अद्वैत है; जहाँ एक और दो शब्द भी नहीं है, जिसमें आकाश भी पहाड़ के समान स्थूल है, और ऐसा सूक्ष्म है कि 'है', 'नहीं', दोनों शब्दों से रहित अपने आपमें स्थित है । जैसे पाषाण का शिलाकोष होता है, वैसे ही वह चित्त के स्फुरण में रहित है । ऐसे अकारण परमात्मतत्त्व में सृष्टि का उपजना कैसे कहिये ? जैसे आकाश अपने आपमें स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने आपमें स्थित है । हे राम ! एक निमेष के फुरने में जो वृत्ति अनेक योजन पर्यन्त जाती है, उसके मध्य जो अनुभव करनेवाली सत्ता है, उसमें तुम स्थित होकर देखो कि जगत् और उसकी उत्पत्ति कहाँ है ?
हे राम ! उत्पत्ति समवायकारण और निमित्तकारण से होती है, पर आत्मा निराकार, अद्वैत और सन्मात्र है—न समवायकारण है और न निमित्तकारण । आत्मा अच्युत है अर्थात् स्वरूप से कभी नहीं गिरता । तब वह समवायकारण कैसे हो ? वह निमित्तकारण भी नहीं; क्योंकि